Wednesday, 11 October 2023

#पितृ #स्तोत्र #अमावस्या को #अवश्य #करें #पाठ

#पितृस्तोत्र!! हिंदीअर्थ सहित
      ॐ ऐं सर्व पित्रेभ्यो नमः स्वधा!! 
मार्कंडेय पुराण (९४/३ -१३ ) में वर्णित इस चमत्कारी पितृस्तोत्र का नियमित पाठ करने से पितृ प्रसन्न होते हैं।
                ।।पितृस्तोत्र।।
अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम्।
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्।।

इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा।
सप्तर्षीणां तथान्येषां तान् नमस्यामि कामदान्।।

मन्वादीनां च नेतार: सूर्याचन्दमसोस्तथा।
तान् नमस्यामहं सर्वान् पितृनप्युदधावपि।।

नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा।
द्यावापृथिवोव्योश्च तथा नमस्यामि कृताञ्जलि:।।

देवर्षीणां जनितृंश्च सर्वलोकनमस्कृतान्।
अक्षय्यस्य सदा दातृन् नमस्येहं कृताञ्जलि:।।

प्रजापते: कश्पाय सोमाय वरुणाय च।
योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृताञ्जलि:।।

नमो गणेभ्य: सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु।
स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे।।

सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा।
नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम्।।

अग्रिरूपांस्तथैवान्यान् नमस्यामि पितृनहम्।
अग्रीषोममयं विश्वं यत एतदशेषत:।।

ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्रिमूर्तय:।
जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिण:।।

तेभ्योखिलेभ्यो योगिभ्य: पितृभ्यो यतामनस:।
नमो नमो नमस्तेस्तु प्रसीदन्तु स्वधाभुज।।
       🙏🌼🙏🌼🙏🌼🙏🌼🙏 
                पितृस्तोत्र अर्थ:-
रूचि बोले – जो सबके द्वारा पूजित, अमूर्त, अत्यन्त तेजस्वी, ध्यानी तथा दिव्यदृष्टि सम्पन्न हैं, उन पितरों को मैं सदा नमस्कार करता हूँ।

जो इन्द्र आदि देवताओं, दक्ष, मारीच, सप्तर्षियों तथा दूसरों के भी नेता हैं, कामना की पूर्ति करने वाले उन पितरो को मैं प्रणाम करता हूँ।

जो मनु आदि राजर्षियों, मुनिश्वरों तथा सूर्य और चन्द्रमा के भी नायक हैं, उन समस्त पितरों को मैं जल और समुद्र में भी नमस्कार करता हूँ।

नक्षत्रों, ग्रहों, वायु, अग्नि, आकाश और द्युलोक तथा पृथ्वी के भी जो नेता हैं, उन पितरों को मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ।

जो देवर्षियों के जन्मदाता, समस्त लोकों द्वारा वन्दित तथा सदा अक्षय फल के दाता हैं, उन पितरों को मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ।

प्रजापति, कश्यप, सोम, वरूण तथा योगेश्वरों के रूप में स्थित पितरों को सदा हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ।

सातों लोकों में स्थित सात पितृगणों को नमस्कार है। मैं योगदृष्टिसम्पन्न स्वयम्भू ब्रह्माजी को प्रणाम करता हूँ।

चन्द्रमा के आधार पर प्रतिष्ठित तथा योगमूर्तिधारी पितृगणों को मैं प्रणाम करता हूँ। साथ ही सम्पूर्ण जगत् के पिता सोम को नमस्कार करता हूँ।

अग्निस्वरूप अन्य पितरों को मैं प्रणाम करता हूँ, क्योंकि यह सम्पूर्ण जगत् अग्नि और सोममय है।

जो पितर तेज में स्थित हैं, जो ये चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं तथा जो जगत्स्वरूप एवं ब्रह्मस्वरूप हैं, उन सम्पूर्ण योगी पितरो को मैं एकाग्रचित्त होकर प्रणाम करता हूँ। उन्हें बारम्बार नमस्कार है। वे स्वधाभोजी पितर मुझ पर प्रसन्न हों।
 
मार्कण्डेयपुराण में महात्मा रूचि द्वारा की गयी पितरों की यह स्तुति ‘पितृस्तोत्र’ कहलाता है। पितरों की प्रसन्नता की प्राप्ति के लिये इस स्तोत्र का पाठ किया जाता है।
॥ॐ सर्व पितृ मम मन: कामना सिद्ध कुरुकुरु स्वाहा॥
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Tuesday, 3 October 2023

#जीवित्पुत्रिका #व्रत #कथा

॥ॐ श्रीः गणेशाय नमः॥

वक्र तुण्ड महाकाय सूर्यकोटि सम्प्रभ:।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येसु सर्वदा॥

निःसन्तान दम्पतियों के लिये संजीवनी

॥जीवित्पुत्रिका व्रत-कथा॥

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्। 
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥1॥ 
यं ब्रह्मावरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैस्तवैः,
वेदैः साङ्ग पदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः।
ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो,
यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः॥२॥
  श्रीहरि नारायण, विद्यादात्री सरस्वती तथा वेद व्यासजी को प्रणाम है। 
जिन परमेश्वर की ब्रह्मा, वरुण, इन्द्र, रुद्र, मरुद्गण 
और सभी देवता श्रद्धान्वित होकर स्तोत्रों से स्तुतिगान करते हैं, 
जिन परमेश्वर का शिक्षा, सूत्र, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष,छन्द सहित वेदों द्वारा 
पदक्रम उपनिषदों द्वारा सामवेदीय गुणानुवाद गाते हैं, 
योगीजन ध्यानावस्था में जिन परमेश्वर के दर्शन 
हेतु लालयित रहते हैं,और जिनके प्रारम्भ व अन्त को समस्त देवगण 
और असुर भी नहीं जान सके, उन परमेश्वर को सादर नमस्कार है।।2।। 

जीवित्पुत्रिका व्रत पूजन की तैय्यारी-
  शुद्ध स्थान जैसे कि नदी सरोवर कुआं बावड़ी 
समुद्र तट जहां भी आपको उचित लगे 
साफ सफाई कर लें वहां और यदि उपलब्ध हो सके तो 
एक गन्ना, (ईख, शुगरकेन) का पूरा पौधा पत्तियों सहित ले लें, 
और उसे भूमि या गमले में लगा दें।
चौक पूर लें, रंगोली बना लें। 
यथाशक्ति नैवेद्य (भोग) प्रसाद की व्यवस्था कर लें।
आप जिस परिवार, गांव, शहर या प्रदेश के हैं; 
वहां के लोकाचार के अनुसार भी आप 
अपने पूजन की तैयारी कर सकती हैं। 
कपास के सूत्र में 16 गांठें लगा लें 
और आपके पास जो 'जिउतिया' (जितिया) है, 
यह सोना चांदी तांबा से भी बनती है, 
इस जितिया को जीवित्पुत्रिका यंत्र भी कहा जाता है, 
उसे 16 गांठ वाले सूत्र में पिरो लें।
 एक लकड़ी का बाजोट, चौकी, पीढ़ा जो भी उपलब्ध है, 
लेकर उस पर साफ पीला कपड़ा बिछा दें,
और उसके ऊपर जिउतिया (जीवित्पुत्रिका यंत्र) को स्थापित कर लें। 
कुशा ले लें। कुशा से जीमुतवाहन की आकृति बनाकर के 
उसी पीढे़ पर स्थापित कर लें। 
एक सुपारी ले लें। सुपारी को चिल्हीका मान कर 
वहीं पीढ़ा पर स्थापित कर लें। 
इस स्थापना के बाद पूजन कार्य प्रारंभ करें। 
जीमुतवाहन, चिल्हिका और जीवित्पुत्रिका
इन तीनों को हाथ जोड़कर प्रणाम करें तथा 
आह्वान, आसान, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, 
नैवेद्य, वस्त्र, गंध, पुष्प, धूप-दीप 
आदि के द्वारा पूजन कार्य प्रारंभ करें।

प्रातः स्नानादिकं नित्यकर्म समाप्यैकाग्रचित्तः 
शुद्धेदेशे स्थित्वा देशकालौ सङ्कीर्त्य
स्वकृतमनोवाक्कायिक वाचिक 
मानसिक-सांसर्गिक दुरितक्षयपूर्वक
पतिपुत्रकुटुम्बायुः सौभाग्यसमृद्धिहेतवे 
जीवत्पुत्रिका व्रतोपवास तत्पूजां च करिष्ये। 
  अपने मन में यह निश्चित धारणा बना लें, कि आप 
जीवित्पुत्रिका व्रत को अपने मन-मस्तिष्क अपनी वाणी 
और अपने सांसारिक कार्यों की पवित्रता धारण करते हुए 
इस व्रत, इस पूजन को पूर्ण करना है। जिससे कि हमारे पति, 
पुत्र और कुटुंब की रक्षा हो, आयु वृद्धि हो, सौभाग्य की वृद्धि हो। 

सौवर्णेन राजतेन ताम्रेण सूत्रेण कार्पाससूत्रेण 
वा निर्मितां जीवत्पुत्रिकां तत्पार्श्वे 
कौशञ्जीमूतवाहनं पीठे निधायाऽऽवाहयेत्।

तत्र मन्त्राः-

जीवत्पुत्रि समागच्छ गौरिरूपधरेऽनघे। 
ईश्वरस्य प्रसादेन भाव सन्निहिता सदा॥
  हे मां गौरी! आप जीवित्पुत्री रूपधारी हैं, 
आप हमारा प्रणाम स्वीकार करें 
तथा हमें अपनी कृपा प्रदान करें।

जीवत्पुत्रिके आवाहयामि स्थापयामि पूजयामि।
  हे जीवित्पुत्री! हम आपका आवाहन करते हैं, 
आप यहां आकर स्थापित हों और हमारी पूजा को स्वीकार करें।

एह्योहि नृपशार्दूल राजन जीमुतवाहन।
कृपया मेऽत्र सान्निध्यं कल्पेयश्व सदा प्रभो॥
जीमूतवाहन आवाहयाकम्। 
  हे राजा जीमुतवाहन! आप अत्यंत ही तेजस्वी और दयावान हैं, 
कृपया हमारे इस पूजन में आप पधारें 
और अपना आशीर्वाद हमें प्रदान करें।

