Tuesday, 22 September 2026

त्रिपिण्डी पूजन #पितृ शांति

♨️ #त्रिपिण्डी #पूजन क्यों करें?

  पितरों की शांति के लिए किया जाने वाला विशेष कर्म

⁉️क्या आपके परिवार में बार-बार ऐसी परेशानियाँ आती हैं, जिनका कोई स्पष्ट कारण समझ नहीं आता?
⁉️कभी विवाह में लगातार बाधा…
⁉️कभी संतान से जुड़ी चिंता…
⁉️कभी घर में बिना कारण अशांति…
⁉️और कभी ऐसा लगता है जैसे परिवार में कुछ अधूरा-सा रह गया है।
👉🏻ऐसी परिस्थितियों में आपने शायद पितृदोष या त्रिपिण्डी पूजन के बारे में सुना होगा।
लेकिन आखिर—

त्रिपिण्डी पूजन क्या है?❓
इसे क्यों किया जाता है?❓
और क्या हर व्यक्ति को त्रिपिण्डी पूजन करवाना चाहिए?❓

आज हम इसी विषय को सरल भाषा में समझेंगे।
   
      1️⃣ पितरों का हमारे जीवनमें क्या स्थान है?
👉🏻सनातन परंपरा में मनुष्य को केवल अपने वर्तमान जीवन तक सीमित नहीं माना गया।
हमसे पहले भी अनेक पीढ़ियाँ इस संसार में आईं।
हमारे माता-पिता, दादा-दादी, परदादा-परदादी और उनसे भी पहले के पूर्वज…
उन्होंने अपना जीवन जिया, परिवार को आगे बढ़ाया और उसी वंश परंपरा का एक हिस्सा आज हम हैं।
इसीलिए सनातन धर्म में पितृ ऋण की बात कही गई है।
इसका अर्थ केवल कोई डर या दोष नहीं है।
इसका एक गहरा भाव है—
“हम अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञ हैं।”
श्राद्ध, तर्पण और पितरों का स्मरण इसी कृतज्ञता की परंपरा का हिस्सा हैं।
    
  2️⃣. त्रिपिण्डी का अर्थ क्या है?
👉🏻अब सवाल आता है कि आखिर त्रिपिण्डी क्यों?
“त्रि” अर्थात तीन और “पिण्ड” अर्थात पिण्ड अर्पण।
त्रिपिण्डी कर्म में पिण्ड, तर्पण और मंत्र आदि के माध्यम से पितरों के निमित्त विशेष धार्मिक कर्म किया जाता है।
अलग-अलग परंपराओं और विधानों में इसके विवरण में कुछ अंतर मिलते हैं।
कई परंपराओं में तीन पिण्डों को पितृ-परंपरा से जोड़ा जाता है।
इसलिए इसे केवल एक पूजा न समझकर पितरों के प्रति श्रद्धा और शांति की प्रार्थना का विशेष विधान समझना चाहिए।
      
       3️⃣. त्रिपिण्डी पूजन कब किया जाता है?
👉🏻परंपरा में त्रिपिण्डी श्राद्ध को विशेष परिस्थितियों में किया जाने वाला कर्म माना गया है।
विशेषकर तब, जब किसी कारण से पूर्वजों के निमित्त किए जाने वाले कर्म अधूरे रह गए हों या परिवार में पितृ-संबंधी धार्मिक शांति के लिए विशेष अनुष्ठान की आवश्यकता मानी जाए।
कभी-कभी किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उचित संस्कार न हो पाना, श्राद्ध कर्मों का लंबे समय तक न होना या पितरों के प्रति किए जाने वाले धार्मिक कर्तव्यों में व्यवधान जैसी परिस्थितियों में भी आचार्य त्रिपिण्डी कर्म का सुझाव देते हैं।
लेकिन यहाँ एक बात बहुत महत्वपूर्ण है।
परिवार में आने वाली हर परेशानी को पितृदोष मान लेना उचित नहीं है।
किसी बीमारी का कारण चिकित्सा से जुड़ा हो सकता है।
आर्थिक परेशानी का कारण आर्थिक परिस्थितियाँ हो सकती हैं।
और पारिवारिक समस्या का कारण आपसी व्यवहार भी हो सकता है।
इसलिए धार्मिक कर्म को श्रद्धा से करें, लेकिन जीवन की वास्तविक समस्याओं के व्यावहारिक समाधान को भी साथ लेकर चलें।
   
