Sunday, 26 November 2023

#गुरु स्तवन #आह्वान

#गुरु #स्तवन #आह्वान #स्तोत्र
सावधान - मात्र परीक्षण के रुप में, किसी कौतूहल या किसी भी प्रकार से अगरिमा मय रुप में इस स्तवन का पाठ करना सर्वथा वर्जित है ।
            स्तोत्र स्वयं मे मंत्र स्वरुप होते है। किंतु मंत्रो की अपेक्षा एक अन्य विशिष्टता होती है किसी भी स्तोत्र में जहां मंत्र वर्णो का विशिष्ट संयोजन होता है वहीं किसी भी स्तोत्र में लयबद्वता भी होती है तथा इसी लयबद्वता के कारण यह सहज स्वाभाविक हो जाता है कि साधक के हृदय के भाव पूर्णता से प्रस्फुटित हो सकें ।
               इस स्तवन के पाठ अथवा श्रवण मात्र से गुरुदेव सूक्ष्म रुप में उपस्थित होते ही हैं, यह एक अनुभव जन्य प्रमाण है।
               मात्र स्तोत्र पाठ से ही जीवन मे कई प्रकार की अनुकूलताएं प्रप्त हो जाती है ।
                
प्रयोग विधि:-जब कभी भी इस स्तवन का पाठ करने का भाव मन में उमडे़ तब शुद्व वस्त्र धारण कर उत्तरमुख होकर आसन पर बैठें, 
    धूप अगरबत्ती के द्वारा  वातावरण को सुगंधमय कर लें तथा अपने सामने किसी बाजोट पर स्वच्छ वस्त्र बिछाकर गुरुदेव हेतु पुष्प की पंखुडियों को  आसन के रुप में अर्पित करें।
          
                   !!स्तोत्रम!!                  

  पूर्णं सतान्यै परिपूर्ण रुपं
  गुरुर्वै सतान्यं दीर्घो वदान्यम् ।
  आविर्वतां पूर्णं मदेव पुण्यं
  गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यम॥1॥
            त्वमेव माता च...............

न जानामि योगं न जानामि ध्यानं
न मंत्रं न तंत्रं योगं क्रियान्वै ।
न जानामि पूर्ण न देहं न पूर्वं
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यम॥2॥
                 त्वमेव माता च................

अनाथो दरिद्रो जरा रोग युक्तो
महाक्षीण दीनं: सदा जाडय वक्त्र: ।
विपत्ति प्रविष्ट: सदाऽहं भजामि
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यम्॥3॥
                   त्वमेव माता च..............

त्वं मातृ रुपं पितृ स्वरुपं
आत्म स्वरुपं प्राण स्वरुपं ।
चैतन्य रुपं देवं दिवन्त्रं
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यम्॥4॥
                त्वमेव माता च................

त्वं नाथ पूर्णं त्वं देव पूर्णं
आत्म च पूर्णं ज्ञानं च पूर्णम् ।
अहं त्वां प्रपद्ये सदाऽहं भजामि
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यम॥5॥
              त्वमेव माता च...................

मम अश्रु अर्घ्यं पुष्पं प्रसूनं
देहं च पुष्पं शरण्यं त्वमेवम् ।
जीवोऽवदां पूर्ण मदैव रुपं
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यम॥6॥
              त्वमेव माता च...................

आवाहयामि आवाहयामि
शरण्यं शरण्यं सदाहं शरण्यं ।
त्वं नाथ मेवं प्रपद्ये प्रसन्नं
गुरुर्वै शरणयं गुरुर्वै शरण्यम॥7॥
                त्वमेव माता च................

न तातो न माता न वन्धुर्न भ्राता
न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता ।
न जाया न वित्तं न वृत्तिर्ममेवं
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यम॥8॥
                  त्वमेव माता च ...........

आबद्ध रुपं अश्रु प्रवाहं
धियां प्रपद्ये हृदयं वदान्ये ।
देहं त्वमेवं शरण्यं त्वमेवं
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यम॥9॥
                 त्वमेव माता च................

गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यं
गरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यम्।
एको हि नाथं एको ही शब्दं
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यम्॥10॥
               त्वमेव माता च..................

कान्तां न पूर्व वदान्यै वदान्यं 
कोऽहं सदान्यै सदाहं वदामि ।
न पूर्व पतिर्वै पतिर्वै सदाऽहं
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यम्॥11॥
              त्वमेव माता च ................

न प्राणो वदार्वै न देहं नवाऽहं
न नेत्रं न पूर्व सदाऽहं वदान्यै ।
तुच्छं वदां पूर्व मदैव तुल्यं
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यम्॥12॥
               त्वमेव माता च ................

पूर्वो न पूर्वं न ज्ञानं न तुल्यं
न नारि नरं वै पतिर्वै न पत्न्यम् ।
को कत् कदा कुत्र कदैव तुल्यं
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यम्॥13॥
              त्वमेव माता च...................

गुरुर्वै गतान्यं गुरुर्वै शतान्यं
गुरुर्वै वदान्यं गुरुर्वै कथान्यम् ।
गुरुमेव रुपं सदाऽहं भजामि
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यम्॥14॥
               त्वमेव माता च..................

आत्रं वतां अश्रु वदैव रुपं
ज्ञानं वदान्यै परिपूर्ण नित्यम्
गुरुर्वै व्रजाहं गुरुर्वै भजाहं
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यम॥15॥
              त्वमेव माता च.................

त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव वंधुश्च सखा त्वमेव् ।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्व मम् देव देव॥16॥

#व्यक्तिगत अथवा #सामूहिक गुरुपूजन , गुरु साधना के अवसर पर इस #स्तोत्र का पाठ #गुरुदेव का यथोचित्त विधि से #पूजन करने के उपरान्त करें, मध्य में अथवा प्रारम्भ में नहीं- ऐसा #सिद्वाश्रम गुरु - पूजन क्रम में उल्लिखित है।
              

