Monday, 18 September 2023

गणेश स्तोत्र लिंक

गणेश स्तोत्र महात्म्य १
https://youtu.be/C6w5nuXHBdM?si=i-v9V4CNyNPm7DFf

गणेश स्तोत्र -
https://youtu.be/xOQ7OKGCPyU?si=ELpX3LgXuCRcA_4V

Ganesh Chaturthi worship #गणेश #चतुर्थी पूजा विधि

#गणेशचतुर्थी संक्षिप्त पूजन विधि।। 
।।पवित्रीकरण।।  
बायें हाथ में जल लेकर उसे दायें हाथ से ढक कर मंत्र पढ़ें एवं मंत्र पढ़ने के बाद इस जल को दाहिने हाथ से अपने सम्पूर्ण शरीर पर छिड़क लें। 

॥ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यंतरः शुचिः॥ 

आचमन 
मन , वाणि एवं हृदय की शुद्धि के लिए आचमनी द्वारा जल लेकर तीन बार मंत्र के उच्चारण के साथ पिएं। 
ॐ केशवाय नमः।  
ॐ नारायणाय नमः। 
ॐ माधवाय नमः।  
ॐ हृषीकेशाय नमः।
इस मंत्र को बोलकर हाथ धो लें।

शिखा बंधन  
शिखा पर दाहिना हाथ रखकर दैवी शक्ति की स्थापना करें।                                                           

चिद्रुपिणि महामाये दिव्य तेजः समन्विते ,तिष्ठ देवि शिखामध्ये तेजो वृद्धिं कुरुष्व मे॥

मौली बांधने का मंत्र-  
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:।  
तेन त्वामनुबध्नामि  रक्षे मा चल मा चल॥
  
तिलक लगाने का मंत्र-  
कान्तिं लक्ष्मीं धृतिं सौख्यं सौभाग्यमतुलं बलम्। 
ददातु चन्दनं नित्यं सततं धारयाम्यहम्॥

यज्ञोपवीत मंत्र-  
ॐ यज्ञोपवीतम् परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्रयं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं  बलमस्तु  तेज:।।

पुराना यगोपवीत त्यागने का मंत्र  

एतावद्दिनपर्यन्तं ब्रह्म त्वं धारितं मया।  
जीर्णत्वात् त्वत्परित्यागो गच्छ सूत्र यथासुखम्।
 ● 
न्यास:-  
संपूर्ण शरीर को साधना के लिये पुष्ट एवं सबल बनाने के लिए प्रत्येक मन्त्र के साथ संबन्धित अंग को दाहिने हाथ से स्पर्श करें।

ॐ वाङ्ग में आस्येस्तु  -  मुख को
ॐ नसोर्मे प्राणोऽस्तु  -  नासिका के छिद्रों को
ॐ चक्षुर्में तेजोऽस्तु - दोनो नेत्रों को
ॐ कर्णयोमें श्रोत्रंमस्तु - दोनो कानों को
ॐ बह्वोर्मे  बलमस्तु  - दोनोें बाजुओं को
ॐ ऊवोर्में ओजोस्तु  -  दोनों जंघाओ  को
ॐ अरिष्टानि मे अङ्गानि सन्तु -   सम्पूर्ण शरीर को

आसन पूजन-   
अब अपने आसन के नीचे चन्दन या कुमकुम से त्रिकोण बनाकर उसपर अक्षत पुष्प समर्पित करें एवं मन्त्र बोलते हुए हाथ जोडकर प्रार्थना करें। 

ॐ पृथ्वि त्वया धृतालोका देवि त्वं विष्णुना धृता।
त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥ 

दिग् बन्धन:-   
बायें हाथ में जल या चावल लेकर दाहिने हाथ से चारों दिशाओ में छिड़कें। 

 ॐ अपसर्पन्तु ये भूता ये भूताःभूमि संस्थिताः। 
ये भूता विघ्नकर्तारस्ते नश्यन्तु शिवाज्ञया॥ 
अपक्रामन्तु भूतानि पिशाचाः सर्वतो दिशम्। 
सर्वेषाम विरोधेन  पूजाकर्म समारम्भे ॥ 

 ।।गणेश स्मरण।।   
सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः। 
लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः॥ 

धुम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः।   
द्वादशैतानि नामानि  यः पठेच्छृणुयादपि॥ 

विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा। 
संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते॥ 

।।श्री गुरु ध्यान।।  
अस्थि चर्म युक्त देह को हिं गुरु नहीं कहते अपितु इस देह में जो ज्ञान समाहित है उसे गुरु कहते हैं , इस ज्ञान की प्राप्ति के लिये उन्होने जो तप और त्याग किया है , हम उन्हें नमन करते हैं , गुरु हीं हमें दैहिक , भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करने का ज्ञान देतें हैं इसलिये शास्त्रों में गुरु का महत्व सभी देवताओं से ऊँचा माना गया है , ईश्वर से भी पहले गुरु का ध्यान एवं पूजन करना शास्त्र सम्मत कही गई है।

द्विदल कमलमध्ये  बद्ध  संवित्समुद्रं। धृतशिवमयगात्रं  साधकानुग्रहार्थम् ॥
श्रुतिशिरसि विभान्तं बोधमार्तण्ड मूर्तिं। शमित तिमिरशोकं श्री गुरुं भावयामि॥

ह्रिद्यंबुजे कर्णिक मध्यसंस्थं। 
सिंहासने संस्थित दिव्यमूर्तिम्॥
ध्यायेद् गुरुं चन्द्रशिला प्रकाशं।       
चित्पुस्तिकाभिष्टवरं दधानम्॥
श्री गुरु चरणकमलेभ्यो नमः ध्यानं समर्पयामि।

॥ श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः प्रार्थनां समर्पयामि , श्री गुरुं मम हृदये आवाहयामि मम हृदये कमलमध्ये स्थापयामि नमः॥ 

।।गणेश पूजन।। 
                 ।।ध्यानम।।
खर्वं स्थूलतनुं गजेन्द्रवदनं लम्बोदरं सुन्दरं, प्रस्यन्दन्मदगन्ध लुब्धमधुपव्यालोलगण्डस्थलम्।  
दन्ताघातविदारितारिरुधिरैः    सिन्दुरशोभाकरं। वन्दे शैलसुता सुतं गणपतिं सिद्धिप्रदं कामदम्॥
ॐ गं गणपतये नमः ध्यानं समर्पयामि।

              ।।आवाहन।।
ॐ गणानां त्वां गणपति ( गूं ) हवामहे प्रियाणां त्वां प्रियपति ( गूं ) हवामहे निधीनां त्वां निधिपति ( गूं ) हवामहे वसो मम। आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम्॥

एह्येहि हेरन्ब महेशपुत्र समस्त  विघ्नौघविनाशदक्ष।
माङ्गल्यपूजाप्रथमप्रधान गृहाण पूजां भगवन् नमस्ते॥
ॐ भूर्भुवः स्वः सिद्धिबुद्धि सहिताय गणपतये नमः। गणपतिमावाहयामि ,स्थापयामि पूजयामि। 

।।आसन।।
॥अनेकरत्नसंयुक्तं नानामणि गणान्वितम् कार्तस्वरमयं दिव्यमासनं परिगृह्यताम॥
ॐ गं गणपतये नमः आसनार्थे  पुष्पं समर्पयामि।

।।स्नान।।
॥मन्दाकिन्यास्तु यद्वारि सर्वपाप हरं शुभम्। तदिदं कल्पितं देव  स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥ 

ॐ गं गणपतये नमः  पाद्यं , अर्ध्यं , आचमनीयं च  स्नानं समर्पयामि, पुनः आचमनीयं जलं समर्पयामि।(पांच आचमनी जल प्लेट में चढायें )

।।वस्त्र।।
॥ सर्वभुषादिके सौम्ये  लोके  लज्जानिवारणे , मयोपपादिते तुभ्यं गृह्यतां वसिसे शुभे ॥
ॐ गं गणपतये नमः वस्त्रोपवस्त्रं समर्पयामि , आचमनीयं जलं समर्पयामि।

।।यज्ञोपवीत।।
ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं  पुरस्तात्।
आयुष्यमग्रयं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥
यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्य त्वा यज्ञोपवितेनोपनह्यामि।
नवभिस्तन्तुभिर्युक्तं  त्रिगुणं   देवतामयम्।
उपवीतं मया दत्तं गृहाण    परमेश्वर॥
ॐ गं  गणपतये नमः यज्ञोपवीतं समर्पयामि,यज्ञोपवीतान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।