         4️⃣. क्या त्रिपिण्डी पूजन डर के कारण करना चाहिए?
👉🏻नहीं।
यह बात विशेष रूप से समझने की जरूरत है।
कई बार लोगों को डराया जाता है—
“अगर त्रिपिण्डी नहीं कराई तो परिवार में अनर्थ हो जाएगा।”
ऐसा भय पैदा करना उचित नहीं है।
सनातन परंपरा में श्रद्धा का स्थान भय से ऊपर है।
पितरों का स्मरण इसलिए नहीं कि हम उनसे डरते हैं।
बल्कि इसलिए कि हम उन्हें सम्मान देते हैं।
जिस प्रकार हम अपने जीवित माता-पिता के प्रति कृतज्ञ होते हैं, उसी प्रकार अपने दिवंगत पूर्वजों को भी श्रद्धापूर्वक याद करना हमारी परंपरा का हिस्सा है।
     
           5️⃣. त्रिपिण्डी पूजन में क्या भाव होना चाहिए?
👉🏻कल्पना कीजिए…
एक परिवार अपने पूर्वजों को याद करता है।
उनके नाम याद करता है।
उनके लिए जल अर्पित करता है।
पिण्ड अर्पित करता है।
और मन से कहता है—
“आप जहाँ भी हों, आपको शांति मिले।
आपकी कृपा और आशीर्वाद हमारे परिवार पर बना रहे।
हम आपके प्रति कृतज्ञ हैं।”
यही इस कर्म का सबसे सुंदर भाव है।
यह केवल किसी “दोष” को हटाने का प्रयास नहीं है।
यह अपनी जड़ों को याद करने का संस्कार भी है।
   
          6️⃣. क्या हर व्यक्ति को त्रिपिण्डी पूजन करवाना चाहिए?
👉🏻यह भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।
हर व्यक्ति को बिना कारण त्रिपिण्डी पूजन करवाना आवश्यक नहीं कहा जा सकता।
यदि किसी विशेष पारिवारिक परिस्थिति के कारण इसकी आवश्यकता महसूस हो, तो अपने कुलाचार, परिवार की परंपरा और योग्य आचार्य से परामर्श करके विधि निर्धारित करना उचित है।
क्योंकि अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में श्राद्ध तथा पितृ कर्म की विधियों में अंतर पाया जाता है।
इसलिए इंटरनेट पर देखकर स्वयं कोई जटिल कर्मकांड करने के बजाय किसी योग्य विद्वान से सही विधि समझना बेहतर है।
   
   7️⃣. त्रिपिण्डी और पितृदोष को कैसे समझें?
👉🏻पितृदोष की अवधारणा मुख्यतः ज्योतिष और धार्मिक परंपराओं से जुड़ी हुई है।
इसलिए इसे समझते समय दो बातों को अलग रखना चाहिए।
धार्मिक दृष्टि से — यह पितरों की शांति और उनसे जुड़े कर्मों के संदर्भ में देखा जाता है।
व्यावहारिक दृष्टि से — परिवार की समस्याओं के वास्तविक कारणों को भी समझना जरूरी है।
इसलिए यदि कोई व्यक्ति त्रिपिण्डी पूजन करता है तो उसे इसे आस्था, श्रद्धा और कृतज्ञता के कर्म के रूप में करना चाहिए, न कि भय और अंधविश्वास के दबाव में।
    
       8️⃣. सबसे बड़ी बात 
👉🏻हम अक्सर अपने भविष्य की चिंता में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि अपनी जड़ों को भूल जाते हैं।
लेकिन जिस वृक्ष की जड़ें मजबूत होती हैं, वही वृक्ष मजबूती से खड़ा रहता है।
हमारा परिवार भी एक वृक्ष की तरह है।
हम उसकी एक शाखा हैं।
हमसे पहले कई पीढ़ियाँ उसकी जड़ रही हैं।
इसलिए पितरों का स्मरण हमें केवल धार्मिक कर्म नहीं सिखाता…
यह हमें कृतज्ञ होना सिखाता है।
           
          🙂‍↕️भावपूर्ण संदेश
तो अगर आप त्रिपिण्डी पूजन करवाने का विचार कर रहे हैं, तो सबसे पहले 
👉🏻मन से भय निकाल दीजिए।
👉🏻इसे किसी अनिष्ट के डर से नहीं…
श्रद्धा से करें।
👉🏻अपने पूर्वजों को याद करें।
👉🏻उनके प्रति कृतज्ञ हों।
👉🏻और प्रार्थना करें—
 
🙏🏻“हे हमारे पितृगण,
आपको शांति प्राप्त हो।
आपकी आत्मा का कल्याण हो।
आपका आशीर्वाद हमारे परिवार पर बना रहे।
हम आपके प्रति श्रद्धावनत हैं।”

👉🏻क्योंकि पितरों का स्मरण केवल अतीत को याद करना नहीं है…
यह अपनी जड़ों को प्रणाम करना है।
हर हर महादेव।
ॐ शांति: शांति: शांति

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मंदिर में दर्शन के बाद क्यों करें आत्मचिंतन और ध्यान?