Friday, 10 November 2023

रूप चतुर्दशी नरक चतुर्दशी में निहित अद्भुत तथ्य

रूप चतुर्दशी नरक चतुर्दशी में निहित अद्भुत तथ्य 
रूप चतुर्दशी नरक चतुर्दशी में निहित तथ्य -
मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी थी। अतः भगवान के वामन अवतार की भी पूजा की जाती है।
 इसी दिन अंजनि पुत्र बजरंग बली श्री हनुमान जी का भी जन्म हुआ था। शास्त्रानुसार वैसे तो हनुमान जयंती चैत्र मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है लेकिन उत्तर भारत के कई भागों में हनुमान जी का जन्म कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की रात को हनुमान जी की जयंती के रूप में मनाने की परंपरा है।इसी कारण रात को हनुमान जी का पूजन एवं श्री सुंदर कांड का पाठ भी किया जाता है।
 लोग दीपक जला कर छोटी दीवाली के रूप में यह पर्व मनाते हैं। चतुर्दशी की रात को तेल अथवा तिल के तेल के 14 दीपक अवश्य जलाएं, इससे समस्त पापों से मुक्ति मिलती है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार प्राचीन काल में नरकासुर नाम के राक्षस ने अपनी शक्तियों से देवताओं और ऋषि-मुनियों के साथ 16 हजार एक सौ सुंदर राजकुमारियों को भी बंधक बना लिया था। इसके बाद नरकासुर के अत्याचारों से त्रस्त देवता और साधु-संत भगवान श्री कृष्ण की शरण में गए। नरकासुर को स्त्री के हाथों मरने का श्राप था, इसलिए भगवान श्री कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा की मदद से कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरकासुर का वध किया और उसकी कैद से 16 हजार एक सौ कन्याओं को स्वतंत्र कराया। 
 समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए श्री कृष्ण ने इन सभी कन्याओं से विवाह कर लिया। 
नरकासुर से मुक्ति पाने की खुशी में देवगण व पृथ्वीवासी बहुत आनंदित हुए। माना जाता है कि तभी से इस पर्व को मनाए जाने की परंपरा शुरू हुई। 
इस दिन मृत्यु के देवता यमराज, मां काली और श्रीकृष्ण की पूजा की जाती है.
 इस दिन सूर्योदय से पहले स्नान करके यम तर्पण निम्न मंत्र बोलते हुए करें --
1) यमाय नमः (2) धर्मराजाय नमः (3) मृत्यवे नमः (4) अनन्ताय नमः (5) वैवस्वताय नमः (6) कालाय नमः (7) सर्वभूतक्षयाम नमः (8) औदुम्बराय नमः (9) दघ्नाय नमः (10) नीलाय नमः (11) परमेष्ठिने नमः (12) वृकोदराय नमः (13) चित्राय नमः (14) चित्रगुप्ताय नमः। 
और शाम के समय यम दीप दान करें।
नरक चतुर्दशी को दीपक जलाने से यमराज प्रसन्न होते हैं और अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है. अकाल मृत्यु से मुक्ति और स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए नरक चतुर्दशी की पूजा की जाती है.
इस दिन सुबह भगवान कृष्ण की पूजा और शाम को यमराज के लिए दीपक जलाने से तमाम तरह की परेशानियों और पापों से छुटकारा मिल जाता है।
 ये त्योहार लक्ष्मी जी की बड़ी बहन दरिद्रा से भी जुड़ा हुआ है।
दिवाली से पहले रूप चौदस के दिन यम के लिए दीपक जलाते हैं। साथ ही घर के बाहर कूड़े-कचरे के पास भी दीपक लगाया जाता है। 
 कूड़ा, कर्कट, गंदगी आदि दरिद्रा की निशानी हैं। तभी घर के बाहर कूड़ा फेंकने के स्थान पर दीपक लगाया जाता है। इससे दरिद्रा सम्मानपूर्वक घर से चली जाती है।
परंपरा के अनुसार रूप चौदस की रात घर का सबसे बुजुर्ग पूरे घर में एक दीया जलाकर घुमाता है और फिर उसे घर से बाहर कहीं दूर जाकर रख देता है। इस दीये को यम दीया कहा जाता है। 
 घर के बाकी सदस्य घर में ही रहते हैं।
ऐसा माना जाता है कि इस दीये को पूरे घर में घुमाकर बाहर ले जाने से सभी बुरी शक्तियां घर से बाहर चली जाती हैं। 
 

Thursday, 9 November 2023

धन्वंतरि_साधना

#धन्वंतरि_साधना!
धनतेरस से दीपावली के 5 दिवसीय त्‍यौहार का आरम्भ होता है।  
भगवान धन्वंतरि श्रीहरि विष्णु के अवतारों में से 12वें अवतार माने गए हैं. 
पौराणिक कथा के अनुसार कार्तिक मास की त्रयोदशी के ही दिन  समुद्रमंथन के समय चौदह प्रमुख रत्न निकले थे जिनमें चौदहवें रत्न के रूप में स्वयं भगवान धन्वन्तरि प्रकट हुए जिनके हाथ में अमृतलश था. चार भुजाधारी भगवान धन्वंतरि के एक हाथ में आयुर्वेद ग्रंथ, दूसरे में औषधि कलश, तीसरे में जड़ी बूटी और चौथे में शंख विद्यमान है.

समुद्र के मंथन से उत्पन्न विष का महारूद्र भगवान शंकर ने विषपान किया, धन्वन्तरि ने अमृत औषधि से उनको स्वस्थ किया।
धनतेरस पर कैसे करें भगवान धन्वंतरि की पूजा (Dhanvantari Puja Vidhi)

धनतेरस पर प्रदोष काल में पूजा का विधान है. इस दिन न सिर्फ धन बल्कि परिवार और अपने आरोग्य रूपी धन की कामना के लिए भगवान धन्वंतरि का पूजन करना चाहिए. अच्छा स्वास्थ ही मनुष्य की सबसे बड़ी पूंजी है. धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि की पूजा से स्वास्थ्य लाभ मिलता है.

उत्तर-पूर्व दिशा में पूजा की चौकी लगाकर उसपे श्रीहरि विष्णु की मूर्ति या फिर धन्वंतरि देव की चित्र स्थापित करें.
यदि मूर्ति पूजन कर रहे हैं तो भगवान धन्वंतरि का स्मरण कर अभिषेक करें. षोडशोपचार विधि से पूजन करें.।
तत्पश्चात 
धन्‍वंतरि स्‍तोत्र का पाठ सुनें, सम्भव है तो स्वयं करें।
धन्वंतरि स्तोत्र -
ॐ शंखं चक्रं जलौकां दधदमृतघटं चारुदोर्भिश्चतुर्मिः
सूक्ष्मस्वच्छातिहृद्यांशुक परिविलसन्मौलिमंभोजनेत्रम.
कालाम्भोदोज्ज्वलांगं कटितटविलसच्चारूपीतांबराढ्यम
वन्दे धन्वंतरिं तं निखिलगदवनप्रौढदावाग्निलीलम.
ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वंतराये:
अमृतकलश हस्ताय सर्व भयविनाशाय 
सर्व रोगनिवारणाय त्रिलोकपथाय 
त्रिलोकनाथाय श्री महाविष्णुस्वरूप
श्री धन्वं‍तरि स्वरूप श्री श्री श्री औषधचक्र नारायणाय नमः.॥

इनका प्रिय धातु पीतल माना जाता है। इसीलिये धनतेरस को पीतल आदि के बर्तन खरीदने की परम्परा भी है।इस दिन सोने चांदी के साथ ही नई वस्‍तुओं को खरीदना सबसे शुभ माना जाता है। 
कहते हैं इस दिन जो भी वस्‍तु खरीदी जाती है उसमें अनंत वृद्धि होती है। इस दिन भगवान कुबेर और मां लक्ष्‍मी की विधि विधान से पूजा की जाती है। 

श्री धन्वन्तरि  भगवान विष्णु के अवतार हैं जिन्होंने आयुर्वेद प्रवर्तन किया। इनका पृथ्वी लोक में अवतरण समुद्र मन्थन के समय हुआ था। शरद पूर्णिमा को चन्द्रमा, कार्तिक द्वादशी को कामधेनु गाय, त्रयोदशी को धन्वन्तरि[4], चतुर्दशी को काली माता और अमावस्या को भगवती महालक्ष्मी जी का सागर से प्रादुर्भाव हुआ था। इसीलिये दीपावली के दो दिन पूर्व धनतेरस को भगवान धन्वन्तरि का अवतरण धनतेरस के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन इन्होंने आयुर्वेद का भी प्रादुर्भाव किया था।[5]

इसके साथ ही कुछ विशेष मंत्रों का जप भी करना चाहिए। आइए जानते हैं ये मंत्र…

भगवान श्रीधन्वंतरि गायत्री मंत्र —
1..ॐ वासुदेवाय विद्‍महे वैधराजाय धीमहि तन्नो धन्वन्तरी प्रचोदयात् ||

2..ॐ तत्पुरुषाय विद्‍महे अमृत कलश 
हस्ताय धीमहि तन्नो धन्वन्तरी प्रचोदयात्।

 (आरोग्य प्राप्ति) 
आरोग्यप्राप्ति करने के लिए भगवान श्री धन्वंतरि जी का मंत्र – 
ॐ धन्वंतरये नमः॥
ध्यान -
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय धन्वन्तरये अमृत कलश हस्ताय सर्वभय विनाशाय त्रिलोकनाथाय श्रीमहाविष्णवे नम:। 
   परम भगवान को, जिन्हें सुदर्शन वासुदेव धन्वंतरि कहते हैं, जो अमृत कलश लिए हैं, सर्व भयनाशक हैं, सर्व रोग नाश करते हैं, तीनों लोकों के स्वामी हैं और उनका निर्वाह करने वाले हैं; उन विष्णु स्वरूप धन्वंतरि को सादर नमन है।

भगवान श्री धन्वंतरि मंत्र रोग बीमारी को दूर करने का लिए  —
“ॐ रं रूद्र रोगनाशाय धन्वन्तर्ये फट्।।”
हाथ में अक्षत लेकर कम से कम 5 माला का जप करें।


ॐ धनवांतराय नमः

ॐ धनकुबेराय नमः, ऊं वित्तेश्वराय नमः

ॐ श्रीं श्रिये नमः

ह्रीं श्रीं क्रीं श्रीं कुबेराय अष्ट-लक्ष्मी मम गृहे धनं पुरय पुरय नमः

उत्तम स्वास्थ्य और रोगों के नाश की प्रार्थना कर 
'ॐ नमो भगवते धन्वंतराय विष्णुरूपाय नमो नमः॥ का 108 बार जाप करें. 