तत्रैव 
चिल्हि स्वस्थानतः शीघ्रं समागच्छाऽत्र सुव्रते। 
पूजार्थं कुरु सान्निध्यं पतिं पुत्रांश्च रक्ष मे॥
  हे चिल्हिका! आप अपने स्थान से शीघ्र ही यहां पर उपस्थित हों 
और हमारे द्वारा किए जा रहे पूजा कार्य को स्वीकार करें।
इस पूजन के फलस्वरुप आप हमारे पति, पुत्र, कुटुंब को सुरक्षित रखें। 
ऐसा ही वरदान हमें प्रदान करें।

शिवे शिवकरे नित्यमागत्यात्र स्थिता भव॥ 
धनाधन्यसुतायूंषि वर्धयस्व सदा मम॥
  हे शिव और पार्वती! कृपया यहां आकर स्थित हों 
और अपना आशीर्वाद हमें प्रदान करें, 
जिससे हमारे घर का धन-धान्य, संतान, वंश समृद्ध हो।

सौम्य पुत्रस्य प्राप्त्यर्थं स्वामी जीवन हेतवे।
पूजयामी महाभाग चिल्हिके ते नमो नमः॥ 
रूप संपत्ति सौभाग्य वर्धनार्थ सदा मम। 
दत्तमिमां  पूजां  गृहाण  परमेश्वरि॥
  पुत्र की प्राप्ति तथा पति का जीवन सुरक्षित हो 
हमारा कुटुंब सुरक्षित हो हमारे वंश की अभिवृद्धि हो 
हे चिल्हीका! हे जीमुतवाहन! हे जीवित्पुत्री! हम आपका पूजन करते हैं 
तथा आपके द्वारा हमें रूप, संपत्ति, सौभाग्य वर्धन सदा प्राप्त होता रहे।
कृपया हमारी पूजा को स्वीकार करें। 
हम अपने सामर्थ्यानुसार पूर्ण श्रद्धा के साथ
आपके पूजन को कर रहे हैं।

जीवित्पुत्रिकां जीवमूतवाहनं चिह्निकां च पूजयेत्।
जीवित्पुत्रिका, जीमुतवाहन और चिल्हीका का पूजन प्रारंभ करें।

आवाहनम्। आसनम्। पाद्यम्। अर्घ्यम्। आचमनम्। 
स्नानम्। वस्त्रम्। उपवस्त्रम्। गन्धम्। पुष्पम्। धूपम्। 
दीपम्। नैवेद्यम्। नमस्कारम्। प्रदक्षिणाम्।
षोडशोपचारैर्यथा-लब्धोपचारैर्वा तन्मन्त्रे सम्पूज्य।
मन्त्रपुष्पाञ्जलिं दद्यात्। 
जीवत्पुत्रि महाभागे मम जीवन्तु पुत्रकाः॥ 
आयुर्वर्धय पुत्राणाम्पत्युश्च मम सर्वदा॥
नमस्ते नृप शार्दूल राजन् जीवमुतवाहन॥ 
पतिपुत्रजनोत्कर्षं वर्धयस्व जनेश्वर॥ 
चिल्ही त्वं सर्वतः श्रेष्ठे मम पुत्रान् प्रजीवय॥ 
तव प्रसादात्सर्वाश्च सुखसौभाग्यसंयुताः॥ 
इति सम्पूज्य हस्तेऽक्षतपुष्पाणि गृहीत्वा कथाश्रवणं कुर्यात्।
  पूजन पूरा करके, हाथ में पुष्प अक्षत इत्यादि लेकर के बैठ जाएं 
और कथा का श्रवण करें |

॥जीवित्पुत्रिका व्रत-कथा॥ -
कथा का पाठ करें।

प्रेम से बोलिए मां गौरी की जय!

 कथा इस प्रकार है-

एकदा मुनयः सर्वे नैमिषारण्यवासिनः।
पप्रच्छुः कृपया सूतं लोकानां हितकाम्यया॥1॥
भविष्यन्ति कथं सूत बालकाश्चिरजीविनः। 
दारुणेऽस्मिन्महाकाले समाप्ते तु कलौ युगे॥2॥
  एक बार नैमिषारण्य के निवासी ऋषियों ने  
संसार के कल्याणार्थ सूतजी से पूछा -
हे सूतजी! कराल कलिकाल में लोगों के बालक 
किस तरह दीर्घायु होंगे, यह उपाय बताइये।

सूत उवाच-
द्वापरस्य युगस्यान्ते प्रवृत्ते दारुणे कलौ।
योषितां मन्त्राणां चक्रु: शोकोपहतचेतसः॥3॥ 
जीवत्याश्च कथं मातुरग्रे पुत्रो विनश्यति। 
इति निश्चित्य ताः सर्वाः प्रष्टुं जग्मुर्द्विजोत्तमम्॥4॥ 
गौतमं तु सुखासीनं महात्मानं रहः स्थितम्। 
ऊचुस्ताः पुरतःस्थित्वा विनयानम्रकन्धराः॥5॥
  सूतजी बोले -
जब द्वापर का अन्त और कलियुग  का आरम्भ था,
उसी समय बहुत सी शोकाकुल स्त्रियों ने आपस में परामर्श किया॥
क्या इस कलिकाल में माता की जीवित रहते, पुत्र समाप्त हो जायेंगे?
जब वे आपस में कुछ निर्णय नहीं कर सकीं 
तब गौतम ऋषि के पास पूछने के लिए गयीं॥
स्त्रियां गौतम ऋषि के आश्रम पर पहुंचीं तो उस समय 
गौतम ऋषि आनन्द मग्न हो कर एकान्त में बैठे थे, 
स्त्रियां उनके सामने जाकर मस्तक झुकाकर प्रणाम कीं॥

स्त्रिय ऊचुः-
प्राप्तेऽस्मिन्दारुणे काले कथं जीवन्ति पुत्रकाः। 
व्रतेन तपसा वाऽपि निश्चित्य वद् हे प्रभो॥6॥
इति तासां वचः श्रुत्वा कथयामास गौतमः। 
श्रृण्वन्तु योषितः सर्वा मया पूर्वं यथा श्रुतम्॥7॥ 
  तदनन्तर स्त्रियों ने पूछा-'हे प्रभो! इस कलियुग में लोगों के पुत्र 
किस प्रकार जीवित रहेंगे? इसके लिए कोई व्रत या तप 
हो तो कृपा करके बताइये॥
इस तरह उनकी बात सुनकर गौतमजी बोले-
आपसे मैं वही बात कहूँगा, जो मैंने पहले से सुन रखा है॥

गौतम उवाच-
निवृत्ते भारते युद्धे निर्विण्णे पाण्डुनन्दने । 
अथ द्रौणिहतान् पुत्रान् दृष्ट्वा द्रुपदनन्दिनी॥8॥
पुत्रशोकपरीताङ्गी स्वसखीगण सेविता। 
जगाम सा महाभागा धौम्यं ब्राह्मणसत्तमम्॥9॥
  गौतमजी ने कहा- जब महाभारत-युद्ध का अन्त हो गया 
और द्रोणपुत्र अश्वत्थामा के द्वारा अपने बेटों को मरा देखकर 
सब पाण्डव बड़े दुःखी हुए तो पुत्र के शोक से व्याकुल होकर 
द्रौपदी अपनी सखियों के साथ ब्राह्मण श्रेष्ठ धौम्य ऋषि के पास गईं।

द्रौपद्युवाच-
केनोपायेन विप्रेन्द्र पुत्राः स्युश्चिरजीविनः । 
कथयस्व यथातथ्यं प्रसादाद् द्विजसत्तम ॥10॥
  और द्रौपदी ने धौम्य से कहा- 'हे विप्रेन्द्र! कौन-सा उपाय 
करने से बच्चे दीर्घायु हो सकते हैं, कृपा करके ठीक-ठीक कहिये॥

धौम्य उवाच- 
आसीत् सत्ययुगे देवि सत्यवाक् सत्यसाधनः। 
समदर्शी दयाशीलो राजा जीमूतवाहनः॥11॥
 स कदाचिन्महाभागो जगाम श्वशुरालयम्। 
भार्यया सहितस्तत्र निवासमकरोत् प्रभुः॥12॥
काचिन्निशीथे तद्ग्रामे पुत्रशोकसमाकुला। 
रुरोद करुणा दीना निराशा पुत्रदर्शन॥13॥
  धौम्य बोले- सत्ययुग में सत्यवचन बोलनेवाला, 
सत्याचरण करनेवाला, समदर्शी जीमूतवाहन नामक एक राजा था।
एक बार वह अपनी स्त्री के साथ 
अपनी ससुराल गये और वहीं रहने लगे॥
एक दिन आधी रात के समय पुत्र के शोक से व्याकुल 
कोई स्त्री विलाप करने लगी। क्योंकि वह अपने बेटे के 
दर्शन से निराश हो चुकी थी, उसका पुत्र समाप्त हो चुका था॥

हाहाऽग्रे मम वृद्धाया युवापुत्रो विनश्यति। 
तत्क्रन्दनं नृपः श्रुत्वा विदीर्णहृदयोऽभवत्॥14॥
अथ तत्र गतः प्राह कथ्यतां मृत्युकारणम्। 
सा चाह गरुडो राजन् ! भुङ्क्ते प्रतिदिनं सुतान्॥15॥
वृद्धाया वचनं श्रुत्वा राजा कारुणिकोऽवदत्। 
तिष्ठ मातः सुखं यत्नं करिष्ये पुत्ररक्षणे॥16॥
  वह रोती हुई हुई कहती थी - हाय! मुझ बूढ़ी माता के सामने 
मेरा बेटा मरा जा रहा है। उसका रुदन सुनकर जीमूतवाहन का तो 
मानो हृदय विदीर्ण हो गया। वह तत्काल उस स्त्री के पास गये 
और उससे पूछा- तुम्हारा बेटा कैसे मरा है?" 
उस बूढ़ी ने कहा - गरुण प्रतिदिन आकर गाँवके लड़कों को खाजाता है। 
इस पर दयालु राजा ने कहा- माता अब तुम रोओ मत, आनन्द से बैठो, 
मैं तुम्हारे बच्चे को बनाने का यत्न करता हूँ॥