मंदिर में दर्शन के बाद क्यों करें आत्मचिंतन और ध्यान?

#मंदिर जाना केवल भगवान की मूर्ति के सामने खड़े होकर दर्शन कर लेने तक सीमित नहीं है। दर्शन की वास्तविक साधना तब शुरू होती है, जब हम मंदिर से बाहर आकर उस दिव्य स्वरूप को अपने अंतर्मन में धारण करने का प्रयास करते हैं।

जब मंदिर में भगवान के #दर्शन हो जाएँ, तो तुरंत वहाँ से चले जाने के बजाय कुछ समय मंदिर की सीढ़ियों पर शांत होकर बैठना चाहिए। अपने नेत्र बंद करके कुछ क्षण पहले किए गए दर्शन को स्मरण करें।

जिस स्वरूप का आपने मंदिर के भीतर दर्शन किया है, उसी स्वरूप को अपने मन में देखने का प्रयास करें। भगवान की प्रतिमा का जो रूप आपने अपनी आँखों से देखा था, उसे अब अपने अंतर्मन में अनुभव करने का प्रयास करें।

इसके बाद अपने निज आत्मस्वरूप का ध्यान करें। स्वयं के भीतर उस दिव्य सत्ता का #अनुभव करने की कोशिश करें, जिसके दर्शन आपने मंदिर में किए हैं।

यहाँ उद्देश्य केवल बाहरी रूप को याद करना नहीं, बल्कि उस दर्शन को अपने भीतर उतारना है।

यदि नेत्र बंद करने पर भगवान का वही स्वरूप ध्यान में नहीं आता, मन स्थिर नहीं होता या भीतर वह दिव्य अनुभूति स्थापित नहीं हो पाती, तो दोबारा मंदिर में जाकर भगवान के दर्शन किए जा सकते हैं।

फिर कुछ समय शांत होकर बाहर बैठें और पुनः नेत्र बंद करके उसी स्वरूप का ध्यान करें।

इस प्रकार मंदिर का दर्शन धीरे-धीरे बाहरी दर्शन से आंतरिक ध्यान की ओर ले जाने वाला अभ्यास बन सकता है।

मंदिर में भगवान बाहर विराजमान दिखाई देते हैं, लेकिन साधना का उद्देश्य यह स्मरण करना भी है कि वही परम सत्ता हमारे भीतर भी विद्यमान है।

इसलिए अगली बार जब मंदिर जाएँ, तो दर्शन के बाद कुछ क्षण अवश्य रुकें।

नेत्र बंद करें।
भगवान के स्वरूप को स्मरण करें।
अपने निज आत्मस्वरूप का ध्यान करें।
और प्रयास करें कि मंदिर में किया हुआ दर्शन आपके भीतर भी जीवंत हो जाए।

यही दर्शन को केवल देखने से आगे बढ़ाकर अंतर-दर्शन की साधना बना देता है।

॥ हरि ॐ तत्सत् ॥


श्रीसूक्त युक्त महालक्ष्मी स्तोत्र

॥ श्रीसूक्तयुक्त महालक्ष्मीस्तोत्र पुष्पमाला॥ 

लक्ष्मी प्राप्ति के लिए आज से 15 दिन नित्य पढ़ें।।
 ~श्री महालक्ष्मी ध्यानम।।~         
🪷वन्दे लक्ष्मीं परशिवमयीं शुद्धजाम्बूनदाभां 
तेजोरूपां कनकवसनां सर्वभूषोज्ज्वलांगीम्।
बीजापूरं कनककलशं हेमपद्मद्घानां
माद्यां शक्तिं आद्यविष्णुवामांकसंस्थिताम्॥

🪷कान्त्या काञ्चनसन्निभां हिमगिरि प्रख्यैश्चचतुर्भिर्गंजै 
हंस्तोत्क्षिप्त हिरण्मयामृतघटेरा सिंच्ययमानां श्रियम्। 
बिभ्राणां वरमब्जयुग्ममभयं हस्तं किरीटोज्ज्वलां 
क्षौमा बद्धनितम्बबिम्बलसितां वन्देरविन्दस्थिताम्॥

🪷अरुण कमल संस्था तद्रज:पुंज वर्णा
कर कमल घृतेष्ठा भीति युग्माम्बु जाता। 
मणिमुकट विचित्रालंकृता कल्प जालै:
सकल भुवन माता सन्ततम् श्रीं श्रिये नमः॥

🪷त्वं श्रीरूपेन्द्रसदने मदनैकमाता
ज्योत्स्नासि चन्द्रमसि चन्द्रमनोहरास्ये। 
सूर्ये प्रभासित जगतित्त्रय प्रभासि 
लक्ष्मि प्रसीद सततं नमतां शरण्ये ॥ 