यमराज को समर्पित दीपक : इस दिन असामयिक मृत्यु से बचने के लिए यमराज के लिए घर के बाहर दीपक जलाया जाता है जिसे यम दीपम के नाम से जाना जाता है और इस धार्मिक संस्कार को त्रयोदशी तिथि के दिन किया जाता है।

कुबेर के मंत्र

ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये

धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा॥

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय नमः॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं श्रीं कुबेराय अष्ट-लक्ष्मी 
मम गृहे धनं पुरय पुरय नमः॥

Sunday, 22 October 2023

#श्री #त्रैलोक्यविजय #अपराजिता #स्तोत्र

श्रीत्रैलोक्यविजय अपराजिता #स्तोत्रम् ! #विजय #दशमी में तो, #अवश्य करें पाठ -
🍁देवी अपराजिता की महिमा🍁

#अपराजिता का #अर्थ है, जो कभी #पराजित नहीं होता। देवी अपराजिता के सम्बन्ध में कुछ अन्य महत्वपूर्ण तथ्य भी जानने योग्य है, जैसे की उनकी मूल प्रकृति क्या है?

अपराजिता देवी को #नवदुर्गाओं की #माता और आदिनारायणी देवी का अवतार माना जाता है।#भगवान #विष्णु का एक नाम और रूप अपराजित है,उन अपराजित विष्णु की स्वरूपा शक्ति अपराजिता देवी है।
 
देवी अपराजिता का पूजनारम्भ तब से हुआ जब देवासुर संग्राम के दौरान नवदुर्गाओ ने दानवों के सम्पूर्ण वंश का नाश कर दिया था,तब माँ दुर्गा अपनी मूल पीठशक्तिओं में से अपनी आदि शक्ति अपराजिता को पूजने के लिए शमी की घास लेकर हिमालय में अंतर्ध्यान हुई। 

उस समय का विजय दशमी पर्व मूलत: देवताओं द्वारा दानवो पर विजय प्राप्ति के उपलक्ष्य में था। स्वाभाविक रूप से नवरात्र के दशवे दिन ही विजय दशमी मनाने की परम्परा चली आ रही है।

श्रीत्रैलोक्यविजय विष्णु अपराजिता स्तोत्रम्!! विजय दशमी में अवश्य करें। 
                   ( मूल पाठ)
ॐ नमो भगवते महावासुदेवाय विश्वेश्वराय विश्वरूपाय परमात्मने नमः।
ॐ महाअनंताय महाकाल संकर्षणाय महाज्वालारूपाय महाउग्रवीर महाविष्णवे नमः।
ॐ नमो अपराजित विष्णवे कालान्तकाय महाज्वालायसुरसिंहाय नमः।

ॐ ॐ ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं श्रीं श्रीं श्रीं आंआंआं ह्रौं ह्रौं ह्रौं हंस:हंस:हंस: ॐ ह्रीं श्रीं नमो विष्णवे।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं नमो महानारायणाय। 
ॐ ह्रीं श्रींं क्लीं नमो भगवते महावासुदेवाय। 
ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं अनन्ताय महासंकर्षणाय।
ॐ सर्वेश्वराय सर्वविघ्न विनाशाय मधूसुदनाय ठ:ठ:।
ॐ नमो केशवाय।
ॐ ह्रीं नमो नारायणाय अनन्ताय श्रीं नमः।
ॐ नमो भगवते जनार्दनाय जगदीश्वराय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय त्रैलोक्यनाथाय।

ॐक्लीं श्रीं क्लीं श्रीं नमो भगवते जनार्दनाय सकलदुरितानि नाशय नाशय क्ष्रौं मम् आरोग्यं कुरु कुरु ह्रीं दीर्घमायुर्देहि देहि स्वाहा ।

ॐ नारायणः परं ज्योति-रात्मा नारायणः परः।
नारायणः परं ब्रह्म नारायण नमोऽस्तु ते॥ 

नारायणः परो देवो धाता नारायणः परः।
नारायणः परो धाता नारायण नमोऽस्तु ते ॥

नारायणः परं धाम ध्यानं नारायणः परः।
नारायण परो धर्मो नारायण नमोऽस्तु ते॥ 

नारायणः परो देवो विद्या नारायणः परः।
विश्वं नारायणः साक्षान् नारायण नमोऽस्तु ते ॥

नारायणाद् विधि-र्जातो जातो नारायणाद् भवः ।
जातो नारायणादिन्द्रो नारायण नमोऽस्तु ते ॥

रवि-र्नारायण-स्तेजः चन्द्रो नारायणो महः ।
वह्नि-र्नारायणः साक्षात् नारायण नमोऽस्तु ते ॥ 

नारायण उपास्यः स्याद् गुरु-र्नारायणः परः ।
नारायणः परो बोधो नारायण नमोऽस्तु ते 

नारायणः फलं मुख्यं सिद्धि-र्नारायणः सुखम् ।
हरि-र्नारायणः शुद्धि-र्नारायण नमोऽस्तु ते ॥ 

निगमावेदितानन्त-कल्याणगुण-वारिधे ।
नारायण नमस्तेऽस्तु नरकार्णव-तारक ॥

जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि-पारतन्त्र्यादिभिः सदा ।
दोषै-रस्पृष्टरूपाय नारायण नमोऽस्तु ते॥

वेदशास्त्रार्थविज्ञान-साध्य-भक्त्येक-गोचर ।
नारायण नमस्तेऽस्तु मामुद्धर भवार्णवात् ॥ 

नित्यानन्द महोदार परात्पर जगत्पते ।
नारायण नमस्तेऽस्तु मोक्षसाम्राज्य-दायिने ॥ 

आब्रह्मस्थम्ब-पर्यन्त-मखिलात्म-महाश्रय ।
सर्वभूतात्म-भूतात्मन् नारायण नमोऽस्तु ते ॥ 

पालिताशेष-लोकाय पुण्यश्रवणकीर्तन।
नारायण नमस्तेऽस्तु प्रलयोदकशायिने॥

निरस्त-सर्वदोषाय भक्त्यादिगुणदायिने।
नारायण नमस्तेऽस्तु त्वां विना न हि मे गतिः ॥ 

धर्मार्थ-काम-मोक्षाख्य-पुरुषार्थ-प्रदायिने ।
नारायण नमस्तेऽस्तु पुनस्तेऽस्तु नमो नमः ॥ 

विनियोग:- ॐ अस्य वैष्णवया: अपराजिताया महाविद्या वामदेव ब्रहस्पतिमार्कडेया ॠषयः। गाय्त्रुश्धिगानुश्ठुब्ब्रेहती छंदासि। लक्ष्मी नृसिंहो देवता। ॐ क्लीं श्रीं हृीं बीजं हुं शक्तिः। सकल् कामना सिद्ध्यर्थ अपराजित विद्या मंत्र पाठे विनियोग:। (जल भूमि पर छोड़ दे)

अपराजितादेवी ध्यान

ॐ निलोत्पलदलश्यामां भुजंगाभरणानिव्तं ।
शुद्ध्स्फटीकंसकाशां चन्द्र्कोटिनिभाननां ।। १।।

शड़्खचक्रधरां देवीं वैष्णवीं अपराजितं।
बालेंदुशेख्रां देवीं वर्दाभाय्दायिनीं ।। २।।
नमस्कृत्य पपाठैनां मार्कंडेय महातपा: ।। ३।।