।।चन्दन।।
॥ॐ श्रीखण्डं  चन्दनं  दिव्यं  गन्धाढयं सुमनोहरं , विलेपनं सुरश्रेष्ठ चन्दनं प्रतिगृह्यताम्॥
ॐ गं गणपतये नमः चन्दनं समर्पयामि।

।।अक्षत।।
॥अक्षताश्च सुरश्रेष्ठ कुङ्कुमाक्ताः  सुशोभिताः मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वर॥
ॐ गं गणपतये नमः अक्षतान् समर्पयामि।

।।पुष्प।।
माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि भक्तितः मयाऽऽ ह्रतानि पुष्पाणि पूजार्थं प्रतिगृह्यतां॥ 
ॐ गं गणपतये नमः पुष्पं बिल्वपत्रं च समर्पयामि ।

।।दूर्वा।।
॥दूर्वाङ्कुरान् सुहरितानमृतान् मङ्गलप्रदान्,आनीतांस्तव पूजार्थं गृहाण गणनायक॥
ॐ गं गणपतये नमः दूर्वाङ्कुरान समर्पयामि।

।।सिन्दुर।।
॥ सिन्दूरं शोभनं रक्तं सौभाग्यं सुखवर्धनम् ,शुभदं कामदं चैव सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम्॥
ॐ गं गणपतये नमः सिदूरं समर्पयामि।

।।धूप।।
॥ वनस्पति रसोद् भूतो    गन्धाढयो  सुमनोहरः,आघ्रेयः सर्वदेवानां धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम्॥
ॐ गं गणपतये नमः धूपं आघ्रापयामि ।

।।दीप।।
॥ साज्यं च वर्तिसंयुक्तं वह्निना  योजितं मया, दीपं गृहाण देवेश त्रैलोक्यतिमिरापहम्॥ 
ॐ गं गणपतये नमः दीपं दर्शयामि।

।।नैवैद्य।।
॥शर्कराखण्डखाद्यानि दधिक्षीर घृतानि च , आहारं भक्ष्यभोज्यं च नैवैद्यं प्रतिगृह्यताम्॥
ॐ गं गणपतये नमः नैवैद्यं निवेदयामि नानाऋतुफलानि च समर्पयामि, आचमनीयं जलं समर्पयामि।

।।ताम्बूल।।
॥पूगीफलं महद्दिव्यम् नागवल्ली दलैर्युतम्  एलालवङ्ग संयुक्तं ताम्बूलं  प्रतिगृह्यताम्॥ 
ॐ गं गणपतये नमः ताम्बूलं समर्पयामि।

।।दक्षिणा।।
॥हिरण्यगर्भगर्भस्थं  हेमबीजं विभावसोः   अनन्तपुण्यफलदमतः शान्तिं  प्रयच्छ मे॥
ॐ गं गणपतये नमः कृतायाः  पूजायाः सद् गुण्यार्थे द्रव्य दक्षिणां समर्पयामि।

               ।।आरती।।
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
एक दंत दयावंत, चार भुजा धारी।
माथे सिंदूर सोहे,मूसे की सवारी॥
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

पान चढ़े फल चढ़े, और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा॥
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया।
बांझन को पुत्र देत,निर्धन को माया॥
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

विघ्न विनाशक स्वामी सुख संपत्ति देवा।
सब काम सिद्ध करे श्री गणेश देवा।।
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

दीनन की लाज रखो, शंभु सुतकारी।
कामना को पूर्ण करो, जाऊं बलिहारी॥
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

॥ कदलीगर्भसम्भूतं कर्पूरं तु प्रदीपितम्,आरार्तिकमहं कुर्वे पश्य मां वरदोभव॥
ॐ गं गणपतये नमः आरार्तिकं समर्पयामि।

।।मन्त्रपुष्पाञ्जलि।।
॥नानासुगन्धिपुष्पाणि  यथाकालोद् भवानि च  पुष्पाञ्जलिर्मया दत्तो गृहान परमेश्वर॥

ॐ गं गणपतये नमः। मन्त्रपुष्पाञ्जलिम् समर्पयामि।

।।प्रदक्षिणा।।
॥ यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानिच,तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे॥
ॐ गं गणपतये नमः  प्रदक्षिणां समर्पयामि।