🪷त्वं जातवेदसि सदा दहनात्मशक्ति 
वैधास्त्वया जगदिदं विविधं विदध्यात। 
विश्वम्भरोऽपि विभुयादखिलं भवत्या 
लक्ष्मि प्रसीद सततं नमतां शरण्ये ॥
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♻️ ॐ हिरण्यवर्णा हरिणीं सुवर्णरजतनजाम् । 
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मी जातवेदा म आवह ॥१॥

♻️तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् । 
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् ॥२॥

♻️अश्वपूर्वा रथमध्यां हस्तिनाद प्रबोधिनीम्। 
श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम् ‌॥३॥

♻️कांसोस्मितां हिरण्यप्रकारामार्द्रा ज्वलन्ती तृप्तां तर्पयन्ति
पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥४॥

,♻️चन्द्राप्रभासांं यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामूदाराम
तां पद्मनेमि शरणं प्रपद्ये अलक्ष्मीम्मे नश्यतां त्वां वृणै॥५॥

♻️आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव: वृक्षोथबिल्व: तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्चबाह्या अलक्ष्मीं: ॥६॥

♻️उपैतु मां देव सखः कीर्तिश्च मणिना सह। 
प्रादुर्भूतो सुराष्ट्रेऽस्मिन्कीर्तिमृद्धि ददातु मे ॥७॥

♻️क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम् ।
अभूतिमसमृद्धि च सर्वा निर्णुद में गृहात् ॥८॥

♻️गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् ।
ईश्वरी सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥९॥

♻️ मनस काममाकूति वाच सत्यमशीमहि ।
पशुनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ॥१०॥

♻️कर्दमेन प्रजा भूता मयि सम्भव कर्दम । 
श्रियं वासय में कुले मातरं पद्ममालिनीम् ॥११॥

♻️आपः स्त्रजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत बस मे गृहे । 
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय में कुले॥१२॥

♻️आर्द्रा पुष्करिणीं पुष्टि पिंगला (सुवर्णा हेम) पद्ममालिनी चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मी जातवेदा म आवह ॥१३॥

♻️ आर्द्रा यः करिणीं यष्टिं सुवर्णा हेममालिनीम् । सूर्याहिरण्मयों, लक्ष्मीं जातवेदा म आवह ॥१४॥

♻️ ता म आवह जातवेदा लक्ष्मीमनपगामिनीम् । 
यस्यां हिरण्यं प्रभूति गावो दास्यो श्वान्विन्देयं पुरूषानहम् ॥१५॥

♻️ यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम् । 
सूक्त पञ्चदशर्च च श्रीकामः सततं जपेत् ॥१६॥
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🍂पदमानने पदमिनी पदमपत्रे पदमप्रिये पदमदलयताक्षी
विश्वप्रिये विश्वमनोऽकूले त्वमत्पादपदम मयि सन्निधत्स्व ॥१७॥

🍂 पदमानने पद्म उरू पदमाक्षी पदमसंभवे
तन्मे भजसि पदमाक्षी येन सौख्यं लभाम्यहम॥१८॥

🍂 अश्वदायी च गोदायी धनदायी महाधने
धनं में जुषताम् देवी सर्व कामाश्च देही में॥१९॥ 

🍂पुत्र पौत्र धनं धान्यं हस्त्याश्ववादि गजे रथम 
प्रजानां भव सीमान्त आयुष्यन्तं करोतु माम् ॥२०॥

🍂 धनमग्निर्धनं वायुर्धनं सूर्यो धनं बसु: 
धनमिन्द्रो वृहस्पतिर्वरूणो धनम अश्विना॥२१॥

🍂वैनतेयं सोमं पिबं सोमं पिबतु वृत्रहा
सोमं धनस्य सोमिनो मह्यं ददातु सोमिन;॥२२॥

🍂न क्रोधो न च मात्सर्य न लोभो नाशुभा मति:
भवन्ति कृतपुण्याणां भक्तानां सूक्तजापिनाम् ॥२३॥

🍂श्रीः सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतरे शुभगन्धमात्यशोभे
भगवति हरिबल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम्॥२४॥

🍂 विष्णु पत्नीं क्षमा देवी माधवी माधवप्रियाम
विष्णु प्रियां सखी देवी नमाम्य अच्युतवल्लभां ॥२५॥

 🍂ॐ महालक्ष्म्यै च विदमहे, विष्णुपत्न्यै च धीमहि ,तन्नौ लक्ष्मी प्रचोदयात् ॥२६॥

🍂आनन्दः कर्दमश्चैव चिक्लीत इति विश्रुता ।
ऋषय: श्रिय: पुत्राश्च श्रीर्देवी र्देवता मता:॥२७॥  