श्री मार्कंडेय उवाच:-
शृणुष्वं मुनय: सर्वे सर्व्कामार्थ्सिद्धिदाम्।
असिद्धसाधनीं देवीं वैष्णवीं अपराजितम्। । ४। ।

ॐ नमो नारायणाय, नमो भगवते वासुदेवाय, नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्त्रशीर्षायणे, क्षीरोदार्णवशायिने, शेषभोगपर्य्यङ्काय, गरुड़वाहनाय, अमोघाय अजाय अजिताय पीतवाससे,
ॐ वासुदेव सड़्कर्षण प्रघुम्न, अनिरुद्ध, हयग्रीव, मत्स्य, कुर्म, वाराह, नृसिंह अच्युत, वामन, त्रिविक्रम, श्रीधर,राम राम राम वरद, वरद, वरदो भव, नमोस्तुते, नमोस्तुते स्वाहा। 

ॐ असुर- दैत्य- यक्ष- राक्षस- भूतप्रेत पिशाच कुष्मांड सिद्धयोगिनी डाकिनी शाकिनी स्क्न्गद्घान, उपग्रहानक्षत्र ग्रहांश्रचान्या हन हन पच पच मथ मथ
विध्वंस्य विध्वंस्य विद्रावय विद्रावय चूणय चूणय शंखेंन चक्रेण वज्रेण शुलेंन गदया मुसलेन हलेंन भास्मिकुरु कुरु स्वाहा।

ॐ सहस्त्र्बाहो सह्स्त्रप्रहरणायुध, जय जय, विजय विजय, अजित, अमित, अपराजित, अप्रतिहत,सहत्स्र्नेत्र, ज्वल ज्वल, प्रज्वल प्रज्वल, विश्वरूपबहुरूप, मधुसुदन,महावराह, महापुरुष, वैकुण्ठ, नारायण, पद्द्नाभ, गोविन्द, दामोदर, हृषिकेश, केशव, सर्वसुरोत्सादन, सर्वभूतवशड़्कर, सर्वदु:स्वप्न्प्रभेदन, सर्वयन्त्रप्रभ्जज्न, सर्वनागविमर्दन, सर्वदेवमहेश्वर,सर्व्बन्धविमोक्षण, सर्वाहितप्रमर्दन, सर्वज्वरप्रणाशन, सर्वग्रहनिवारण, सर्वपापप्रशमन, जनार्दंन, नमोस्तुते स्वाहा ।
ॐ विष्णोरियमानुपप्रोकता सर्वकामफलप्रदा सर्वसौभाग्यजननी सर्वभितिविनाशनी । । ५। ।

सवैश्र्च पठितां सिद्धैविष्णो: परम्वाल्लभा ।
नानया सदृशं किन्चिदुष्टानां नाशनं परं। । ६। ।

विद्द्या रहस्या कथिता वैष्ण्व्येशापराजिता ।
पठनीया प्रशस्ता वा साक्शात्स्त्वगुणाश्रया । । ७। ।

ॐ शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजं ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत्सर्वविघ्नोपशान्तये । । ८। ।

अथात: संप्रवक्ष्यामी हृाभ्यामपराजितम् ।
यथाशक्तिमार्मकी वत्स रजोगुणमयी मता । । ९। ।

सर्वसत्वमयी साक्शात्सर्वमन्त्रमयी च या ।
या स्मृता पूजिता जप्ता न्यस्ता कर्मणि योजिता ।
सर्वकामदुधा वत्स शृणुश्वैतां ब्रवीमिते। । १०। ।

य इमां पराजितां परम्वैष्ण्वीं प्रतिहतां
पठति सिद्धां स्मरति सिद्धां महाविद्द्यां
जपति पठति श्रृणोति स्मरति धारयति किर्तयती वा
न तस्याग्निवायुवज्रोपलाश्निवर्शभयं
न समुद्रभयं न ग्रह्भयं न चौरभयं
न शत्रुभयं न शापभयं वा भवेत् ।
क्वाचिद्रत्र्यधकारस्त्रीराजकुलविद्वेषी
विषगरगरदवशीकरण विद्वेशोच्चाटनवध बंधंभयं वा न भवेत्।
एतैमर्न्त्रैरूदाहृातै: सिद्धै: संसिद्धपूजितै:। 

ॐ नमोस्तुते ।अभये, अनघे, अजिते, अमिते, अमृते, अपरे, अपराजिते, पठत सिद्धे, जयति सिद्धे, स्मरति सिद्धे, एकोनाशितितमे, एकाकिनी, निश्चेतसी, सुद्र्मे, सुगन्धे, एकान्न्शे, उमे, ध्रुवे, अरुंधती, गायत्री, सावित्री, जातवेदसी, मास्तोके, सरस्वती,धरणी, धारणी, सौदामिनी, अदीति, दिति, विनते, गौरी ,गांधारी, मातंगी, कृष्णे , यशोदे, सत्यवादिनी, ब्र्म्हावादिनी, काली ,कपालिनी, कराल्नेत्र, भद्रे, निद्रे, सत्योप्याचकरि, स्थाल्गंत, जल्गंत,अन्त्रख्सिगतं वा माँ रक्षसर्वोप्द्रवेभ्य: स्वाहा।

यस्या: प्रणश्यते पुष्पं गर्भो वा पतते यदि ।
भ्रियते बालको यस्या: काक्बन्ध्या च या भवेत् । । ११। ।

धारयेघा इमां विधामेतैदोषैन लिप्यते।
गर्भिणी जीवव्त्सा स्यात्पुत्रिणी स्यान्न संशय: । । १२। ।

भूर्जपत्रे त्विमां विद्धां लिखित्वा गंध्चंदनैः ।
एतैदोषैन लिप्यते सुभगा पुत्रिणी भवेत् । । १३। ।

रणे राजकुले दुते नित्यं तस्य जयो भवेत् ।
शस्त्रं वारयते हृोषा समरे काडंदारूणे । । १४। ।

गुल्मशुलाक्शिरोगाणां न नाशिनी सर्वदेहिनाम् । । १५। ।
इत्येषा कथिता विद्द्या अभयाख्या अपराजिता ।

एतस्या: स्म्रितिमात्रेंण भयं क्वापि न जायते । । १६। ।
नोपसर्गा न रोगाश्च न योधा नापि तस्करा: ।

न राजानो न सर्पाश्च न द्वेष्टारो न शत्रव: । । १७। ।
यक्षराक्षसवेताला न शाकिन्यो न च ग्रहा: ।

अग्नेभ्र्यं न वाताच्च न स्मुद्रान्न वै विषात् । । १८। ।

कामणं वा शत्रुकृतं वशीकरणमेव च ।
उच्चाटनं स्तम्भनं च विद्वेषणमथापि वा । । १९। ।

न किन्चितप्रभवेत्त्र यत्रैषा वर्ततेऽभया ।
पठेद वा यदि वा चित्रे पुस्तके वा मुखेऽथवा । । २०। ।

हृदि वा द्वार्देशे व वर्तते हृाभय: पुमान् ।
ह्रदय विन्यसेदेतां ध्यायदेवीं चतुर्भुजां । । २१। ।

रक्त्माल्याम्बरधरां पद्दरागसम्प्रभां ।
पाशाकुशाभयवरैरलंकृतसुविग्रहां । । २२। ।

साध्केभ्य: प्र्यछ्न्तीं मंत्रवर्णामृतान्यापि ।
नात: परतरं किन्च्चिद्वाशिकरणमनुतम्ं। । २३। ।

रक्षणं पावनं चापि नात्र कार्या विचारणा ।
प्रात: कुमारिका: पूज्या: खाद्दैराभरणैरपि ।
तदिदं वाचनीयं स्यातत्प्रिया प्रियते तू मां। । २४। ।

ॐ अथात: सम्प्रक्ष्यामी विद्दामपी महाबलां ।
सर्व्दुष्टप्रश्मनी सर्वशत्रुक्षयड़्करीं । । २५। ।