 इत्युक्त्वा स ययौ भक्ष्यस्थानं विगतसाध्वसः 
आगत्य गरुडो मांसं बुभुजे नृपदेहजम्॥17॥
वामाङ्गे भक्षिते मांसे गरुडेनातितेजसा। 
अथासौ दक्षिणं पार्श्वं परिवृत्य ददौ नृपः॥18॥
तद दृष्ट्वा गरुडः प्राह देवयोनिषु को भवान्।
न त्वं वीर मनुष्योऽसि वद जन्म स्वकं कुलम्॥19॥
 ऐसा कहकर राजा उस स्थान पर गये, जहाँ गरुड़ आकर 
प्रतिदिन मांस खाया करता था।
उसी समय गरुड़ आकर उनके ऊपर टूट पड़ा और मांस खाने लगा॥
जब अतिशय तेजस्वी गरुड़ ने राजा का बांया अंग खा लिया, तो तुरन्तही 
राजा ने अपना दाहिना अंग फेरकर गरुड़ के सामने कर दिया।
यह देखकर गरुड़जी ने कहा-'तुम कोई देवता हो? 
कौन हो? तुम मनुष्य तो नहीं जान पड़ते। 
अच्छा, अपना जन्म और कुल बताओ॥

अथोवाच स्वयं राजा व्यथयाऽऽ कुलितेन्द्रियः। 
स्वेच्छया भुङ्क्ष्व पक्षीन्द्र वृथा ते प्रश्न ईदृशः॥20॥ 
तच्छ्रुत्वा गरुडो वाक्यं निवृत्तश्च स्वयंम्प्रभुः। 
पप्रच्छ साग्रहं राज्ञो जन्म चापि कुलं तथा॥21॥
  पीड़ा से व्याकुल मनवाले राजा ने कहा- हे पक्षिराज! 
इस तरह के प्रश्न करना व्यर्थ है, 
आप अपनी इच्छाभर मेरा मांस खालो।
यह सुनकर गरुड़ रुक गये और 
बड़े आदर से राजा के जन्म 
और कुल की बात पूछने लगे॥

राजोवाच-
जननी मम शैव्याऽस्ति पिता मे शालिवाहनः। 
सूर्यवंशोद्भवश्चाहं राजा जीमूतवाहनः॥22॥
  राजा ने कहा-'मेरी माता का नाम है शैव्या 
और मेरे पिता का नाम शालिवाहन है। 
सूर्यवंश में मेरा जन्म हुआ है 
और जीमूतवाहन मेरा नाम है ||२२||

दृष्ट्वा दयालुतां राज्ञो गरुडः प्राह सत्त्वरम्। 
वरं ब्रूहि महाभाग! यत्ते मनसि रोचते॥23॥
  राजा की दयालुता देखकर गरुड़ ने कहा-'हे महाभाग्य 
आपके मन में जो अभिलाषा है, वह वर माँग लीजिए॥

राजोवाच-
ददासि चेद् वरं मह्यं पतगेन्द्र वृणोमि ते। 
ये चात्र भक्षिताः पूर्वं ते जीवन्तु जनाः खलु॥24॥
पुनर्नैव जनाः भक्ष्याः प्रार्थनेयं मम प्रभो। 
चिरं जाता हि जीवन्तु तद्विधेयं त्वया सदा॥25॥
राजा ने कहा- हे पक्षिराजा यदि आप मुझे वरदान दे ही रहे हैं तो 
यह वर दीजिए कि, आपने अब तक जिन प्राणियों को खाया है, 
वे सारे के सारे जीवित हो जायें।
हे स्वामिन्! अबसे आप यहाँ बालकों को न खाया करें 
और कोई ऐसा उपाय करें, 
कि जहाँ जो उत्पन्न हों वे लोग बहुत दिनों तक जीवित रहें।

धौम्य उवाच- 
सानन्दस्तद् वरं दत्त्वा पक्षीन्द्रो गरुडः स्वयम्। 
सुधार्थं नृपकामोऽस विवेश वसुधातले॥26
ततोऽमृतं समानीय सुववर्ष खगेश्वरः।
मृतकानां शरीरेषु चास्थिराषु सर्वतः॥27॥
ततस्ते जीविताः सर्वे भक्षिता ये पुरा नराः।
गरुडस्य प्रसादने राज्ञो वै कृपया ततः॥28॥
राजश्च द्विगुणं तत्र शुशुभे वपुरुत्तमम्। 
दृष्ट्वा दयालुतां राज्ञो गभाषे गरुडः पुनः॥29॥
अपरं च वरं दास्ये लोकानां हितकाम्यया।
आश्विने बहुले पक्षे तिथिश्चाद्याष्टमी शुभा॥30॥
  धौम्य ने कहा कि, 
आनन्द के सहित वर दे कर पक्षियों के राजा गरुड़ 
स्वयं राजा की इच्छा से अमृत लेने के लिए गये।
और अमृत लाकर पृथ्वी पर मृत पड़े शरीर और हड्डियों पर 
चारों ओर से अमृत को बरसाया।
गरुण द्वारा खाए हुए मनुष्य, राजा की कृपा से और 
गरुड़ की प्रसन्नता से पुनः जीवित हो गये।
राजा का स्वरूप पहले से ज्यादा सुशोभित हो गया। 
राजा की दयालुता देखकर फिर गरुड़ जी बोले- 
कि दूसरा वरदान लोक हित की इच्छा से मैं स्वयं देता हूं।
आश्विन मास में कृष्ण पक्ष की अष्टमी बड़ी शुभ है॥

सप्तमी रहिता चाऽद्य प्रजानां जीवितोऽसि त्वम्। 
अतोऽयं वासरो वत्स ब्रह्मभावं गमिष्यति॥31॥ 
दुर्गाया मूर्तिभेदेन ख्याता त्रैलोक्यपूजिता। 
अमृताहरेण वत्स स्मृता सा जीवपुत्रिका॥32॥
सत्तिथौ पूजयिष्यन्ति या स्त्रियो जीवपुत्रिकाम्।
त्वं च दर्भमयं कृत्वा श्रद्धाभक्तिसमन्विताः॥33॥
तासां सौभाग्यवृद्धिश्च वंशवृद्धिश्च शाश्वतम् ।
भविष्यति महाभाग नाऽत्र कार्या विचारणा॥34॥
  राजा की दयालुता देखकर गरुड़ ने फिर कहा-
'मैं संसार के कल्याणार्थ एक और वरदान दूँगा। 
आज आश्विन कृष्ण सप्तमी से रहित शुभ अष्टमी तिथि है। 
आज ही तुमने यहाँ की प्रजा को जीवन दान दिया है। 
हे राजन्! अबसे यह दिन ब्रह्मभाव युक्त हो गया है।
जो मूर्तिभेद से विविध नामों से विख्यात है, वही त्रैलोक्य से पूजित 
पराम्बादुर्गा अमृत प्रदान करने के अर्थ में जीवित्पुत्रिका कहलायी हैं।
सो इस तिथि को जो स्त्रियाँ उस जीवित्पुत्रिका की और कुश की आकृति 
बनाकर तुम्हारी पूजा करेंगी तो दिनों-दिन उनका सौभाग्य बढ़ेगा और 
वंश की भी वृद्धि होती रहेगी। हे महाभाग ! इस विषय में 
कोई सोच-विचार करने की आवश्यकता नहीं है॥

उपोष्य चाऽष्टमीं राजन्। सप्तमी-रहिता शिवा । 
यस्यामुदयते भानुः पारणं नवमीदिने॥35॥
वर्जनीया प्रयत्नेन सप्तमीसहिताष्टमी। 
अन्यथा फलहानिः स्यात् सौभाग्यं नश्यति ध्रुवम्॥36॥
   हे राजन्! सप्तमी से रहित और उदयातिथि की अष्टमी को व्रत करें, 
यानी सप्तमी विद्ध अष्टमी जिस दिन हो उस दिन व्रत नहीं करें।
शुद्ध अष्टमी को व्रत करें, और नवमी में पारण करें। 
यदि इस पर ध्यान न दिया जाए तो फल प्राप्त नहीं होता है 
और बनी हुई बात बिगड़ने लग जाती है॥

एवं दत्त्वा वरं तस्मै ययौ हरिपुरं खगः। 
राजाऽपि भार्यया सार्द्धं स्वपुरं वै जगाम सः॥37॥
इति ते कथितं देवि! व्रतमेतत्सुदुर्लभम्। 
यद्व्रतस्य प्रभावेण पुत्राः स्युश्चिर-जीविनः॥38॥
व्रतं कुरुष्व त्वं देवि! पूजयस्व गिरीन्द्रजाम् ।
पूर्वोक्तेन विधानेन ततः फलमवाप्स्यसि॥39॥
मुनेस्तद्वचनं श्रुत्वा पाञ्चाली जातकौतुका। 
पुराङ्गना समाहूय चकार व्रतमुत्तमम्॥40॥
  जीमूतवाहन को इस तरह वरदान देकर गरुड़ देव 
वैकुण्ठ धाम को वापस चले गये। और राजा भी 
अपनी पत्नी के साथ अपने । नगर को वापस चले आये।
धौम्य द्रौपदी से कहते हैं-'हे देवि! मैंने यह अतिशय दुर्लभ व्रत 
तुमको बताया है। इस व्रत को करने से बच्चे दीर्घायु होते हैं।
हे देवि! तुम भी इसी प्रकार, इसी विधि से यह व्रत करो। 
दुर्गाजी के जीवित्पुत्री स्वरूप का पूजन करो 
तो तुम्हें भी अभिलषित फल प्राप्त होगा।
मुनिराज धौम्य की बात सुनकर द्रौपदी के हृदय में 
एक प्रकार का कौतूहल उत्पन्न हुआ। और पुरवासिनी 
स्त्रियों को बुलाकर उनके साथ यह उत्तम व्रत किया॥

गौतम उवाच -
श्रुत्वा व्रतं प्रभावञ्च चिल्ही काञ्चिच्छिवां सखीम्। 
कथयामास तत्सर्वं तया च स्वीकृतं व्रतम्॥41॥
प्लक्षशाखां समाश्रित्य चिल्ही व्रतपरा सती। 
तत्कोटरे स्थिता तत्र शिवाव्रतपरायणा॥42॥
  गौतम ऋषि बोले - इस व्रत के प्रभाव को सुनकर 
चिल्ही ने अपनी सखी सियारिन से कहा और 
उसने भी इस व्रत को स्वीकार किया।
 किसी पीपल की डाली की छाया में रहकर 
चिल्ही व्रत करने लगी ने और उसी पीपल के 
खोड़हर में  सियारिन व्रत करने लगी॥