🍂ऋणरोगादि दारिद्यं पापं च अपमृत्यव:
भय शोक मनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा ॥२८॥

🍂 श्रीर्वचस्वमायुष्यमारोग्यमा विद्याचछोभमानं महीयते
धनं धान्यम पशुम बहुपुत्रलाभं शतसंवत्सर दीर्घमायु ॥२९॥
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🌺 या लक्ष्मी सिंधु सम्भूता धेनु भूत पुरू वसु
पदमा विश्वावसु देवी सदा तो च सतां गृहे ॥३०॥
 
🌺 या सा पद्मासनस्था विपुलकटितटी पद्मपत्रायताक्षी । गम्भीरा वर्तनाभिः स्तनघनन मितां शुभ्रा वस्त्रोत्तरीया॥३१॥

🌺 या लक्ष्मी दिव्यैर्गजैन्द्र मणिगण रचिता स्नापिता हेमकुम्भैः 
नित्यं सा पदमहस्ता मम वसतु गृहे सर्वमाङ्गल्ययुक्ता॥३२॥

🌺 लक्ष्मीं क्षीरसमुद्र राजतनयां श्रीरङ्गधामेश्वरीम् । दासीभूतसमस्त देव वनितां त्रिलोकैक दीपांकुराम् ॥३३॥

🌺 श्रीमन्मन्दकटाक्षलब्ध यत ब्रह्मेन्द्रगङ्गाधराम् ।
त्वां त्रैलोक्य कुटुम्बिनीं सरसिजां वन्दे मुकुन्दप्रियाम् ॥३४॥

🌺 या रक्ताम्बुज वासिनी विलासिनी चण्डान्शु तेजस्विनी।
या रक्ता रूधिराम्बरा हरिसखी या श्रीहरिमनोऽलहादिनी ॥३५॥

🌺 या रत्नाकर मंथनात्प्रकटिता विष्णोर्स्वया गेहिनी।
साम् माम् पातु मनोरमा भगवती लक्ष्मीश्च पद्मावती ॥३६॥

🌺 ॐ हरिणीन्तु हरेः पत्नि दारिद्रय परिहारिणीम् ।
 प्रपद्ये हं हरिद्राभां हरिणाक्षीं हिरण्मयीम् ॥३७॥

🌺 वरांकुशौ पाशाम भीतिमुद्राम करैर्वहन्ती ।
कमलासनस्थामबालार्क कोटि प्रतिभां
त्रिनेत्राम भजेहं आद्या जगदीश्वरी त्वाम ॥३८॥

🌺 चन्द्रप्रभाम लक्षमीमेशानी सूर्यप्रभाम लक्ष्मी परमेश्वरीम।
चंद्र सूर्याग्नि संकाशां श्रियं देवीमुपास्महे ॥३९॥

🌺 सिद्व लक्ष्मी मोक्षलक्ष्मी जयलक्ष्मी र्सरस्वती।
श्रीलक्ष्मीर्वरलक्ष्मीश्च प्रसन्ना मम सर्वदा ॥४०॥

🌺 नमः कल्याणदे देवि नमोऽस्तु हरिवल्लभे ।
नमो भक्तप्रिये देवि लक्ष्मीदेवि नमोऽस्तुते॥४१॥

🌺 नमो मायापतिगृहीतांगी नमोस्तु हरिवल्लभे ।
सर्वेश्वरि नमस्तुभ्यं लक्ष्मीदेवि नमोऽस्तुते ॥४२॥

🌺 महामाये विष्णुधर्मपत्नीरूपे हरिप्रिये ।
वाञ्छादात्रि सुरेशानि लक्ष्मीदेवि नमोऽस्तुते ॥४३॥

🌺 उद्यद्भानु सहस्राभे नयनत्रयभूषिते ।
रत्नाधारे सुरेशानि लक्ष्मीदेवि नमोऽस्तुते ॥४४॥

🌺 विचित्रवसने देवि भवदुःखविनाशिनि ।
कुचभारनते देवि लक्ष्मीदेवि नमोऽस्तुते ॥४५॥

🌺 साधकाभीष्टदे देवि अन्नदानरतेऽनधे ।
विष्ण्वानन्दप्रदे मातर्लक्ष्मीदेवि नमोऽस्तुते ॥४६॥

 🌺 षट्कोणपद्ममध्यस्थे षडंगयुवतीमये ।
ब्रह्माण्यादिस्वरूपे व लक्ष्मीदेवि नमोऽस्तुते ॥४७॥

🌺 देवि त्वं चन्द्रवदने सर्व साम्राज्यदायिनी। 
सर्वानन्दकरे देवि लक्ष्मीदेवि नमोऽस्तुते ॥४८॥

🌺 महादेवी महालक्ष्मी नमस्ते त्वं विष्णु प्रिये । 
शक्तिदायी महालक्ष्मी नमस्ते दुःख भंजनि ॥४९॥