।।विशेषार्ध्य।।
रक्ष रक्ष गणाध्यक्ष रक्ष त्रैलोक्यरक्षक , भक्तानामभयं कर्ता त्राता भव भवार्णवात्। 
द्वैमातुर कृपासिन्धो  षाण्मातुराग्रज प्रभो, वरदस्त्वं वरं देहि वाञ्छितं वाञ्छितार्थद॥ 
अनेन सफलार्ध्येण वरदोऽस्तु सदामम॥
ॐ गं गणपतये नमः विशेषार्ध्य    समर्पयामि।

            ।।प्रार्थना।।
विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय 
लम्बोदराय सकलाय जगध्दिताय
नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय  
गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते

भक्तार्तिनाशनपराय गणेश्वराय   
सर्वेश्वराय शुभदाय सुरेश्वराय
विद्याधराय विकटाय च वामनाय  
भक्तप्रसन्नवरदाय नमो नमस्ते

नमस्ते ब्रह्मरूपाय विष्णुरूपाय ते नमः 
नमस्ते रुद्ररुपाय करिरुपाय ते नमः
विश्वरूपस्वरुपाय नमस्ते ब्रह्मचारिणे भक्तप्रियाय देवाय नमस्तुभ्यं विनायक
त्वां विघ्नशत्रुदलनेति च सुन्दरेति  
भक्तप्रियेति सुखदेति फलप्रदेति

विद्याप्रदेत्यघहरेति च ये स्तुवन्ति 
तेभ्यो गणेश वरदो भव नित्यमेव
त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या  
विश्वस्य बीजं परमासि माया
सम्मोहितं देवि समस्तमेतत्  
त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः। 

ॐ  गं  गणपतये नमः   प्रार्थनापूर्वकं नमस्कारान्  समर्पयामि। (साष्टाङ्ग  नमस्कार करें )
             ।।समर्पण।।
गणेशपूजने कर्म यन्न्यूनमधिकं कृतम्।
तेन सर्वेण सर्वात्मा प्रसन्नोऽस्तु सदा मम॥
अनया पूजया गणेशे प्रियेताम् न मम।
( ऐसा कहकार समस्त पूजनकर्म भगवान् को समर्पित कर दें ) तथा पुनः नमस्कार करें। गणेश जी से आशीर्वाद मांगें।आप चाहें तो गुरुप्रदत्त सर्वार्थ सिद्धि गणेश मंत्र और अथर्वशीर्ष का पाठ करें।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

Tuesday, 22 August 2023

#श्रावण #मास में करें #गौरीशंकर#स्तोत्र #पाठ

!! #उमामहेश्वर_#स्तोत्रम् !!

#नमः शिवाभ्याम्
नवयौवनाभ्यां परस्पराश्लिष्ट वपुर्धराभ्याम ।
नगेन्द्रकन्यावृषकेतनाभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्यां ॥

नमः शिवाभ्याम्
सरसोत्सवाभ्यां नमस्कृताभीष्टवरप्रदाभ्याम ।
नारायणेनार्चितपादुकाभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम ॥

नम: शिवाभ्याम् 
वृषवाहनाभ्यां विरिञ्चिविष्ण्विन्द्रसुपूजिताभ्याम 
विभूतिपाटिरविलेपनाभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्यां ॥

नमः शिवाभ्याम्
जगदीश्वराभ्यां जगत्पतिभ्यां जयविग्रहाभ्याम ।
जम्भारिमुख्यैरभिवन्दिताभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्यां ॥

नमः शिवाभ्याम्
परमौषधाभ्याम पञ्चाशरी पञ्जररञ्चिताभ्याम 
प्रपञ्च सृष्टिस्थिति संहृताभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्यां ॥

नमः शिवाभ्याम्
ऽतिसुन्दराभ्याम अत्यन्तमासक्तहृदम्बुजाभ्याम ।
अशेषलोकैकहितङ्कराभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्यां ॥

नमः शिवाभ्यां 
कलिनाशनाभ्यां कङ्कालकल्याणवपुर्धराभ्याम 
कैलाशशैलस्थितदेवताभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्यां ॥

नमः शिवाभ्याम्
शुभापहाभ्याम अशेषलोकैकविशेषिताभ्याम ।
अकुण्ठिताभ्यां स्मृतिसंभृताभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्यां ॥