दारिद्र्य्दुखशमनीं दुभार्ग्यव्याधिनाशिनिं ।
भूतप्रेतपिशाचानां यक्श्गंध्वार्क्षसां । । २६। ।

डाकिनी शाकिनी स्कन्द कुष्मांडनां च नाशिनिं ।
महारौदिं महाशक्तिं सघ: प्रत्ययकारिणीं । । २७। ।

गोपनीयं प्रयत्नेन सर्वस्वंपार्वतीपते: ।
तामहं ते प्रवक्ष्यामि सावधानमनाः श्रृणु । । २८। ।

एकाहिृकं द्वहिकं च चातुर्थिकर्ध्मासिकं ।
द्वैमासिकं त्रैमासिकं तथा चातुर्थ्मासिकं । । २९। ।

पाँचमासिक षाड्मासिकं वातिक पैत्तिक्ज्वरं ।
श्रैष्मिकं सानिपातिकं तथैव सततज्वरं । । ३०। ।

मौहूर्तिकं पैत्तिकं शीतज्वरं विषमज्वरं ।
द्वहिंकं त्रयहिन्कं चैव ज्वर्मेकाहिकं तथा ।
क्षिप्रं नाशयेते नित्यं स्मरणाद्पराजिता। । ३१। ।

ॐ हीं हन हन कालि शर शर गौरि धम धम
विद्धे आले ताले माले गन्थे बन्धे पच पच विद्दे
नाशाय नाशाय पापं हर हर संहारय वा दु:स्वप्नविनाशनी कमलस्थिते विनायकमात:
रजनि संध्ये दुन्दुभिनादे मानसवेगे शड़्खिनी चक्रिणी
गदिनी वज्रिणी शूलिनी अपमृत्युविनाशिनी
विश्रेश्वरी द्रविणी द्राविणी केशवदयिते , पशुपतिसहिते दुन्दुभिदमनी दुम्मदमनी शबरि किराती मातंगी ॐ द्रं द्रं ज्रं ज्रं क्रं क्रं तुरु तुरु ॐ द्रं कुरु कुरु ।

ये मां द्विषन्ति प्रत्यक्षं परोक्षं वा तान सर्वान दम दम मर्दय मर्दय तापय तापय गोपय गोपय पातय पातय शोषय शोषय उत्सादय उत्सादय ब्रम्हाणी ब्रम्हाणी माहेश्वरी कौमारि वाराहि नारसिंही एंद्री चामुंडे महालक्ष्मी वैनायिकी औपेंद्री आग्नेयी चंडी नैॠति वायव्ये सौम्ये ऐशानि ऊध्र्व्मधोरक्ष प्रचंद्विद्दे इन्द्रोपेन्द्रभगिनि ।

ॐ नमो देवी जये विजये शान्ति स्वस्ति तुष्ठी पुष्ठी विवर्द्धिनी कामांकुशे कामदुद्दे सर्वकामवर्प्रदे सर्वभूतेषु माँ प्रियं कुरु कुरु स्वाहा ।

आकर्षणी आवेशनि ज्वालामालिनी रमणी रामणि धरणी धारणी तपनि तापिनी मदनी मादिनी शोषणी सम्मोहिनी।

नीलपताके महानीले महागौरि महाश्रिये ।
महाचान्द्री महासौरी महामायुरी आदित्यरश्मि जाहृवि ।
यमघंटे किणी किणी चिन्तामणि ।
सुगन्धे सुर्भे सुरासुरोत्प्त्रे सर्वकाम्दुद्दे ।
यद्द्था मनिषीतं कार्यं तन्मम सिद्धतु स्वाहा ।
ॐ स्वाहा । ॐ भू: स्वाहा । ॐ भुव: स्वाहा । ॐ स्व: स्वाहा ।
ॐ मह: स्वाहा । ॐ जन: स्वाहा । ॐ तप: स्वाहा । ॐ सत्यं स्वाहा । ॐ भूभुर्व: स्वाहा ।

यत एवागतं पापं तत्रैव प्रतिगच्छ्तु स्वाहेत्यों ।
अमोघैषा महाविद्दा वैष्णवी चापराजिता । । ३२। ।

स्वयं विश्नुप्रणीता च सिद्धेयं पाठत: सदा ।
एषा महाबला नाम कथिता तेऽपराजित । । ३३। ।

नानया सदृशी रक्षा त्रिषु लोकेषु विद्दते ।
तमोगुणमयी साक्षद्रोद्री शक्तिरियं मता । । ३४। ।

कृतान्तोऽपि यतोभीत: पाद्मुले व्यवस्थित: ।
मूलाधारे न्यसेदेतां रात्रावेन च संस्मरेत । । ३५। ।

नीलजीतमूतसंड़्काशां तडित्कपिलकेशिकाम् ।
उद्ददादित्यसंकाशां नेत्रत्रयविराजिताम् । । ३६। ।

शक्तिं त्रिशूलं शड़्खं चपानपात्रं च बिभ्रतीं ।
व्याघ्र्चार्म्परिधानां किड़्किणीजालमंडितं । । ३७। ।

धावंतीं गगंस्यांत: पादुकाहितपादकां ।
दंष्टाकरालवदनां व्यालकुण्डलभूषितां । । ३८। ।

व्यात्वक्त्रां ललजिहृां भुकुटिकुटिलालकां ।
स्वभक्तद्वेषिणां रक्तं पिबन्तीं पान्पात्रत: । । ३९। ।

सप्तधातून शोषयन्तीं क्रूरदृष्टया विलोकनात् ।
त्रिशुलेन च तज्जिहृां कीलयंतीं मुहुमुर्हु: । । ४०। ।

पाशेन बद्धा तं साधमानवंतीं तन्दिके ।
अर्द्धरात्रस्य समये देवीं ध्यायेंमहबलां । । ४१। ।

यस्य यस्य वदेन्नाम जपेन्मंत्रं निशांतके ।
तस्य तस्य तथावस्थां कुरुते सापियोगिनी । । ४२। ।

ॐ बले महाबले असिद्धसाधनी स्वाहेति ।
अमोघां पठति सिद्धां श्रीवैष्णवीं । । ४३। ।

श्रीमद्पाराजिताविद्दां ध्यायते ।
दु:स्वप्न दुरारिष्टे च दुर्निमिते तथैव च ।
व्यवहारे भवेत्सिद्धि: पठेद्विघ्नोपशान्त्ये । । ४४। ।

यदत्र पाठे जगदम्बिके मया, विसर्गबिन्द्धऽक्षरहीमीड़ितं ।
तदस्तु सम्पूर्णतमं प्रयान्तु मे, सड़्कल्पसिद्धिस्तु सदैव जायतां । । ४५। ।

ॐ तव तत्वं न जानामि किदृशासी महेश्वरी ।
यादृशासी महादेवी ताद्रिशायै नमो नम: । । ४६। ।
🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

श्रीत्रैलोक्यविजय अपराजिता स्तोत्र!! 
(हिंदी अनुवाद )

ॐ अपराजिता देवी को नमस्कार। (इस वैष्णवी अपराजिता महाविद्दा के वामदेव, ब्रहस्पति, मारकंडये ऋषि है गायत्री उष्णिग् अनुष्टुप बृहति छन्द, लक्ष्मी नरसिंह देवता, क्लीं बीजम्, हुं शक्ति, सकलकामना सिद्धि के लिए अपराजिता विद्दा मंत्रपाठ में विनियोग है।)