🌺 श्रैया प्राप्ति निमित्ताय महालक्ष्मी नमाम्यहम ।
पतितो द्धारीणि देवी नमाम्यहं पुनः पुनः ॥५०॥

🌺 वेदांस्त्वां संस्तुवन्ति ही शास्त्राणि च मुहपुः । 
देवास्त्वां प्रणमन्तिही लक्ष्मीदेवी नमोऽस्तुते ॥५१॥

🌺नमस्ते महालक्ष्मी, नमस्ते भवभंजनी । 
भुक्तिमुक्ति न लभ्यते महादेवी त्ययि कृपा बिना ॥५२॥

🌺 सुख सौभग्यं न प्राप्नोति पत्र लक्ष्मी न विधते।
न तत्फलं समाप्नोति महालक्ष्मी नमाम्यहम॥५३॥

🌺 देहि सौभाग्यमारोग्यं देहिमे परमं सुखम्। 
नमस्ते आद्यशक्ति त्वं नमस्ते भीड़भंजनी ॥५४॥

🌺 विधेहि देवी कल्याणं विधेहि परमां श्रियम। 
विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मवन्तं जनं कुरु ॥५५॥

🌺 अचिन्त्य रूप-चरिते- सर्वशत्रु विनाशीनी।
नमस्तेतु महामाया सर्व सुख प्रदायिनी ॥५६॥

🌺 नमाम्यहं महालक्ष्मी नमाम्यहम सुरेश्वरी।
 नमाम्यहं जगद्धात्री नमाम्यहं परमेश्वरी॥५७॥

🌺 विष्णु प्रिये नमस्तुभयं नमस्तुभ्यं जगद्धात्री।
आर्त हन्त्री नमस्तुभ्यं समृद्धं कुरू में सदा ॥५८॥

🌺।नमो नमस्ते महामाये श्री पीठे सुर पूजिते
शंख चक्र गदा वास्ते महालक्ष्मी नमोस्तुते ॥५९॥

🌺 नमस्ते गरुडारूढे कोलासुरभयंकरि ।
सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते ॥६०॥

🌺 सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्टभयंकरि ।
सर्वदुःखहरे देवी महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते ॥६१॥

🌺 सिद्धिबुद्धिप्रदे देवि भुक्तिमुक्ति प्रदायिनि।
मन्त्रमूर्ते सदा देवी महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते ॥६२॥

🌺 आद्यन्तरहिते देवि आद्यशक्तिमहेश्वरि ।
योगजे योगसम्भूते महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते ॥६३॥

🌺स्थूलसूक्ष्म महारौद्रे महाशक्ति महोदरे।
महापापहरे देवि महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते ॥६४॥

🌺।पद्मासनस्थिते देवि परब्रह्मस्वरूपिणि ।
परमेश्वरी जगन्मातमहालक्ष्मी नमोऽस्तु ते ॥६५॥

🌺 श्वेताम्बरधरे देवि नानालंकारभूषिते ।
जगत्स्थिते जगन्मात महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते ॥६६॥

🌺 जय पद्मपलाशाक्षि जय त्वं श्रीपति प्रिये
 जय मातमहालक्ष्मि संसाराणंव तारिणि ॥६७॥

🌺 महालक्ष्मि नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं सुरेश्वरि।
हरिप्रिये नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं दयानिये ॥६८॥ 

🌺 पद्मालये नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं च सर्वदे। 
सर्वभूतहितार्थाय वसुवृष्टि सदा कुरू॥६९॥

🌺 जगन्मातनं मस्तुभ्यं नमस्तुस्यं दयानिधे।
 दयावति नमस्तुभ्यं विश्वेशरि नमोस्तु ते॥७०॥ 

🌺 नमः क्षीरार्णवसुते नमस्त्रैलोक्य धारिणि।
 वस्तुदृष्टे नमस्तुभ्यं रक्ष मां शरणागतम् ॥७१॥

🌺 रक्ष त्वं देवदेवेशि देवदेवस्य वल्लभे । 
दरिद्रात्त्राहि मां लक्ष्मि कृपां कुरु ममोपरि ॥७२॥

🌺 नमस्त्रैलोक्य जननि नमस्त्रैलोक्य पावनि । 
ब्रह्मादये नमन्ते त्वां जगदानन्द दायिनीं॥७३॥ 

🌺 अब्जवासे नमस्तुभ्यं चपलायै नमो नमः।
चन्लायै नमस्तुभ्यं ललितायै नमो नमः॥७४॥ 

🌺 नमः प्रद्युम्न जननि मातस्तुभ्यं नमो नमः।
परिपालय भो मातर्मा तुभ्यं शरणागतम्॥७५॥