कुताश्चित्खलु सा चिल्ही कथा श्रुत्वा द्विजोत्तमात्। 
स्वसखीं कथयामास प्लक्षकोटरसंस्थिताम्॥43॥
कथामर्द्धां शिवा श्रुत्वा क्षुधापीडित-विग्रहा। 
निजगाम ततः शीघ्रं श्मशानं शवपूरितम्॥44॥
तत्र गत्वा च बुभुजे स्वेच्छया चामिषं शिवा।
चिल्ही निरशनं कृत्वा स्थिता प्रातरभूत्तदा॥45॥
  कहीं पर उत्तम ब्राह्मण से इस कथा को सुनकर चिल्ही आई 
और अपनी सखी सियारिन को जो कि खोड़र में बैठी थी 
उसे भी यह कथा सुनाने लगी।
आधी कथा को सुनकर भूख से दुखी शरीर वाली सियारिन
खोड़र से निकल कर जल्दी से श्मशान पर गई और 
अपनी इच्छा पूर्वक सियारिन ने मांस खाया और
चिल्ही ने निर्जल व्रत किया। तबतक प्रातः काल हो गया॥

गोष्ठं गत्वा तथा तत्र पीतं च सौरभं पयः। 
समाधाय कृतं तत्र पारणं नवमी दिने॥46॥
कियता चैव कालेन पञ्चत्वं च गते उभे । 
कौशलायां धनाढ्यस्य सार्थवाहस्य मन्दिरे॥47॥ 
संयोगाच्च तयोर्जन्म जातमेकत्र सद्मनि। 
ज्येष्ठा तत्र शिवा जाता चिल्ही सा तत्कनीयसी॥48॥
  नवमी के दिन, नवमी में पारण करने के लिए गोशाला में जाकर 
सुगन्धि युक्त सुन्दर जल चिल्ही ने पिया।  
कुछ ही दिनों के बाद दोनों ने अपने शरीर को छोड़ दिया। 
बाद में कौशल पुर में किसी धनी के घर, 
संयोग से दोनों का एक ही घर में जन्म हुआ। 
बड़ी बहिन सियारिन हुई, छोटी बहिन चिल्ही हुई॥

सर्वलक्ष्णसंयुक्ता सा तु जातिस्मराऽभवत्। 
अग्रजा काशिनाथेन कनिष्ठा तस्य मन्त्रिणा॥49॥
विवाहिता विधानेन गार्हपत्याग्निसन्निधौ। 
पूर्वजन्मविपाकेन राजपत्नी मृगेक्षणा॥50॥
यं यं सुतं प्रसूते सा स स याति यमालयम् । 
जातिस्मरा मन्त्रिपत्नी पुत्रानष्टौ महात्मनः॥51॥
  सम्पूर्ण लक्षणों से युक्त छोटी बहिन चिल्ही, 
उसको जाति का स्मरण रहा। 
बड़ी बहिन काशीराज ने व्याही, 
छोटी बहिन को काशीराज के मंत्री ने।
गार्हपत्य अग्नि के समीप में विधिपूर्वक
दोनों का विवाह किया गया। 
पूर्व जन्म के फल से मृगनयनी रानी ने 
जो भी सन्तान उत्पन्न किया 
वो सब यमराज के घर चले गये॥

सुषुवे वसुमातेव वसूनष्टौ यथा किल।
तान् दृष्ट्वा भगिनी प्राह राजपत्नी नृपागते॥52॥
ईर्ष्ययोवाच भो नाथ! कुरुष्व वचनं मम। 
पथा येन गताः पुत्राः मदीयास्तेन योजय॥53॥
भगिन्यश्चापि वै पुत्रान् मां चेज्जीवितुमिच्छसि। 
तच्छ्रुत्वा तद्वधं राजा बहुधा विदधत्तदा॥54॥
  मृगनयनी रानी ने जिस-किसी भी सन्तान को उत्पन्न किया, 
वह मर जाती थी और पूर्वजन्म की बातों को स्मरण करनेवाली 
मन्त्री की पत्नी ने अष्ट वसुओं के सदृश तेजस्वी आठ बेटे उत्पन्न किये 
और सभी जीवित रह गये। अपनी बहिन के पुत्रों को जीवित देखकर 
ईर्ष्यावश राजपत्नी ने अपने स्वामी से कहा कि, यदि तुम मुझे 
जीवित रखना चाहते हो तो इस मन्त्री के भी पुत्रों को उसी जगह भेज दो 
जहाँ मेरे बेटे गये हैं, इन्हें मार डालो।
अपनी रानी की यह बात सुनकर राजा ने अपने मन्त्री के पुत्रों को 
मारने के लिए कई प्रकार के प्रयास किए, उद्योग किये॥

अद्य तान् जीवयामास मृतान् सा जीवपुत्रिका।
एकदा तु वने तेषां शिरच्छेदं विधाय वै॥55॥
वंशनिर्मितपात्रेषु प्रेषयामास तद्गृहम्। 
बभूवुस्ते च मूर्द्धानौ नानारत्नादि तत्क्षणात्॥56॥
अज्ञाताश्च गताः सर्वे जीविता तत्सुताः पुनः। 
तानालोक्य गता सद्यो विस्मयं नृपवल्लभा॥57॥
पप्रच्छागत्य भगिनी किं व्रतं च कृतं त्वया। 
येन जीवन्ति ते पुत्रा मृताश्चैव पुनः पुनः॥58॥
  राजा ने अनेक प्रकार से प्रयास किया, 
मन्त्री के पुत्रों को समाप्त करने के लिए।
किन्तु मन्त्री पत्नी के जीवित्पुत्रिका के 
पुण्य-बल से प्रभाव से वे सभी बच जाते।
एक दिन राजा ने अपने आदमियोंं से उन पुत्रों का 
सिर कटवाकर पिटारी में रखवाया और वह पिटारी 
उनकी माता (मन्त्री- पत्नी) के पास भिजवा दिया। 
किन्तु वे आठों शिरों वाली पिटारी बेशकीमती जवाहरातों से भर गई। 
और  वे आठों लड़के भले चंगे अपनी माता के पास 
जंगल से वापस आ गये। 
उनको जीवित देखकर राजपत्नी बहुत ही विस्मित हुई।
अन्त में हार करके राजपत्नी, मन्त्री की पत्नी के पास आयी 
और उसने पूछा-  हे बहन! तुमने ऐसा कौन-सा ऐसा 
पुण्य कार्य किया है, कौनसा व्रत उपवास किया है, 
जिससे बार-बार मारे जाने पर भी तुम्हारे बेटे नहीं मरते॥

मन्त्रिभार्योवाच-
पूर्वजन्मनि जाताऽहं चिल्ही त्वञ्च श्रृंगालिका। 
कुर्वन् तया व्रतं सम्यक् पालितं येन न त्वया॥59
तेन दोषेण भगिनी ते न जीवन्ति पुत्रकाः। 
ममाक्षतव्रतायाश्च जीवन्त्यक्षतविग्रहाः॥60॥
  जब राजपत्नी ने आकर के अपनी बहिन से पूछा - 
तुमने ऐसा कौन सा व्रत किया है कि 
तुम्हारे लड़के बार-बार भी मरकरके जी जाते हैं?
तब मन्त्री की पत्नी बोली- पूर्वजन्म में 
मैं चिल्ही रही और तुम सियारिन थी। 
जीवित्पुत्रिका के व्रत को करते हुए 
तुमने अच्छे से व्रत का पालन नहीं किया। 
इस दोष से से बहन तुम्हारे लड़के जीवित नहीं रहते हैं। 
और मेरा व्रत नहीं नष्ट हुआ था इसलिए मेरे लड़के जीवित रहते हैं।

इदानीं त्चवं च राजेन्द्र-वल्लभं व्रतमाचर। 
तद्व्रतस्य प्रभावेण पुत्रास्ते चिरजीविनः॥61॥
भविष्यन्ति महाभागे सत्यं सत्यं वदामि ते। 
सा तस्यास्तद्वचः श्रुत्वा चकार व्रतमुत्तमम्॥62॥
जीवपुत्रं तदारभ्य तस्याः पुत्राः सुशोभनाः। 
पृथिव्यां बहुशो जाताः क्षितिपाश्चिरजीविनः॥63॥
  मंत्री पत्नी ने सुझाव दिया - हे प्यारी बहिन! 
अब तुम और राजा साहब, इस व्रत को करो 
इस व्रत के प्रभाव से तुम्हारे पुत्र भी जीवित रहेंगे। 
हे भाग्यवती! मैं सत्य वचन कहती हूं। 
उसके वचन को सुनकर रानी ने इस व्रत को किया। 
व्रत के फल स्वरुप उसे रानी के लड़के बड़े सुंदर 
और स्वस्थ हुए इस पृथ्वी पर वे आगे चलकर के 
राजा हुए और बहुत समय तक जीने वाले हुए।

सूत उवाच-
दिव्यं व्रतं समाख्यातं सर्वसौभाग्यवर्द्धनम्। 
कुर्वन्तु विधिवन्नार्य्यः पुत्राणां जीवितेच्छया॥64॥

॥इति॥

  सूतजी ऋषियों से बोले- यह मैंने सुंदर व्रत 
संपूर्ण सौभाग्य को बढ़ाने वाला कहा है
संतान के दीर्घ जीवन की इच्छा वाली स्त्रियां इस व्रत को करें।

इति व्रतकथा समाप्त।

अपनी अपनी मान्यताओं के अनुसार अन्य कथाओं का भी वाचन कर लें।

आरती करें-

विसर्जन - 
हाथ में पुष्प ले लें और आवाहित जीमुतवाहन, 
जीवित्पुत्री तथा चिल्ही के ऊपर पुष्प चढ़ाते हुए प्रार्थना करें -
आवाहनाम् न जानामि ना जानामि विसर्जन्म
न जानामि तवार्चनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर।
मंत्र हीनं क्रिया हीनं भक्ति हीनं सुरेश्वरी
यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु में ।