नीलकमलदल के समान, श्यामल रंग वाली, भुजंगो के आभरण से युक्त, शुद्धस्फ़टिक के समान उज्जवल तथा कोटि चन्द्र के प्रकाश के समान मुख वाली, शंख-चक्र धारण करने वाली, बालचंद्र मस्तक पर धारण करने वाली, वैष्णवी अपराजिता देवी को नमस्कार करके महान् तपस्वी मारकण्डेय ऋषि ने इस स्तोत्र का पाठ आरम्भ किया । । १-३। 
मारकण्डेय ऋषि ने कहा- हे मुनियो। सिद्धि देने वाली, असिद्धिसाधिका वैष्णवी अपराजिता देवी (के इस स्तोत्र) को श्रवण। । ४। ।  
ॐ नारायण भगवान् को नमस्कार, वासुदेव भगवान् को नमस्कार, अनंत्भागवान को नमस्कार, जो सहस्त्र सिर वाले क्षीरसागर में शयन करने वाले, शेषनाग के शैया में शयन करने वाले, गरुण वाहन वाले, अमोघ, अजन्मा, अजित तथा पीताम्बर धारण करने वाले है।

ॐ हे वासुदेव, संकर्षण प्रद्दुम्न अनिरुद्ध, हयग्रिव, मतस्य, कुर्म, वाराह,नृसिंह, अच्युत,वामन, त्रिविक्रम, श्रीधर, राम, बलराम, परशुराम, हे वरदायक, आप मेरे लिए वर प्रदायक हों । आपको नमन हैं।

ॐ असुर, दैत्य, यक्ष, राक्षस, भूत-प्रेत, पिशाच, कुष्मांड, सिद्ध्योगिनी, डाकिनी, शाकिनी, स्कंद्ग्रह, उपग्रह, नक्षत्र्ग्रह तथा अन्य ग्रहों को मारो-मारो, पाचन करो- पाचन करो । मंथन करो- मंथन करो, विध्वंस करो- विध्वंस करो, तोड़ दो- तोड़ दो, चूर्ण करो- चूर्ण करो । शंख, चक्र, वज्र, शूल, गदा, मूसल तथा हल से भस्म करो ।

ॐ हे सहस्त्रबाहू, हे सह्स्त्रप्रहार आयुध वाले, जय, विजय, अमित, अजित, अपराजित, अप्रतिहत, सहस्त्र्नेत्र जलाने वाले, प्रज्वलित करने वाले, विश्वरूप, बहुरूप, मधुसूदन, महावराह, महापुरुष, वैकुण्ठ, नारायण, पद्द्नाभ, गोविन्द, दामोदर, हृषिकेश, केशव, सभी असुरों को उत्सादन करने वाले, हे सभी भूत-प्राणियों को वश में करने वाले, हे सभी दु:स्वप्न को नाश करने वाले, सभी यंत्रो को भेदने वाले, सभी नागों को विमर्दन करने वाले, सर्वदेवों को महादेव, सभी बंधनों को मोक्ष करने वाले, सभी अहितों को मर्दन करने वाले, सभी ज्वरों को नाश करने वाले, सभी ग्रहों का निवारण करने वाले, सभी पापों का प्रशमन करने वाले, हे जनार्दन आपको नमस्कार है ।
ये भगवान् विष्णु की विद्या सर्वकामना के देने वाली, सर्वसौभाग्य की जननी, सभी भय को नाश करें वाली है । । ५। । 
 ये विष्णु की परम वल्लभा सिद्धों के द्वारा पठित है, इसके समान दुष्टों को नाश करने वाली कोई और विद्दा नही है। । ६। । ये वैष्णवी अपराजिता विद्दा साक्षात सत्वगुण, सम्निवत, सदा पढने योग्य तथा मार्ग प्रशस्ता है । । ७। ।

ॐ शुक्लवस्त्र धारण करने वाले, चंद्र्वर्ण वाले, चार भुजा वाले, प्रसन्न मुख वाले भगवान् का सर्व विघ्नों का विनाश करने हेतुध्यान करें । हे वत्स । अब मैं मेरी अभया अपराजिता के विषय में कहूँगा, जो रजोगुणमयी कही गई है । । १। । ये सत्व वाली सभी मन्त्रों वाली स्मृत, पूजित, जपित कर्मों में योजित, सभी कामनाओं की पूर्ति करने वाली है । इसको ध्यान पूर्वक सुनो । । १०। ।

जो इस अपराजिता परम वैष्णवी, अप्रतिहता पढने से सिद्ध होने वाली, स्मरण करने से सिद्ध होने वाली, विद्दा को सुनें, पढ़ें, स्मरण करें, धारण करें, कीर्तन करें, इससे अग्नि , वायु , वज्र, पत्थर, खड़ग, वृष्टि आदि का भय नहीं होता । समुद्र भय, चौर भय, शत्रु भय, शाप भय भी नहीं होता। रात्री में, अन्धकार में, राजकुल से विद्वेष करने वालों से, विष देने वालों से, वशीकरण आदि टोटका करने वालों से, विद्वेशिओं से, उच्चाटन करने वालों से, वध-भय, बंधन का भय आदि समस्त भय से इसका पाठ करने वाले सुरक्षित हो जाते हैं । इन मन्त्रों द्वारा कही गई, सिद्ध साधकों द्वारा पूजित यह अपराजिता शक्ति हैं ।

ॐ आप को नमस्कार है। भयरहित, पापरहित, परिमाण रहित, अमृत तत्व परिपूर्ण, अपरा, अपराजिता पढने से सिद्ध होने वाली, जप करने से सिद्ध होने वाली, स्मरण करने मात्र से सिद्धि से देने वाली, नवासिवाँ स्थान वाली, एकांत प्रिय, निश्चेता, सुदृमा, सुगंधा, एक अन्न लेने वाली, उमा, ध्रुवा, अरुन्धती, गायत्री, सावित्री, जातवेदा, मानस्तोका, सरस्वती, धरणी, धारण करने वाली, सौदामिनी, अदिती, दिती, विनता, गौरी, गांधारी, मातंगी, कृष्णा, यशोदा, सत्यवादिनी, ब्रम्हावादिनी, काली कपालिनी, कराल नेत्र वाली, भद्रा, निद्रा, सत्य की रक्षा करने वाली, जल में, स्थल में, अन्तरिक्ष में, सर्वत्र सभी प्रकार के उपद्रवों से रक्षा करों स्वाहा ।

जिस स्त्री का गर्भ नष्ट हो जाता है, गिर जाता है, बालक मर जाता है अथवा वह काक बंध्या भी हो तो इस विद्दा को धारण करने से अर्थात जप करने से गर्भिणी जीववत्सा होगी इसमें कोई संशय नहीं है । । ११-१२। । 

 इस मन्त्र को भोजपत्र में चन्दन से लिखकर धारण करने से सौभाग्यवती स्त्रियाँ पुत्रवती हो जाति है, इसमें कोई शंका नहीं है । । १३। । युद्ध में, राजकुल में, जुआ में, इस मन्त्र के प्रभाव से नित्य जय हो जाती है । भयंकर युद्ध में भी विद्दा अर्थ-शस्त्रों से रक्षा करती है । । १४। ।

गुल्म रोग, शूल रोग, आँख के रोग की व्यथा इससे शीघ्र नाश हो जाती है । ये विद्दा शिरोवेदना, ज्वर आदि नाश करने वाली है । । १५। ।   
इस प्रकार की अभया ये अपराजिता विद्या कही गई है, इसके स्मरण मात्र से कही भी भय नहीं होता । । १६। । 

 सर्प भय, रोग भय, तरस्करों का भय, योद्धाओं का भय, राज भय, द्वेष करने वालों का भय और शत्रु भय नहीं होता है । । १७। । यक्ष, राक्षस, वेताल, शाकिनी, ग्रह, अग्नि, वायु, समुद्र,विष आदि से भय नहीं होता । । १८। 

 क्रिया से शत्रु द्वारा किये हुए वशीकरण हो, उच्चाटन स्तम्भ हो, विद्वेषण हो, इन सबका लेशमात्र भी प्रभाव नहीं होता । । १९। ।
  जहाँ माँ अपराजिता का पाठ हो, यहाँ तक की यदि यह मुख में कंठस्थ हो, लिखित रूप में साथ हो,चित्र अर्थात यन्त्र रूप में लिखा हो तो भी भय-बाधाएं कुछ नहीं कर पाते । । २०। । 
 यदि माँ अपराजिता के इस स्तोत्र को तथा चतुर्भुजा स्वरुप को साधक ह्रदय रूप में धारण करेगा तो वह बाहर भीतर सब प्रकार से भयरहित होकर शांत हो जाता है। । २१। ।