🌺 शरण्ये त्वां प्रपन्नोऽस्मि कमले कमलालयै।
त्राहि-त्राहि महालक्ष्मी परित्राण परायणे॥७६॥

🌺 सर्व मंगल मांगल्यै शिवे सर्वार्थ साधिके। 
शरण्यै त्रयम्बिके गौरी नारायणी नमोस्तुते ॥७७॥

🌺 शरणागत दीनार्त परित्राण परायणे ।
सर्वस्यार्ति हरे देवी नारायणी नमोस्तुते॥७८॥  

🌺 दामोदरप्रियाम् त्वं हि दिव्ययोग प्रदर्शिनी।
दयामयी दयाध्यक्षी शिरसा प्रणमाम्हम ॥७९॥

🌺 ध्यानातीता धराध्यक्षी धन-धान्य प्रदायिनी ।
धर्मदा धैर्यदा माता: शिरसा प्रणमाम्हम्॥८०॥

🌺 नानारत्नादिभूषाढृया नानारत्न प्रदायिनी।
नितम्बिनी नलिनाक्षी लक्ष्मीदेवी नमोस्तुते॥८१॥ 

🌺 निधिवन प्रेमानन्दा निराश्रय गतिप्रदा।
निर्विकारा नित्य रूपा लक्ष्मीदेवी नमोस्तुते ॥८२॥

🌺 पूर्णानन्दामयी त्वं हि पूर्णब्रहम सनातनी।
पराशक्ति पराभक्तिर्लक्ष्मीदेवी नमोस्तुते ॥८३॥

🌺 पूर्ण चन्द्रमुखी त्वं हि परमानन्दप्रदायिनी।
परमार्थप्रदा लक्ष्मी शिरसा प्रणमाम्हम् ॥८४॥

🌺 पदमा पदमासना त्वं हि पदममाला विधारिणी।
प्रणवरूपिणी माता शिरसा प्रणमाम्हम् ॥८५॥ 

🌺 विश्वकर्त्री, विश्वभर्त्री विश्वधात्री विश्वेश्वरी।
विश्वाराध्या विश्वब्राह्मा लक्ष्मीदेवी नमोस्तुते॥८६॥ 

🌺 विष्णु प्रिया , विष्णु शक्ति, बीज मंत्र स्वरूपिणी।
वरदा वाक्यसिद्धा च शिरसा प्रणमाम्हम् ॥८७॥

🌺 नमोभीष्टप्रदा, त्वं हि महामोहविनाशिनी,
मोक्षदा मानदात्री च लक्ष्मीदेवी नमोस्तुते ॥८८॥

🌺 विद्याधरी तथा विद्या वसुधां त्वं हि वन्दिता।
विन्ध्याचलवासिनी च लक्ष्मीदेवी नमोस्तुते॥८९॥

🌺 पट्चक्रभेदनी त्वं हि षड्ऐश्वर्य प्रदायिनी ।
षोडशी वयसा त्वं हि लक्ष्मीदेवि नमोस्तुते॥९०॥

🌺 सदानन्दमयी त्वं हि सर्व सम्पतप्रदायिनी।
सर्वसंकट हन्त्री च सत्य सत्वगुणान्विता ॥९१॥

🌺 सीतापतिप्रिया देवी शिरसा प्रणमाम्हम्। 
संसारतारिणी देवी , शिरसा प्रणमाम्हम्॥९२॥

🌺 समस्त सम्पत सुखदां महाश्रियम
समस्त सौभाग्यकररी महाश्रियम।
समस्त कल्याणकरी महाश्रियम
भजाम्हं ज्ञानकरी महाश्रियम ॥९३॥

🌺 सर्व मंगल संपूर्णा सर्वेश्वर्य समन्वितां।
आद्यादि श्रीमहालक्ष्मी त्वत्कला मयि तिष्ठतु ॥९४॥ 

🌺 अज्ञान तिमिरं हन्त्री शुद्ध ज्ञान प्रकाशिका।
सर्वेश्वर्यप्रदा मेऽस्तु त्वत्कला मयि संस्थिता॥९५॥

🌺 श्रीवैकुन्ठे स्थिते लक्ष्मी समागच्छ ममाग्रत:। 
नारायणेन सह मां कृपाद्ष्टयावलोकय॥९६॥

🌺 सत्यलोकेन स्थिते लक्ष्मी त्वां ममागच्छ सन्निधम् ।
वासुदेवेन संहिताम प्रसीद वरदा भव॥९७॥

 🌺 श्वेतद्बीप स्थिते लक्ष्मी शीध्रमागच्छ सुव्रते।
विष्णुना सहिते देवी जगन्माता: प्रसीद में ॥९८॥