नवमी में पारण करके, प्रसाद वितरण करें।

🙏प्रेम से बोलो - जीवित्पुत्री की जय🙏














Wednesday, 27 September 2023

#अनन्त #चतुर्दशी

#अनंतचतुर्दशी!! 
अनंतसूत्र के 14 गांठ का रहस्य
            
                ॐ श्रीं अनंताय नमः

अनंत चतुर्दशी व्रत कथा
बहुत समय पहले एक तपस्वी ब्राह्मण था, जिसका नाम सुमंत और पत्नी का नाम दीक्षा था। उनकी सुशीला नाम की एक सुंदर और धर्मपरायण कन्या थी। जब सुशीला कुछ बड़ी हुई तो उसकी मां दीक्षा की मृत्यु हो गई। तब उनके पिता सुमंत ने कर्कशा नाम की स्त्री से विवाह कर लिया। कुछ समय बाद ब्राह्मण सुमंत ने अपनी पुत्री सुशीला का विवाह ऋषि कौंडिण्य के साथ करा दिया। विवाह में कर्कशा ने विदाई के समय अपने जवांई को ईंट और पत्थर के टुकड़े बांध कर दे दिए। ऋषि कौडिण्य को ये व्यवहार बहुत बुरा लगा, वे दुखी मन के साथ अपनी सुशीला को विदा कराकर अपने साथ लेकर चल दिए, चलते-चलते रात्रि का समय हो गया।

तब सुशीला ने देखा कि संध्या के समय नदी के तट पर सुंदर वस्त्र धारण करके स्त्रियां किसी देवता का पूजन कर रही हैं। सुशीला ने जिज्ञाशावश उनसे पूछा तो उन्होंने अनंत व्रत की महत्ता सुनाई, तब सुशीला ने भी यह व्रत किया और पूजा करके चौदह गांठों वाला डोरा हाथ में बांध कर ऋषि कौंडिण्य के पास आकर सारी बात बताई। ऋषि ने उस धागे को तोड़ कर अग्नि में डाल दिया। इससे भगवान अनंत का अपमान हुआ। परिणामस्वरुप ऋषि कौंडिण्य दुखी रहने लगे। उनकी सारी सम्पत्ति नष्ट हो गई और वे दरिद्र हो गए।
एक दिन उन्होंने अपनी पत्नी से कारण पूछा तो सुशीला ने दुख का कारण बताते हुए कहा कि आपने अनंत भगवान का डोरा जलाया है। इसके बाद ऋषि कौंडिण्य को बहुत पश्चाताप हुआ, वे अनंत डोरे को प्राप्त करने के लिए वन चले गए। वन में कई दिनों तक ऐसे ही भटकने के बाद वे एक दिन भूमि पर गिर पड़े। तब भगवान अनंत ने उन्हें दर्शन दिया और कहा कि तुमने मेरा अपमान किया, जिसके कारण तुम्हें इतना कष्ट उठाना पड़ा, लेकिन अब तुमने पश्चाताप कर लिया है, मैं प्रसन्न हूं तुम घर जाकर अनंत व्रत को विधि पूर्वक करो। चौदह वर्षों तक व्रत करने से तुम्हारे सारे कष्ट दूर हो जांएगे और तुम दोबारा संपन्न हो जाओगे। इस प्रकार ऋषि कौंडिण्य ने विधि पूर्वक व्रत किया और उन्हें सारें कष्टों से मुक्ति प्राप्त हुई।
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    अनंत चतुर्दशी के दिन पूजा के बाद बाजू में बांधे जाने वाले अनंत सूत्र में चौदह गांठ होती है. शास्त्रों के अनुसार, ये 14 गांठ वाले सूत्र को 14 लोकों ( भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक, ब्रह्मलोक, अतल, वितल, सतल, रसातल, तलातल, महातल और पाताल लोक) का प्रतीक माना जाता है. अनंत सूत्र के प्रत्येक गांठ प्रत्येक लोक का प्रतिनिधित्व करते हैं.
साथ ही इसे भगवान विष्णु के 14 रूपों (अनंत, ऋषिकेश, पद्मनाभ, माधव, वैकुण्ठ, श्रीधर, त्रिविक्रम, मधुसूदन, वामन, केशव, नारायण, दामोदर और गोविन्द) का भी प्रतीक माना गया है.
कहा जाता है कि,14 लोकों की रचना के बाद इनके संरक्षण व पालन के लिए भगवान 14 रूपों में प्रकट हुए थे और अनंत प्रतीत होने लगे थे. इसलिए अनंत को 14 लोक और भगवान विष्णु के 14 रूपों का प्रतीक माना गया है. 

इतना ही नहीं रेशम या कपास से बना यह सूत्र आपकी रक्षा भी करता है. इसलिए इसे रक्षाकवच कहा जाता है।पूजा के बाद इसे बाजू में बांधने से व्यक्ति को भय से मुक्ति मिलती है और पाप कर्म नष्ट हो जाते हैं. 

मान्यता है कि, जो व्यक्ति पूरे 14 वर्ष तक अनंत चतुर्दशी का व्रत करता है, पूजा-पाठ करता है और चौदह गांठ वाले इस अनंत सूत्र को बांधता है उसे भगवान विष्णु की कृपा से बैकुंठ की प्राप्ति होती है. 
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अनंत चतुर्दशी के उपाय

अनंत चतुर्दशी के दिन कलाई पर चौदह गांठ युक्त रेशमी धागा जरूर बांधें। इस धागे को अनंतसूत्र कहा जाता है।मान्यता है कि विधिवत पूजा करके कलाई पर धागा बांधने से आत्मविश्वास में वृद्धि और सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है।
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   लक्ष्मी प्राप्ति के लिए 21 कमल गट्टे को गाय के घी में डुबोकर पवित्र अग्नि में निम्न लिखित मंत्र से आहुति अवश्य दें। मंत्र:- ॐ श्रीं अनंताय नमः स्वाहा। 
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यदि आप मुसीबतों से छुटकारा पाना चाहते हैं, तो अनंत चतुर्दशी के दिन 14 लौंग लगा हुआ लड्डू सत्यनारायण भगवान को चढ़ाएं। पूजा के बाद इसे किसी चौराहे पर रख दें। ऐसा करने से मुसीबतें आपसे दूर रहेंगी।
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यदि आप या आपके परिवार का कोई सदस्य किसी पुरानी बीमारी से ग्रसित है, तो अनंत चतुर्दशी के दिन अनार उसके सिर से वार कर भगवान सत्य नारायण के कलश पर चढ़ाएं और फिर इसे किसी गाय को खिला दें। ऐसा करने से पुराना से पुराना रोग जल्दी ही ठीक होगा।
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अनंत चतुर्दशी के दिन सत्यनारायण भगवान की पूजा करें। साथ ही कलश पर 14 जायफल रखें। पूजा समाप्त होने के बाद इन जायफल को बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें। ऐसा करने से पुराना से पुराना विवाद भी खत्म हो जाता है।
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Tuesday, 26 September 2023

#श्री #भुवनेश्वरी #सहस्त्रनाम #स्तोत्रं

॥ श्रीभुवनेश्वरी सहस्त्रनामस्तोत्रं ॥

     विनियोगः -अस्य श्रीभुवनेश्वर्या सहस्रनाम स्तोत्रस्य दक्षिणामूर्तिऋषिः पङ्क्तिश्छन्दः आद्या श्रीभुवनेश्वरी देवता, ह्रीं बीजं, श्रीं शक्तिः, क्लीं कीलकं, मम श्रीधर्मार्थकाममोक्षार्थे जपे विनियोगः।

ऋष्यादिन्यासः -
श्रीदक्षिणामूर्तिऋषये नमः शिरसि ।
पङ्क्तिश्छन्दसे नमः मुखे ।
आद्या श्रीभुवनेश्वरीदेवतायै नमः हृदि ।
ह्रीं बीजाय नमः गुह्ये ।
श्रीं शक्तये नमः नाभौ ।
क्लीं कीलकाय नमः पादयोः ।
धर्मार्थकाममोक्षार्थे विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ।

अथ सहस्रनामस्तोत्रम्

आद्या माया परा शक्तिः श्रीं ह्रीं क्लीं भुवनेश्वरी ।
आद्या कमलावाणी भुवनेश्वरी भवमोचनी।
भुवना भावना भव्या भवानी भवभाविनी॥१॥ 

रुद्राणी रुद्रभक्ता च तथा रुद्रप्रिया सती।
उमा कात्यायनी दुर्गा मङ्गला सर्वमङ्गला॥२।।
 
उमा कामेश्वरीत्रिपुरा परमेशानी त्रिपुरासुन्दरी प्रिया।
रमणा रमणी रामा रामकार्यकरी शुभा ॥ ३।।

ब्राह्मी नारायणी चण्डी चामुण्डा मुण्डनायिका।
माहेश्वरी च कौमारी वाराही चापराजिता॥४॥

महामाया मुक्तकेशी महात्रिपुरसुन्दरी ।
सुन्दरी शोभना रक्ता रक्तवस्त्रापिधायिनी॥ ५॥

रक्ताक्षी रक्तवस्त्रा च रक्तबीजातिसुन्दरी।
रक्तचन्दनसिक्ताङ्गी रक्तपुष्पसदाप्रिया॥ ६॥

कमला कामिनी कान्ता कामदेवसदाप्रिया।
लक्ष्मी लोला चञ्चलाक्षी चञ्चला चपला प्रिया॥७॥

भैरवी भयहर्त्री च महाभयविनाशिनी ।
भयङ्करी महाभीमा भयहा भयनाशिनी॥ ८॥

श्मशाने प्रान्तरे दुर्गे संस्मृता भयनाशिनी।
जया च विजया चैव जयपूर्णा जयप्रदा॥ ९॥

यमुना यामुना याम्या यामुनजा यमप्रिया।
सर्वेषां जनिका जन्या जनहा जनवर्धिनी॥ १०॥

काली कपालिनी कुल्ला कालिका कालरात्रिका।
महाकालहृदिस्था च कालभैरवरूपिणी॥ ११॥

कपालखट्वाङ्गधरा पाशाङ्कुशविधारिणी।
अभया च भया चैव तथा च भयनाशिनी॥१२॥

महाभयप्रदात्री च तथा च वरहस्तिनी।
गौरी गौराङ्गिनी गौरा गौरवर्णा जयप्रदा॥१३॥

उग्रा उग्रप्रभा शान्तिः शान्तिदाऽशान्तिनाशिनी।
उग्रतारा तथा चोग्रा नीला चैकजटा तथा॥१४॥

हां हां हूं हूं तथा तारा तथा च सिद्धिकालिका।
तारा नीला च वागीशी तथा नीलसरस्वती ॥ १५।।

गङ्गा काशी सती सत्या सर्वतीर्थमयी तथा।
तीर्थरूपा तीर्थपुण्या तीर्थदा तीर्थसेविका॥१६॥