लाल पुष्प की माला धारण की हुई, कोमल कमलकान्ति के समान आभा वाली, पाश अंकुश तथा अभय मुद्राओं से समलड़्कृत सुन्दर स्वरुप वाली । । २२। । 
 साधको को मन्त्र वर्ण रूप अमृत को देती हुई, माँ का ध्यान करें । इस विद्दा से बढ़कर कोई वशीकरण सिद्धि देने वाली विद्दा नहीं है । । २३। । 
 न रक्षा करने वाली, न पवित्र, इसके समान कोई नहीं है, इस विषय म कोई चिन्तन करने की आव्य्शकता नहीं है । प्रात:काल में साधको माँ के कुमारी रूप की पूजन विधि खाद्द सामग्री से अनेक प्रकार के आभरणों से करनी चाहिए । कुमारी देवी के प्रसन्न होने से मेरी ( अपराजिता की ) प्रीति बढ़ जाती है । । २४। ।

ॐ अब मैं उस महान बलशालिनी विद्या को कहूँगा, जो सभी दुष्ट दमन करने वाली, सभी शत्रु नाश करने वाली, दारिद्र्य दुःख को नाश करने वाली, दुर्भाग्य का नाश करने वाली, भूत, प्रेत, पिशाच, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस का नाश करने वाली है । । २५-२६। ।
  डाकिनी, शाकिनी, स्कन्द, कुष्मांड आदि का नाश करने वाली, महारौद्र रूपा, महाशक्ति शालिनी, तत्काल विशवास देने वाली है । । २७। ।  
ये विद्दा अत्यन्त गोपनीय तथा पार्वती पति भगवान् भोलेनाथ की सर्वस्व है, इसलिए इसे गुप्त रखना चाहिए । ऐसी विद्या तुम्हे कहता हु सावधान होकर सुनो । । २८। ।

एक, दो, चार, दिन या आधे महीने, एक महीने, दो महीने, तीन महीने, चार महीने, पाँच महीने, छह महीने तक चलने वाला वाट ज्वर, पित्त सम्बन्धी ज्वर अथवा कफ दोष, सन्निपत हो या मुहूर्त मात्र तक रहने वाला पित्त ज्वर, विष का ज्वर, विषम ज्वर, दो दिन वाला, तीन दिन वाला, एक दिन वाला अथवा अन्य कोई ज्वर हो वे सब अपराजिता के स्मरण मात्र से शीघ्र नष्ट हो जाते है । । २९-३०-३१। ।

ॐ हृीं हन हन काली शर शर, गौरी धम-धम, हे विद्या स्वरुपा, हे आले ताले माले गंधे बंधे विद्दा को पचा दो पचा दो, नाश करो नाश करो, पाप हरण करो पाप हरण करो, संहार करो संहार करो, दु:स्वप्न विनाश करने वाली, कमल पुष्प में स्थित, विनायक मात रजनी संध्या स्वरुपा, दुन्दुभी नाद करने वाली, मानस वेग वाली, शंखिनी, चक्रिणी, वज्रिणी, शूलिनी अपस्मृत्यु नाश करने वाली, विश्वेश्वरी द्रविडी द्राविडी द्रविणी द्राविणी केशव दयिते पशुपति सहिते, दुन्दुभी दमन करने वाली, दुर्मद दमन करने वाली, शबरी किराती मातड़्गी ॐ द्रं द्रं ज्रं ज्रं क्रं क्रं तुरु तुरु ॐ द्रं कुरु कुरु ।

जो प्रत्यक्ष या परोक्ष में मुझसे जलते है, उन सबका दमन करो- दमन करो, मर्दन करो – मर्दन करो, तापित करो तापित करो, छिपा दो छिपा दो, गिरा दो गिरा दो, शोषण करो शोषण करो, उत्सादित करो, उत्सादित करो, हे ब्रह्माणी, हे वैष्णवी, हे माहेश्वरी, कौमारी, वाराही, हे नृसिंह सम्बन्धिनी, ऐन्द्री, चामुंडा, महालक्ष्मी, हे विनायक सम्बन्धिनी, हे उपेन्द्र सम्बन्धिनी, हे अग्नि सम्बन्धिनी, हे चंडी, हे नैॠत्य सम्बन्धिनी, हे वायव्या, हे सौम्या, हे ईशान सम्बन्धिनी, हे प्रचण्डविद्दा वाली, हे इन्द्र तथा उपेन्द्र की भागिनी आप ऊपर तथा नीचे से सब प्रकार से रक्षा करें ।

ॐ जया विजया शान्ति स्वस्ति तुष्ठी पुष्ठी बढाने वाली देवी आपको नमस्कार है । दुष्टकामनाओं को अंकुश में करने वाली, शुभकामना देने वाली, सभी कामनाओं को वरदान देने वाली, सब प्राणियों में मुझे प्रिय करो प्रिय करो स्वाहा ।

आकर्षण करने वाली, आवेशित करने वाली, ज्वाला माला वाली, रमणी, रमाने वाली, पृथ्वी स्वरुपा, धारण करने वाली, तप करने वाली, तपाने वाली, मदन रूपा, मद देने वाली, शोषण करने वाली, सम्मोहन करने वाली, नील्ध्वज वाली, महानील स्वरुपा, महागौरी, महाश्रिया, महाचान्द्री, महासौरी, महामायुरी, आदित्य रश्मि, जाहृवी। यमघंटा किणी किणी ध्वनीवाली, चिन्तामणि, सुगंध वाली, सुरभा, सुर, असुर उत्पन्न करने वाली, सब प्रकार की कामनाये पूर्ति करने वाली, जैसा मेरा मन वांछित कार्य है (यहाँ स्तोत्र का पाठ करने वाले अपनी कामना का चिन्तन कर सकते है।) वह सम्पन्न हो जाये स्वाहा ।

ॐ स्वाहा । ॐ भू: स्वाहा । ॐ भुव: स्वाहा । ॐ स्व: स्वाहा । ॐ मह: स्वाहा । ॐ जन: स्वाहा । ॐ तप: स्वाहा । ॐ सत्यम स्वाहा । ॐ भूभुर्व: स्व: स्वाहा ।
जो पाप जहा से आया है , वाही लौट जाये स्वाहा । 
 ॐ यह महा वैष्णवी अपराजिता महाविद्दा अमोघ फलदायी है । । ३२। । 
 ये महाविद्दा महाशक्तिशाली है अत: इसे अपराजिता अर्थात् किसी प्रकार की अन्य विद्द्य से पराजित ना होने वाली कहा गया है । इसको स्वयं विष्णु ने निर्मित किया है इसका सदा पाठ करने से सिद्दी प्राप्त होती है । । ३३। ।

इस विद्दा के समान तीनो लोको में कोई रक्षा करने में समर्थ दूसरी विद्दा नहीं है । ये तमोगुण स्वरूपा साक्षात रौद्र्शक्ति मानी गई है । । ३४। । 
 इस विद्दा के प्रभाव से यमराज भी डरकर चरणों में बैठ जाते है । इस विद्दा की मूलाधार स्थापित करना चाहिए तथा राटा को स्मरण करना चाहिए। । ३५। ।
  नीले मेघ के समान चमकती बिजली जैसे केश वाली, चमकते सूर्य के समान तीन नेत्र वाली माँ मेरे प्रत्यक्ष विराजमान है । । ३६। ।  
शक्ति, त्रिशूल, शंख, पानपात्र को धारण की हुई, व्याघ्र चरम धारण की हुई , किंकिणियों से सुशोभित, मण्डप में विराजमान, गगनमंडल के भीतरी भाग में धावन करती हुई, पादुकाहित चरण वाली, भयंकर दांत तथा मुख वाली, कुण्डल युक्त सर्प के आभरणों से सुसज्जित, खुले मुख वाली, जिहृा को बाहर निकाली हुई, टेड़ी भौंहें वाली, अपने भक्त से शत्रुता करने वालों का रक्त पानपात्र से पीने वाली, क्रूर दृष्टि से देखने पर सात प्रकार के धातु शोषण करने वाली, बारम्बार त्रिशूल से शत्रु के जिहृा को कीलित कर देने वाली, पाश से बाँधकर उसे निकट लाने वाली, ऐसी महाशक्ति शाली माँ को आधी रात के समय में ध्यान करे। । ३७-४१। । 
 फिर रात के तीसरे प्रहर में जिस जिसका नाम लेकर जिस हेतु जप किया जाये उस- उस को वैसा स्वरुप बना देती है ये योगिनी माता । । ४२।।