नमः शिवाभ्यां 
रथवाहनाभ्यां रवीन्दुवैश्वानरलोचनाभ्याम ।
राका शशाङ्काभ मुखाम्बुजाभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्यां॥
 
नमः शिवाभ्यां 
जटिलन्धराभ्यां जरामृतिभ्याम चविवर्जिताभ्याम 
जनार्दनाब्जोद्भवपूजिताभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्यां ॥

नमःशिवाभ्यां विषमेशणाभ्यांबिल्वच्च्हदामल्लिकदामभृद्भ्याम 
शोभावती शान्तवतीश्वराभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्यां ॥

नमः शिवाभ्यां 
पशुपालकाभ्याम जगत्त्रयीरशण बद्दहृद्भ्याम ।
समस्त देवासुरपूजिताभ्याम नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्यां ॥

स्तोत्रं त्रिसन्ध्यं शिवपार्वतीभ्यां भक्त्या पठेद्द्वादशकं नरो यः ।
स सर्व्सौभाग्य फलानि भुङ्क्ते शतायुरन्ते शिवलोकमेति ॥

  ॥इति श्रीमत्छङकराचार्य कृत् उमामहेश्वर स्तोत्रम्॥

गुरु अष्टकम्

शरीरं सुरूपं तथा वा कलत्रं,

यशश्रचारु चित्रं धनं मेरुकुलम्।

मनश्चेन लंचम गुरोरंघ्रिपद्मे

ततः किं, ततः किं, ततः किं, ततः किं।।

 आपका शरीर अच्छा ही सुंदर हो, आपकी पत्नी भी सुंदर हो, आपका यश दिशाओं में हो, मेरु पर्वत की तरह विशाल धन संपत्ति हो, यदि आपका मन गुरु के चरणकमलों में नहीं है तो फिर हो इन सब का क्या अर्थ क्या है, क्या अर्थ है, क्या अर्थ है, क्या अर्थ है?

 

कलत्रं धनं पुत्र पौत्रादि सर्वं,

गृहं बंधवा सर्वमेतद्धि जातम।

मनश्चेन लंचम गुरोरंघृ पद्मे

ततः किं, ततः किं, ततः किं, ततः किं।।

 आपके पास पत्नी हो, धनसम्पत्ति हो, पुत्र, पुत्र आदि सब, घर, भाई-बहन, सभी साधु-संत भी हों पर आपके मन में यदि गुरु के चरणकमलों में न लगे तो इन सबका क्या अर्थ है, क्या अर्थ है, क्या अर्थ है, क्या अर्थ है?

 

षडंगादि वेदो मुखे शास्त्र, विद्या

कवित्वादि गद्यम, सुपद्यम करोति।

मनश्चेन लंचम गुरोरंघृ पद्मे

ततः किं, ततः किं, ततः किं, ततः किं।।

 आप सभी वेदों और उनके छः अंग पर सुंदर कविता करते हैं, गद्य पद्य की सुंदर रचना करते हैं, पर आपके मन में यदि गुरु के चरणकमलों में न लगता हो तो इन सबका क्या अर्थ है, क्या अर्थ है, क्या अर्थ है, क्या अर्थ है?

विदेशेषु मन्यः स्वदेशेषु धन्यः,

सदाचार वृत्तेषु मत्तो न चान्यः।

मनश्चेन लंचम गुरोरंघृ पद्मे

ततः किं, ततः किं, ततः किं, ततः किं।।

 ऐसा कोई सोच सकता है कि 'मेरे कलाकार में बहुत सम्मान होता है, मुझे अपने देश में धन्य माना जाता है, सदाचार के मार्ग पर मेरा कोई और नहीं बढ़ता,' पर उसके मन में यदि गुरु के चरणकमलों में कोई विचार न हो तो इन सबका क्या अर्थ है, क्या अर्थ है, क्या अर्थ है, क्या अर्थ है?


 क्षमामण्डले भूप भूपाल वृन्दः

सदा सेवितं यस्य पदारविंदम।

मनश्चेन लंचम गुरोरंघृ पद्मे

ततः किं, ततः किं, ततः किं, ततः किं।।

 किसी का हर समय गुणगान होता रहता है जिसमें सभी जगत के राजा, महाराजा, सम्राट साक्षात् उपस्थित होते थे और उनका सन्मान करते थे, यदि उनके मन में गुरु के चरण कम हों और न प्रतीत हो तो इनमें सबका क्या अर्थ है, क्या अर्थ है, क्या है अर्थ है, क्या अर्थ है?