पुण्यदा पुण्यरूपा च पुण्यकीर्तिप्रकाशिनी।
पुण्यकाला पुण्यसंस्था तथा पुण्यजनप्रिया॥१७॥

तुलसी तोतुलास्तोत्रा राधिका राधनप्रिया।
सत्या सत्यभामा रुक्मिणी कृष्णवल्लभा॥१८॥

देवकी कृष्णमाता च सुभद्रा भद्ररूपिणी।
मनोहरा तथा सौम्या श्यामाङ्गी समदर्शना॥१९॥

घोररूपा घोरतेजा घोरवत्प्रियदर्शना।
कुमारी बालिका क्षुद्रा कुमारीरूपधारिणी॥२०॥

युवती युवतीरूपा युवतीरसरञ्जका।
पीनस्तनी क्षूद्रमध्या प्रौढा मध्या जरातुरा॥२१॥

अतिवृद्धा स्थाणुरूपा चलाङ्गी चञ्चला चला।
देवमाता देवरूपा देवकार्यकरी शुभा॥२२॥

देवमाता दितिर्दक्षा सर्वमाता सनातनी।
पानप्रिया पायनी च पालना पालनप्रिया॥२३॥

मत्स्याशी मांसभक्ष्या च सुधाशी जनवल्लभा।
तपस्विनी तपी तप्या तपःसिद्धिप्रदायिनी॥२४॥

हविष्या च हविर्भोक्त्री हव्यकव्यनिवासिनी।
यजुर्वेदा वश्यकरी यज्ञाङ्गी यज्ञवल्लभा॥२५॥

दक्षा दाक्षायिणी दुर्गा दक्षयज्ञविनाशिनी।
पार्वती पर्वतप्रीता तथा पर्वतवासिनी॥२६॥

हैमी हर्म्या हेमरूपा मेना मान्या मनोरमा।
कैलासवासिनी मुक्ता शर्वक्रीडाविलासिनी॥२७॥

चार्वङ्गी चारुरूपा च सुवक्त्रा च शुभानना।
चलत्कुण्डलगण्डश्रीर्लसत्कुण्डलधारिणी॥२८॥

महासिंहासनस्था च हेमभूषणभूषिता।
हेमाङ्गदा हेमभूषा च सूर्यकोटिसमप्रभा॥२९॥

बालादित्यसमाकान्तिः सिन्दूरार्चितविग्रहा।
यवा यावकरूपा च रक्तचन्दनरूपधृक्॥३०॥

कोटरी कोटराक्षी च निर्लज्जा च दिगम्बरा।
पूतना बालमाता च शून्यालयनिवासिनी॥३१॥

श्मशानवासिनी शून्या हृद्या चतुरवासिनी।
मधुकैटभहन्त्री च महिषासुरघातिनी॥३२॥

निशुम्भशुम्भमथनी चण्डमुण्डविनाशिनी।
शिवाख्या शिवरूपा च शिवदूती शिवप्रिया॥३३॥

शिवदा शिववक्षःस्था शर्वाणी शिवकारिणी।
इन्द्राणी चेन्द्रकन्या च राजकन्या सुरप्रिया॥३४॥

लज्जाशीला साधुशीला कुलस्त्री कुलभूषिका।
महाकुलीना निष्कामा निर्लज्जा कुलभूषणा॥३५॥

कुलीना कुलकन्या च तथा च कुलभूषिता।
अनन्तानन्तरूपा च अनन्तासुरनाशिनी॥३६॥

हसन्ती शिवसङ्गेन वाञ्छितानन्ददायिनी ।
नागाङ्गी नागभूषा च नागहारविधारिणी ॥ ३७।।

धरिणी धारिणी धन्या महासिद्धिप्रदायिनी ।
डाकिनी शाकिनी चैव राकिनी हाकिनी तथा ॥ ३८।।

भूता प्रेता पिशाची च यक्षिणी धनदार्चिता ।
धृतिः कीर्तिः स्मृतिर्मेधा तुष्टिःपुष्टिरुमा रुषा ॥ ३९।।

शाङ्करी शाम्भवी मीना रतिः प्रीतिः स्मरातुरा ।
अनङ्गमदना देवी अनङ्गमदनातुरा ॥ ४०।।

भुवनेशी महामाया तथा भुवनपालिनी ।
ईश्वरी चेश्वरीप्रीता चन्द्रशेखरभूषणा ॥ ४१।।

चित्तानन्दकरी देवी चित्तसंस्था जनस्य च ।
अरूपा बहुरूपा च सर्वरूपा चिदात्मिका ॥ ४२।।

अनन्तरूपिणी नित्या तथानन्तप्रदायिनी ।
नन्दा चानन्दरूपा च तथाऽनन्दप्रकाशिनी ॥ ४३।।

सदानन्दा सदानित्या साधकानन्ददायिनी ।
वनिता तरुणी भव्या भविका च विभाविनी ॥ ४४।।

चन्द्रसूर्यसमा दीप्ता सूर्यवत्परिपालिनी ।
नारसिंही हयग्रीवा हिरण्याक्षविनाशिनी ॥ ४५।।

वैष्णवी विष्णुभक्ता च शालग्रामनिवासिनी ।
चतुर्भुजा चाष्टभुजा सहस्रभुजसंज्ञिता ॥ ४६।।

आद्या कात्यायनी नित्या सर्वाद्या सर्वदायिनी ।
सर्वचन्द्रमयी देवी सर्ववेदमयी शुभा ॥ ४७।।

सवदेवमयी देवी सर्वलोकमयी पुरा ।
सर्वसम्मोहिनी देवी सर्वलोकवशङ्करी ॥ ४८।।

राजिनी रञ्जिनी रागा देहलावण्यरञ्जिता ।
नटी नटप्रिया धूर्ता तथा धूर्तजनार्दिनी ॥ ४९।।

महामाया महामोहा महासत्त्वविमोहिता ।
बलिप्रिया मांसरुचिर्मधुमांसप्रिया सदा ॥ ५०।।

मधुमत्ता माधविका मधुमाधवरूपिका ।
दिवामयी रात्रिमयी सन्ध्या सन्धिस्वरूपिणी ॥ ५१।।

कालरूपा सूक्ष्मरूपा सूक्ष्मिणी चातिसूक्ष्मिणी ।
तिथिरूपा वाररूपा तथा नक्षत्ररूपिणी ॥ ५२।।

सर्वभूतमयी देवी पञ्चभूतनिवासिनी ।
शून्याकारा शून्यरूपा शून्यसंस्था च स्तम्भिनी ॥ ५३।।

आकाशगामिनी देवी ज्योतिश्चक्रनिवासिनी ।
ग्रहाणां स्थितिरूपा च रुद्राणी चक्रसम्भवा ॥ ५४।।

ऋषीणां ब्रह्मपुत्राणां तपःसिद्धिप्रदायिनी ।
अरुन्धती च गायत्री सावित्री सत्त्वरूपिणी ॥ ५५।।

चितासंस्था चितारूपा चित्तसिद्धिप्रदायिनी ।
शवस्था शवरूपा च शवशत्रुनिवासिनी ॥ ५६।।

योगिनी योगरूपा च योगिनां मलहारिणी ।
सुप्रसन्ना महादेवी यामुनी मुक्तिदायिनी ॥ ५७।।

निर्मला विमला शुद्धा शुद्धसत्वा जयप्रदा ।
महाविद्या महामाया मोहिनी विश्वमोहिनी ॥ ५८।।

कार्यसिद्धिकरी देवी सर्वकार्यनिवासिनी ।
कार्यकार्यकरी रौद्री महाप्रलयकारिणी ॥ ५९।।

स्त्रीपुंभेदाह्यभेद्या च भेदिनी भेदनाशिनी ।
सर्वरूपा सर्वमयी अद्वैतानन्दरूपिणी ॥ ६०।।

प्रचण्डा चण्डिका चण्डा चण्डासुरविनाशिनी ।
सुमस्ता बहुमस्ता च छिन्नमस्ताऽसुनाशिनी ॥ ६१।।

अरूपा च विरूपा च चित्ररूपा चिदात्मिका ।
बहुशस्त्रा अशस्त्रा च सर्वशस्त्रप्रहारिणी ॥ ६२।।

शास्त्रार्था शास्त्रवादा च नाना शास्त्रार्थवादिनी ।
काव्यशास्त्रप्रमोदा च काव्यालङ्कारवासिनी ॥ ६३।।

रसज्ञा रसना जिह्वा रसामोदा रसप्रिया ।
नानाकौतुकसंयुक्ता नानारसविलासिनी ॥ ६४।।

अरूपा च स्वरूपा च विरूपा च सुरूपिणी ।
रूपावस्या तथा जीवा वेश्याद्या वेशधारिणी ॥ ६५।।

नानावेशधरा देवी नानावेशेषु संस्थिता ।
कुरूपा कुटिला कृष्णा कृष्णारूपा च कालिका ॥ ६६।।

लक्ष्मीप्रदा महालक्ष्मीः सर्वलक्षणसंयुता ।
कुबेरगृहसंस्था च धनरूपा धनप्रदा ॥ ६७।।

नानारत्नप्रदा देवी रत्नखण्डेषु संस्थिता ।
वर्णसंस्था वर्णरूपा सर्ववर्णमयी सदा ॥ ६८।।

ओङ्काररूपिणी वाच्या आदित्यज्योतीरूपिणी ।
संसारमोचिनी देवी सङ्ग्रामे जयदायिनी ॥ ६९।।

जयरूपा जयाख्या च जयिनी जयदायिनी ।
मानिनी मानरूपा च मानभङ्गप्रणाशिनी ॥ ७०।।

मान्या मानप्रिया मेधा मानिनी मानदायिनी ।
साधकासाधकासाध्या साधिका साधनप्रिया ॥ ७१।।

स्थावरा जङ्गमा प्रोक्ता चपला चपलप्रिया ।
ऋद्धिदा ऋद्धिरूपा च सिद्धिदा सिद्धिदायिनी ॥ ७२।।

क्षेमङ्करी शङ्करी च सर्वसम्मोहकारिणी ।
रञ्जिता रञ्जिनी या च सर्ववाञ्छाप्रदायिनी ॥ ७३।।

भगलिङ्गप्रमोदा च भगलिङ्गनिवासिनी ।
भगरूपा भगाभाग्या लिङ्गरूपा च लिङ्गिनी ॥ ७४।।

भगगीतिर्महाप्रीतिर्लिङ्गगीतिर्महासुखा ।
स्वयम्भूः कुसुमाराध्या स्वयम्भूः कुसुमाकुला ॥ ७५।।