🌺 क्षीराम्बुधिस्थिते लक्ष्मी समागच्छ समाधवे।
त्वत्कृपादृष्टिसुधयां सततं मां विलोकय॥९९॥

🌺 रत्नगर्भस्थिते लक्ष्मी परिपूर्णे हिरण्यमये।
समागच्छ समागच्छ स्थित्वाऽशु पुरतो मम॥१००॥

🌺 स्थिराभव महालक्ष्मी निश्चलाभव निर्मले।
प्रसन्ने कमले देवी प्रसन्नहृदया भव॥१०१॥

🌺 श्रीधरे श्रीमहाभूते त्वदन्तस्थं महानिधिम।
शीघ्रमुदघृत्य पुरत: प्रदर्शय समर्पये॥१०२॥

🌺 विष्णु प्रिये रत्नगर्भे समस्त फलदे शिवे।
त्वदगर्भगतहेमादीन सम्प्रदर्शय दर्शय॥१०३॥

🌺 रसातलगते लक्ष्मी शीघ्र मागच्छ में पुर:।
न जाने परमं रूपं मातर्मे सम्प्रदर्शय॥१०४॥

🌺 समागच्छ महालक्ष्मी शुद्धजाम्बूनदप्रभे।
प्रसीद पुरत: स्थित्वा प्रणतं मां विलोकय॥१०५॥

🌺 सादरं मस्तके हस्तं मम त्वं कृपयार्पय।
सर्वराजगृहे लक्ष्मी त्वत्कला मयि तिष्ठतु॥१०६॥

🌺 आद्यादि श्रीमहालक्ष्मी आद्यविष्णु वामांक संस्थिते।
प्रत्यक्षं कुरू में रूपं रक्ष मां शरणागतम॥१०७॥

🌺।प्रसीद मे महालक्ष्मी सुप्रसीद महाशिवे।
अचला भव सम्प्रीत्या सुस्थिरा भव मद्गृहे॥१०८॥

🌺 यावत्तिष्ठन्ति देवाश्च यावत्वन्नाम तिष्ठन्ति।
यावद् विष्णुश्च यावत्तवं तावत्कुरू कृपा मयि॥१०९॥

🌺 चान्द्रीकला यथा शुक्ले वर्द्बते सा दिने दिने।
तथा दया ते मय्यैव वर्द्बतामभिवर्द्बताम॥११०॥

🌺 यथा वैकुन्ठ नगरे यथा वै क्षीरसागरे।
तथा मदभवने तिष्ठ स्थिरा श्रीविष्णुना सह॥१११॥

🌺 नारायणस्य हृदये भवती यथास्ते 
नारायणोऽपि तव हृत्कमले यथास्ते।
नारायणस्त्वमपि नित्यमुभौ तथैव
तौ तिष्ठतां हृदि ममापि दयावति श्री:॥११२॥

🌺 ॐ श्रीं देवी तां मम गृहे चिरं वासय मातरम् । 
नमोस्तु तुभ्यं चिक्लीत श्री देव्यै च नमो नमः॥११३॥

🌺 यावद् चंंद्रश्च सूर्य्यश्च यावद् देवा वसुन्धरा।
तावन्मम गृहे देवि अचला सुस्थिरा भव ॥११४॥

🌺 यावद् ब्रह्मादयो देवामनुभुञ्ज चतुर्दशः। 
तावन्मम गृहे देवि अचला सुस्थिरा भव ॥११५॥

🌺 यावत् तारागणाकाशे यावद् इन्द्रादयो अप्सरा:।
तावन्मम गृहे देवि अचला सुस्थिरा भव' ॥११६॥

।। श्रीसूक्तयुक्त महालक्ष्मीस्तोत्र पुष्प माला सम्पूर्ण॥ 

              ॥पाठ फल॥
श्री लक्ष्मीर्वरदा विष्णुपत्नी वसुप्रदा,
हिरण्यरूपा स्वर्णमालिनी रजतस्त्रजा
स्वर्णप्रभा स्वर्णप्राकारा पदमवासिनी
पदमहस्ता पदमप्रिया मुक्तालंकारा

चन्द्रा सूर्या बिल्वप्रिया ईश्वरी
भुक्तिर्मुक्ति विभूति ऋद्धि समृद्धि
वृष्टि: पुष्टिर्धनदा धनेश्वरी श्रद्धा
भोगिनी भोगदा सावित्री धात्रित्यादय:

स सकल धन धान्य सत्पुत्र कलत्र हय
भू: गज पशु महिषी दासी दासयो ,
ज्ञानवान भवतिर्न संशय: ज्ञानेश्वर सुखारोग्य धन-धान्य जयादिकम लक्ष्य यस्या समुद्दिष्ट सा लक्ष्मीरिती गद्यते॥
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त्रिपिण्डी पूजन #पितृ शांति

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