ॐ बला महाबला असिद्द्साधनी स्वाहा इति । इस अमोघ सिद्ध श्रीवैष्णवी विद्दा, श्रीमद अपराजिता को दु:स्वप्न, दुरारिष्ट, आपदा की अवस्था में अथवा किसी कार्य के आरम्भ में ध्यान करें तो इससे विघ्न बाधाये शांत हो जायेंगी । सिद्धि प्राप्त होगी । । ४३-४४। ।

हे जगज्जननी माँ इस स्तोत्र पाठ में मेरे द्वारा यदि विसर्ग, अनुस्वार, अक्षर, पाठ छोड़ गया हो तो भी माँ आपसे क्षमा प्रार्थना करता हुँ की मेरे पाठ का पूर्ण फल मिले, मेरे संकल्प की अवश्य सिद्धि हो अर्थात किसी भी प्रकार की उच्चारण की भूल को क्षमा करें । । ४५। ।

हे माँ मैं आपके वास्तविक स्वरुप को नही जानता आप कैसी है ये भी नहीं जानता, बस मुझे इतना पता है की आपका रूप जैसा भी हो मैं उसी रूप को पुजरा हुँ । आपके सभी रूपों को नमस्कार हैं अर्थात हे अपराजिता माँ आपका स्वरुप अपरम्पार है, उसे जाना नहीं जा सकता, आपके विलक्षण स्वरुप को हमारा शत शत नमन है । । ४६।

।। श्री दुर्गाऽर्पणमस्तु ।।

🍁 स्तोत्र पाठ विधि🍁
        अपराजिता स्तोत्र को निरंतर एक महीने तक प्रतिदिन तीनों काल पाठ करने से सभी कार्य सफल होते है, अपराजिता स्तोत्र का 1200 पाठ का अनुष्टान करने से स्तोत्र सिद्ध होता है, इसके लिए प्रतिदिन इस स्तोत्र का 120 पाठ, 10 दिन तक करना चाहियें।

पाठ रात्री के 10 बजे से लेकर 1 बजे के बीच, अपने सामने माँ दुर्गा की मूर्ति के सामने एक शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें और विनियोग कर पाठ आरम्भ करे, स्तोत्र का पाठ शुद्ध व स्पष्ट स्वर से करे, यदि सम्भव ना हो, तो निकटतम परिजन अथवा योग्य ब्रम्हाण द्वारा पाठ कराएँ।

🍁अपराजिता स्तोत्र के लाभ🍁
       त्रैलोक्य विजय अपराजिता स्तोत्र अर्थात तीनो लोको में जो पराजित ना हो ने दे तीनो लोको में जो विजय प्रदान करे। 

इस स्तोत्र के पाठ से नवग्रह दोष समाप्त हो जाते है, भूत-प्रेत आदि की बाधाओं से मुक्ति मिलती है, नकारात्मक शक्तियों का विनाश हो जाता है, 

मनुष्य की सभी मनोकामना सिद्ध हो जाती है, जाने अनजाने किये गए या हुए पापो का विनाश हो जाता है, विद्यार्थो को विद्या प्रदान करता है, 
निःसंतान को संतान प्राप्ति के द्वार खुल जाते है, सरकारी कामो में सफलता प्राप्त होती है, किसी भी प्रकार का कोई भय नहीं रहता, 

सभी प्रकार के उपद्रव शांत हो जाते है, शत्रु के द्वारा किये हुए मारण, मोहन, उच्चाटन आदि क्रियाओ का नाश कर देने में समर्थ है यह उत्तम स्तोत्र, 
सभी प्रकार के विघ्न शांत हो जाते है 

इस स्तोत्र पाठ से,दुःस्वप्न शांत हो जाते है, सामाजिक मान सन्मान देने में समर्थ है यह स्तोत्र, राजनीतिक सफलता प्राप्ति के लिये इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए | 
🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

Monday, 16 October 2023

नवरात्रि लघु उपाय smart method सुख, सौभाग्य, स्वास्थ्य सम्पन्नता चाहिए तो, करें यह उपाय

 सुख, सौभाग्य, स्वास्थ्य सम्पन्नता चाहिए तो, करें यह उपाय

नवरात्रि के प्रथम दिन मां दुर्गा का पंचोपचार पूजन के बाद सुख, सौभाग्य, स्वास्थ्य सम्मान  सम्पन्नता पाने के लिए मां से प्रार्थना करें और हाथ में लिया पुष्प (फूल) मां को चढ़ा दें। 
इसके बाद निम्न मंत्र का -

"देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि में परमं सुखम्।
 रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥"

इस श्लोक मंत्र का एक माला मंत्र जप करें।
 मंत्र जप के बाद इसी श्लोक मंत्र का सम्पुट लगाकर  दुर्गा सप्तशती से सम्पूर्ण "अर्गला" स्तोत्र का एक पाठ करें।  अर्गलास्तोत्र पाठ पूरा करने के बाद- पुनः उपरोक्त श्लोक मंत्र का एक  (1) माला मंत्र जप करें।

इस क्रिया को नवरात्रि के प्रत्येक दिन करें ।
ऐसा प्रयोग करने से मां की कृपा से सुख, सौभाग्य सम्पन्नता मिलता है। खराब स्वास्थ्य ठीक होने लगता है और परेशानियां आपसे दूर होने लगती हैं।

यह एक सफल प्रयोग है।
 जगत जननी जगदम्बा के चरणों में श्रद्धा भाव से  करना आवश्यक है।
                                                    ॥जय मां दुर्गा॥

Sunday, 15 October 2023

नवरात्रि लघु उपाय (३)Navratri special smart method 3

नवरात्रि में मंगलवार को करें
 खर्च रोकने के लिए यह लघुउपाय 

आप अपने खर्चे से परेशान हैं, जितनी आमदनी हो रही है,  
वह सब खर्च हो जा रहा है। 
 आप बहुत परेशान और तनाव में रह रहे हैं। 
तो नवरात्रि में आने वाले मंगलवार से शुरू करें उपाय-

मंगलवार के दिन अपने पास के हनुमान मंदिर में "सवा" मात्रा में 
(अर्थात सवा रूपए का गुड़ चना ले लें और हनुमान जी को भोग लगायें । 
फिर वही बैठ कर (11) ग्यारह बार हनुमान चालीसा पाठ करें
 और हनुमान जी से प्रार्थना करें कि मेरे घर में हो रहे खर्चे को रोक दें, 
जिससे हमारी आमदनी बढ़े, हमारे घर में धन का संचय हो। 
इस प्रकार लगातार तीन मंगलवार को यह उपाय करें।
हनुमान जी की कृपा से आपके खर्च कम होने लगेंगे
और धन की बढ़ोतरी होने लगेगी।
आप श्रद्धा भाव से करेंगे तो बजरंगवली की कृपा मिलेगी ही।

॥जय जय श्री राम॥


सद्गुरु की चेतना

सद्गुरु की चेतना: जीवन को दिव्यता की ओर ले जाने वाला मार्ग 🪷मनुष्य के जीवन में अनेक प्रकार के ज्ञान प्राप्त होते हैं, परंतु वह ज्ञान जो आत्...