स्वयम्भूः पुष्परूपा च स्वयम्भूः कुसुमप्रिया ।
शुक्रकूपा महाकूपा शुक्रासवनिवासिनी ॥ ७६।।

शुक्रस्था शुक्रिणी शुक्रा शुक्रपूजकपूजिता ।
कामाक्षा कामरूपा च योगिनी पीठवासिनी ॥ ७७।।

सर्वपीठमयी देवी पीठपूजानिवासिनी ।
अक्षमालाधरा देवी पानपात्रविधारिणी ॥ ७८।।

शूलिनी शूलहस्ता च पाशिनी पाशरूपिणी ।
खड्गिनी गदिनी चैव तथा सर्वास्त्रधारिणी ॥ ७९।।

भाव्या भव्या भवानी सा भवमुक्तिप्रदायिनी ।
चतुरा चतुरप्रीता चतुराननपूजिता ॥ ८०।।

देवस्तव्या देवपूज्या सर्वपूज्या सुरेश्वरी ।
जननी जनरूपा च जनानां चित्तहारिणी ॥ ८१।।

जटिला केशबद्धा च सुकेशी केशबद्धिका ।
अहिंसा द्वेषिका द्वेष्या सर्वद्वेषविनाशिनी ॥ ८२।।

उच्चाटिनी द्वेषिनी च मोहिनी मधुराक्षरा ।
क्रीडा क्रीडकलेखाङ्ककारणाकारकारिका ॥ ८३।।

सर्वज्ञा सर्वकार्या च सर्वभक्षा सुरारिहा ।
सर्वरूपा सर्वशान्ता सर्वेषां प्राणरूपिणी ॥ ८४।।

फलश्रुति

इति श्रीभुवनेश्वर्या नामानि कथितानि ते ।
सहस्राणि महादेवि फलं तेषां निगद्यते ॥ ,८५।।

यः पठेत् प्रातरुत्थाय चार्द्धरात्रे तथा प्रिये ।
प्रातःकाले तथा मध्ये सायाह्ने हरवल्लभे ॥ ८६।।

यत्र तत्र पठित्वा च भक्त्या सिद्धिर्न संशयः ।
पठेद् वा पाठयेद् वापि श‍ृणुयाच्छ्रावयेत्तथा ॥ ८७।।

तस्य सर्वं भवेत् सत्यं मनसा यच्च वाञ्छितम् ।
अष्टम्यां च चतुर्दश्यां नवम्यां वा विशेषतः ॥ ८८।।

सर्वमङ्गलसंयुक्ते सङ्क्रातौ शनिभौमयोः ।
यः पठेत् परया भक्त्या देव्या नामसहस्रकम् ॥ ८९।।

तस्य देहे च संस्थानं कुरुते भुवनेश्वरी ।
तस्य कार्यं भवेद् देवि अन्यथा न कथञ्चन ॥ ९०।।

श्मशाने प्रान्तरे वापि शून्यागारे चतुष्पथे ।
चतुष्पथे चैकलिङ्गे मेरुदेशे तथैव च ॥ ९१।।

जलमध्ये वह्निमध्ये सङ्ग्रामे ग्रामशान्तये ।
जपत्वा मन्त्रसहस्रं तु पठेन्नामसहस्रकम् ॥ ९२।।

धूपदीपादिभिश्चैव बलिदानादिकैस्तथा ।
नानाविधैस्तथा देवि नैवेद्यैर्भुवनेश्वरीम् ॥ ९३।।

सम्पूज्य विधिवज्जप्त्वा स्तुत्वा नामसहस्रकैः ।
अचिरात् सिद्धिमाप्नोति साधको नात्र संशयः ॥ ९४।।

तस्य तुष्टा भवेद् देवी सर्वदा भुवनेश्वरी ।
भूर्जपत्रे समालिख्य कुङकुमाद् रक्तचन्दनैः ॥ ९५।।

तथा गोरोचनाद्यैश्च विलिख्य साधकोत्तमः ।
सुतिथौ शुभनक्षत्रे लिखित्वा दक्षिणे भुजे ॥ ९६।।

धारयेत् परया भक्त्या देवीरूपेण पार्वति ! ।
तस्य सिद्धिर्महेशानि अचिराच्च भविष्यति ॥ ९७।।

रणे राजकुले वाऽपि सर्वत्र विजयी भवेत् ।
देवता वशमायाति किं पुनर्मानवादयः ॥ ९८।।

विद्यास्तम्भं जलस्तम्भं करोत्येव न संशयः।
पठेद्वा पाठयेद् वाऽपि देवीभक्त्या च पार्वति॥९९॥

इह भुक्त्वा वरान् भोगान् कृत्वा काव्यार्थविस्तरान्।
अन्तेदेव्या गणत्वं च साधको मुक्तिमाप्नुयात्॥१००॥

प्राप्नोति देवदेवेशि सर्वार्थान्नात्र संशयः।
हीनाङ्गे चातिरिक्ताङ्गे शठाय परशिष्यके॥१०१॥

न दातव्यं महेशानि प्राणान्तेऽपि कदाचन।
शिष्याय मतिशुद्धाय विनीताय महेश्वरि॥१०२॥

दातव्यः स्तवराजश्च सर्वसिद्धिप्रदो भवेत्।
लिखित्वा धारयेद् देहे दुःखं तस्य न जायते॥१०३॥

य इदं भुवनेश्वर्याः स्तवराजं महेश्वरि।
इति ते कथितं देवि भुवनेश्याः सहस्रकम्॥१०४॥

यस्मै कस्मै न दातव्यं विना शिष्याय पार्वति।
सुरतरुवरकान्तं  सिद्धिसाध्यैकसेव्यं।
यदि पठति मनुष्यो नान्यचेताः सदैव।
इह हि सकलभोगान् प्राप्य चान्ते शिवाय।
व्रजति परसमीपं सर्वदा मुक्तिमन्ते॥१०५॥

॥ इति श्रीरुद्रयामले तन्त्रे भुवनेश्वरी सहस्रनामाख्यं स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
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Monday, 25 September 2023

#श्री #वामन #स्तोत्रम् ।।

।।श्री वामन स्तोत्रम् ।।

अदितिरुवाच ।

नमस्ते देवदेवेश सर्वव्यापिञ्जनार्दन ।
सत्त्वादिगुणभेदेन लोकव्य़ापारकारणे ॥ १ ॥

नमस्ते बहुरूपाय अरूपाय नमो नमः ।
सर्वैकाद्भुतरूपाय निर्गुणाय गुणात्मने ॥ २ ॥

नमस्ते लोकनाथाय परमज्ञानरूपिणे ।
सद्भक्तजनवात्सल्यशीलिने मङ्गलात्मने ॥ ३ ॥

यस्यावताररूपाणि ह्यर्चयन्ति मुनीश्वराः ।
तमादिपुरुषं देवं नमामीष्टार्थसिद्धये ॥ ४ ॥

यं न जानन्ति श्रुतयो यं न जायन्ति सूरयः ।
तं नमामि जगद्धेतुं मायिनं तममायिनम् ॥ ५ ॥

यस्य़ावलोकनं चित्रं मायोपद्रववारणं ।
जगद्रूपं जगत्पालं तं वन्दे पद्मजाधवम् ॥ ६ ॥

यो देवस्त्यक्तसङ्गानां शान्तानां करुणार्णवः ।
करोति ह्यात्मना सङ्गं तं वन्दे सङ्गवर्जितम् ॥ ७ ॥

यत्पादाब्जजलक्लिन्नसेवारञ्जितमस्तकाः ।
अवापुः परमां सिद्धिं तं वन्दे सर्ववन्दितम् ॥ ८ ॥

यज्ञेश्वरं यज्ञभुजं यज्ञकर्मसुनिष्ठितं ।
नमामि यज्ञफलदं यज्ञकर्मप्रभोदकम् ॥ ९ ॥

अजामिलोऽपि पापात्मा यन्नामोच्चारणादनु ।
प्राप्तवान्परमं धाम तं वन्दे लोकसाक्षिणम् ॥ १० ॥

ब्रह्माद्या अपि ये देवा यन्मायापाशयन्त्रिताः ।
न जानन्ति परं भावं तं वन्दे सर्वनायकम् ॥ ११ ॥

हृत्पद्मनिलयोऽज्ञानां दूरस्थ इव भाति यः ।
प्रमाणातीतसद्भावं तं वन्दे ज्ञानसाक्षिणम् ॥ १२ ॥

यन्मुखाद्ब्राह्मणो जातो बाहुभ्य़ः क्षत्रियोऽजनि ।
तथैव ऊरुतो वैश्याः पद्भ्यां शूद्रो अजायत ॥ १३ ॥

मनसश्चन्द्रमा जातो जातः सूर्यश्च चक्षुषः ।
मुखादिन्द्रश्चाऽग्निश्च प्राणाद्वायुरजायत ॥ १४ ॥

त्वमिन्द्रः पवनः सोमस्त्वमीशानस्त्वमन्तकः ।
त्वमग्निर्निरृतिश्चैव वरुणस्त्वं दिवाकरः ॥ १५ ॥

देवाश्च स्थावराश्चैव पिशाचाश्चैव राक्षसाः ।
गिरयः सिद्धगन्धर्वा नद्यो भूमिश्च सागराः ॥ १६ ॥

त्वमेव जगतामीशो यन्नामास्ति परात्परः ।
त्वद्रूपमखिलं तस्मात्पुत्रान्मे पाहि श्रीहरे ॥ १७ ॥

इति स्तुत्वा देवधात्री देवं नत्वा पुनः पुनः ।
उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा हर्षाश्रुक्षालितस्तनी ॥ १८ ॥

अनुग्राह्यास्मि देवेश हरे सर्वादिकारण ।
अकण्टकश्रियं देहि मत्सुतानां दिवौकसाम् ॥ १९ ॥

अन्तर्यामिन् जगद्रूप सर्वभूत परेश्वर ।
तवाज्ञातं किमस्तीह किं मां मोहयसि प्रभो ॥ २० ॥

तथापि तव वक्ष्यामि यन्मे मनसि वर्तते ।
वृथापुत्रास्मि देवेश रक्षोभिः परिपीडिता ॥ २१ ॥