 यशो मे गतं दिक्षु दानत्पता

जगद्धस्तु सर्वं करे यत्प्रसादात्।

मनश्चेन लंचम गुरोरंघृ पद्मे

ततः किं, ततः किं, ततः किं, ततः किं।।

 "मेरे परोपकार, दान के कार्य एवं मेरे कौशल का यश चारों दिशाओं में फैला हुआ है, जगत की सारी मूर्ति मेरे गुणों के पुरस्कार के रूप में मेरे हाथों में हैं" ऐसा होने पर भी यदि मन गुरु के चरणकमलों में न लगता हो तो इन सबका अर्थ क्या है, क्या अर्थ है, क्या अर्थ है, क्या अर्थ है?


 न भोगे न योगे न वा वाजीराजौ,

न कांता मुखे नैव वित्तेषु चित्तं।

मनश्चेन लंचम गुरोरंघ्री पद्मे,त

तः किं, ततः किं, ततः किं, ततः किं।।

 वैराग्य, बाहरी आकर्षण, योग ध्यान एवं जैसी सफलताएं, पत्नी के सुंदर मुख एवं पृथ्वी का सारा धन, संपत्ति से भी मन दूर हो गया पर यदि मन गुरु के चरणकमलों में न लगे तो इन सबका क्या अर्थ है, क्या अर्थ है है, अर्थ क्या है, अर्थ क्या है?


अरण्ये न वा स्वस्य गेहे न कार्ये,

न देहे मनो वर्तते मे त्वार्घ्ये।

मनश्चेन लंचम गुरोरंघ्री पद्मे,

ततः किं, ततः किं, ततः किं, ततः किं।।

 वन में रहने का या घर में रहने का मन का आकर्षण समाप्त हो गया हो, कोई भी सिद्धि प्राप्त करने की इच्छा समाप्त हो गई हो, अपने शरीर को मजबूत, स्वस्थ बनाए रखने की इच्छा भी न रही हो पर यदि मन गुरु के चरणकमलों में न हो सोचो तो इन सबका क्या मतलब है, क्या मतलब है, क्या मतलब है, क्या मतलब है?

महान संत कवि कबीर ने एक बार कहा था, "यदि साक्षात ईश्वर भी मेरे सामने प्रकट हो जाएं, तो मैं भी अपने गुरु के चरणकमलों को चुनूंगा क्यकि अंततः वे ही ईश्वर मुझे तक लेकर आएंगे।"

यह मंत्र बताता है कि अपार धन-संपदा, ज्ञान, कीर्ति और यहां तक ​​कि सफलता तक गुरु की कृपा के बिना व्यर्थ हैं।


Sunday, 9 July 2023

#ब्रह्म - #शक्ति #स्तोत्र है _ विरह, विरोध और वेदना को मिटाने वाला

अपने #इष्ट-देवता या #भगवती #गौरी का #षोडषोपचार या #पञ्चोपचार आदि विविध उपचारों से पूजन करके ब्रह शक्ति स्तोत्र का पाठ करें। 
यह स्तोत्र देवों के द्वारा ब्रह्मा जी की की गई वंदना है, ऐसा वर्णन स्कंद पुराण में प्राप्त होता है।

ब्रह्मशक्ति स्तोत्र का पाठ किसे करना है:-
जिन व्यक्तियों ने किसी न किसी कारण से अपने प्रिय को खो दिया है और उसने विवाहेतर संबंध बना लिया है, उन्हें नियमित रूप से ब्रह्मशक्ति स्तोत्र का पाठ करना चाहिए
अभीष्ट-प्राप्ति के लिये एकाग्रता के साथ कातरता और समर्पण आवश्यक है।
#पारिवारिक #कलह, #रोग या #अकालमृत्यु आदि की सम्भावना होने पर इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिये।
  प्रणय सम्बन्धों में बाधाएँ या #पति-पत्नी के बीच सामन्जस्य का अभाव होने पर  इसका पाठ अभीष्ट फलदायक होगा।


        ।।श्री शिव उवाच।।  
ब्राह्मि ब्रह्मस्वरूपे त्वं, मां प्रसीद सनातनि। 
परमात्म स्वरूपे च, परमानन्द रूपिणि।। 