एतन्न हन्तुमिच्छामि मत्सुता दितिजा यतः ।
तानहत्वा श्रियं देहि मत्सुतानामुवाच सा ॥ २२ ॥

इत्युक्तो देवदेवस्तु पुनः प्रीतिमुपागतः ।
उवाच हर्षयन्साध्वीं कृपयाऽभि परिप्लुतः ॥ २३ ॥

श्री भगवानुवाच ।

प्रीतोऽस्मि देवि भद्रं ते भविष्यामि सुतस्तव ।
यतः सपत्नीतनयेष्वपि वात्सल्यशालिनी ॥ २४ ॥

त्वया च मे कृतं स्तोत्रं पठन्ति भुवि मानवाः ।
तेषां पुत्रो धनं सम्पन्न हीयन्ते कदाचन ॥ २५ ॥

अन्ते मत्पदमाप्नोति यद्विष्णोः परमं शुभं ।
|| इति श्रीपद्मपुराणे श्री वामन स्तोत्रं ||

Saturday, 23 September 2023

#श्री #गणेश #चालीसा

॥श्रीगणेश चालीसा॥
जय गणपति सद्‌गुण सदन,
कविवर बदन कृपाल। 
विघ्न हरण मंगल करण,
जय जय गिरिजा लाल॥
बुद्धि भरण अशरण शरण,
हरण अमंगल जाल।
सिद्धि- सदन करिवर वदन, 
जय-जय गिरिजा लाल॥
गहत चरण रज गज बदन, 
लहत परम पद लक्ष।
कटत अगन अघ तन अघट, 
रटत सकल भय भक्ष॥
जय जय जय गणपति गणराजू । 
मंगल भरण करण शुभ काजू॥
जय गजबदन सदन सुख दाता।
विश्व विनायक बुद्धि-विधाता॥
वक्रतुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन।
तिलक त्रिपुण्डभाल मन भावन॥
अर्द्धचन्द्र मस्तक पर सोहै।
छवि लखि सुर-नर मुनि मन मोहै॥
राजित मणि मुक्तन उर माला।
स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥
पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलम्।
मोदक भोग सुगन्धित फूलम्॥
सुन्दर पीताम्बर तन साजित।
चरणपादुका मुनि मन राजित॥
ऋद्धि-सिद्धि तव चँवर सुढारे।
मूषक वाहन सोहत द्वारे॥
कहौं जन्म शुभ कथा तुम्हारी।
एक समय गिरिराज कुमारी॥
बनयो बदन मैल की मूरति।
अति छविवन्त मोहिनी सूरति॥
सो द्वारे ड्योढ़ी पर लाई।
द्वारपाल करि तुमहिं बैठाई॥
असुर एक शिव रूप बनावै।
छल करनो हित घत लगावै॥
ताहि समय शंकर जी आयो।
बिनु पहिचान जान नहि पायौ॥
पूछहिं शिव तुम केहिके लाला।
बोलत भे तुम वचन रसाला॥
मैं गिरिजा सुत तुमहिं बतावत।
बिनु चीन्हें कोउ जान न पावत॥
भवन धरो जनि पांव उभारी।
अहै कौन पहिचान तुम्हारी॥
आवहिं मातु बूझि तब जाओ।
बालक से जानि रारि बढ़ाओ॥
धरयो शंभु जब पांव अगारी।
मच्यो तुरत सरवर तब भारी॥
तत्क्षण कछु शंका उर वाली।
शिव तिरशूल भूल बस मारी॥
सिरस फूल सम शिर कटि गयऊ।
चट उड़ि गगन लोप तहं भयऊ॥
शंभु गए जब भवन मंझारी।
बैठी जहं गिरी राजकुमारी॥
कहन लगे शिव मन सकुचाये।
कहो सति सुत कहं ते जाये॥
तुरतहिं कथा प्रगट ह्वै सारी।
करी सोच गिरिजा मन भारी॥
कियो न भल स्वामी तुम जाओ।
लाओ सुवन जहां से पाओ॥
चले तुरत सुनि शिव विज्ञानी।
चट एक हस्ती के सिर आनी॥
धड़ ऊपर थापित करि दीन्हें।
प्राण वायु संचालन कीन्हें॥
नाम गणेश शंभु तव कीन्हें।
बनहु बुद्धि निधि अब वर दीन्हें॥
प्रथम पूज्य तुम हो सुखदाता।
अति शुचि विद्या बुद्धि सुज्ञाता॥
नाम तुम्हार प्रथम लै कोई।
कारज करें सकल सिद्धि होती॥
तुम सुमिरत सुख संपति नाना।
तुम्हें विसारे नहीं कल्याना॥
तुम्हारो शाप आज जग अंकित।
चौथ मयंक भयो अकलंकित॥
बुद्धि परीक्षा तुहिं शिव कीन्हें।
पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥
चले षडानन भरमि भुलाई।
रचि बैठे तुम बुद्धि उपाई॥
राम नाम लिखि महि पर अंका।
सात भंवर दी करी न शंका॥
धनि गणेश कहि शिव मन हर्षे।
नभते सुरन सुमन बहु वर्षे॥
तुम्हरि महिमा बुद्धि बड़ाई।
शेष सहसमुख सके न गाई॥
मैं मति हीन मलीन दुखारी। 
करौं कौन विधि विनय तुम्हारी॥
भजत राम सुंदर प्रभु दासा।
लग प्रयाग ककरा दुर्वासा॥
अब प्रभु दया दीन पर कीजै।
अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजिए॥
श्री गणेश यह चालीसा,
पाठ करें धरि ध्यान।
नित नव मंगल गृह लहै,
मिलै जगत सनमान॥
दुई सहस्त्र दस विक्रमी,
कृष्ण भाद्र तिथि गंगा।
पूरण चालीसा भयो,
सुंदर भक्ति अभंग॥
॥इति श्री गणेश चालीसा॥





Friday, 22 September 2023

#सन्तान #लक्ष्मी

#श्रीसन्तान #लक्ष्मी नामावलिः॥

ध्यानम् -
अयि खगवाहिनी मोहिनि चक्रिणि रागविवर्धिनि ज्ञानमये ।
गुणगणवारिधि लोकहितैषिणि सप्तस्वर भूषित गाननुते ।
सकल सुरासुर देव मुनीश्वर मानव वन्दित पादयुते ।
जय जय हे मधुसूदन कामिनि सन्तानलक्ष्मि परिपालय माम् ।

(ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं लक्ष्मीनारायणाय नमः।) 

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं सन्तानलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लींअसुरघ्न्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लींअर्चितायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लींअमृतप्रसवे नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लींअकाररूपायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लींअयोध्यायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लींअश्विन्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लींअमरवल्लभायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लींअखण्डितायुषे नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं इन्दुनिभाननायै नमः १०

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं इज्यायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं इन्द्रादिस्तुतायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं उत्तमायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं उत्कृष्टवर्णायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं उर्व्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं कमलस्रग्धरायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं कामवरदायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं कमठाकृत्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं काञ्चीकलापरम्यायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं कमलासनसंस्तुतायै नमः । २०

ॐ ह्रीं श्रीं क्लींकम्बीजायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं कौत्सवरदायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं कामरूपनिवासिन्यै नमः।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं खड्गिन्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं गुणरूपायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं गुणोद्धतायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं गोपालरूपिण्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं गोप्त्र्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं गहनायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं गोधनप्रदायै नमः ।३०

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं चित्स्वरूपायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं चराचरायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं चित्रिण्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं चित्रायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं गुरुतमायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं गम्यायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं गोदायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं गुरुसुतप्रदायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ताम्रपर्ण्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं तीर्थमय्यै नमः । ४०

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं तापस्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं तापसप्रियायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लींत्र्यैलोक्यपूजितायै  नमः। 
ॐ ह्रीं श्रीं क्लींजनमोहिन्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लींजलमूर्त्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लींजगद्बीजायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लींजनन्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लींजन्मनाशिन्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लींजगद्धात्र्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लींजितेन्द्रियायै नमः ।५०

ॐ ह्रीं श्रीं क्लींज्योतिर्जायायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लींद्रौपद्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं देवमात्रे नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं दुर्धर्षायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं दीधितिप्रदायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं दशाननहरायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं डोलायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं द्युत्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लींदीप्तायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं नुत्यै नमः । ६०
 
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं निषुम्भघ्न्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं नर्मदायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं नक्षत्राख्यायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं नन्दिन्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं पद्मिन्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं पद्मकोशाक्ष्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं पुण्डलीकवरप्रदायै नमः।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं पुराणपरमायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं प्रीत्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं भालनेत्रायै नमः ।७०

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं भैरव्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं भूतिदायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं भ्रामर्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं भ्रमायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं भूर्भुवस्वः स्वरूपिण्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं मायायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं मृगाक्ष्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं मोहहन्त्र्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं मनस्विन्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महेप्सितप्रदायै नमः। ८०

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं मात्रमदहृतायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं मदिरेक्षणायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं युद्धज्ञायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं यदुवंशजायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं यादवार्तिहरायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं युक्तायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं यक्षिण्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं यवनार्दिन्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं लक्ष्म्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं लावण्यरूपायै नमः ।९०

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ललितायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं लोललोचनायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं लीलावत्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं लक्षरूपायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं विमलायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं वसवे नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं व्यालरूपायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं वैद्यविद्यायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं वासिष्ठ्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं वीर्यदायिन्यै नमः । १००

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं शबलायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं शान्तायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं शक्तायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं शोकविनाशिन्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं शत्रुमार्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं शत्रुरूपायै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं सरस्वत्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं सुश्रोण्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं सुमुख्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं हावभूम्यै नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं हास्यप्रियायै नमः । १११
॥ ॐ ॥
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संतान लक्ष्मी के १०८ नाम!! 
सन्तान की उन्नति और रक्षा के लिए मां संतान लक्ष्मी जी की उपासना की जाती है।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏


त्रिपिण्डी पूजन #पितृ शांति

♨️ #त्रिपिण्डी #पूजन क्यों करें?    पितरों की शांति के लिए किया जाने वाला विशेष कर्म ⁉️क्या आपके परिवार में बार-बार ऐसी परेशानियाँ आती हैं,...