ॐ प्रकृत्यै नमो भद्रे, मां प्रसीद भवार्णवे। 
सर्वमंगलरूपे च, प्रसीद सर्वमंगले।। 

विजये शिवदे देवि मां प्रसीद जय-प्रदे। 
वेदवेदांग रूपे च वेदमातःप्रसीद मे।। 

शोकघ्ने ज्ञानरूपे च, प्रसीद भक्त वत्सले। 
सर्वसम्पत्प्रदे माये प्रसीद जगदम्बिके।। 

लक्ष्मीर्नारायण-क्रोडे, स्रष्टुर्वक्षसि भारती। 
मम क्रोडे महामाया, विष्णुमाये प्रसीद मे।। 

काल रूपे कार्य रूपे,प्रसीद दीनवत्सले। 
कृष्णस्य राधिके भद्रे प्रसीद कृष्ण पूजिते।। 

समस्त कामिनीरूपे, कलांशेन प्रसीद मे। 
सर्वसम्पत्स्वरूपे त्वं, प्रसीद सम्पदां प्रदे।। 

यशस्विभिः पूजिते त्वं, प्रसीद यशसां निधेः। 
चराचरस्वरूपे च, प्रसीद मम मा चिरम्।। 

मम योगप्रदे देवि प्रसीद सिद्ध योगिनि। 
सर्वसिद्धिस्वरूपे च, प्रसीद सिद्धिदायिनि।। 

अधुना रक्ष मामीशे, प्रदग्धं विरहाग्निना। 
स्वात्म दर्शनपुण्येन क्रीणीहि परमेश्वरि।।

 ।।फल-श्रुति।।

 एतत् पठेच्छृणुयाच्चन, वियोग-ज्वरो भवेत्। न भवेत् कामिनी भेदस्तस्य जन्मनि जन्मनि।। 

इस स्तोत्र का पाठ करने अथवा सुनने वाले को वियोग-पीड़ा नहीं होती और जन्म जन्मान्तर तक कामिनी-भेद नहीं होता।

ब्रह्मशक्ति स्तोत्र के लाभ:-
पारिवारिक कलह, बीमारी या अकाल मृत्यु आदि के लिए इसका पाठ करना चाहिए। रोमांस संबंधों में रुकावटें आने पर भी इसका पाठ लाभदायक रहेगा।
आज हमारे समाज में 100 में से 40 जोड़े ऐसे हैं जो अपने पारिवारिक जीवन के कारण किसी न किसी तरह से वैचारिक मतभेद या किसी तीसरे पक्ष से मतभेद रखते हैं। 
अनेक विषमताओं का शिकार हो रहा है, जिससे हर पल घुटन और अनिश्चितता के कारण अपना शारीरिक और मानसिक संतुलन खोता जा रहा है। और नतीजा यह है कि इन सभी कारणों से पारिवारिक सामाजिक और आर्थिक स्तर गिरता जा रहा है, हालांकि कुछ समय बाद लोगों को एहसास होता है कि उन्होंने गलत कदम उठाया है, लेकिन जब तक बात समझ में आती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
यह एक ऐसी गलती है जिसे नष्ट नहीं किया जा सकता। 
इस स्तोत्र को पढ़ने या सुनने से #प्रेम #वियोग का कष्ट नहीं होता और पत्नी का वियोग नहीं होता। 
छोटे-मोटे वैचारिक मतभेदों को अपने रिश्ते पर इतना हावी न होने दें कि वे आपके रिश्ते को ही खा जाएं और एक बात हमेशा ध्यान में रखें कि अवैध संबंधों की उम्र और विश्वसनीयता बहुत कम होती है चाहे वह महिला हो या पुरुष। 
आज अपने #पार्टनर को भूल कर किसी और की ओर आकर्षित हो, तो इसकी क्या गारंटी है कि कल किसी और से दूर नहीं भागेगा। 
इस प्रकार की परेशानी और उलझन में - यदि आप धार्मिक प्रवृत्ति के हैं, यदि आप ईश्वर पर भरोसा करते हैं तो - वैदिक पद्धति के ब्रह्मशक्ति स्तोत्र का पाठ करें, जिससे आपको राहत मिलेगी।
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ब्रह्मशक्ति स्तोत्र/ब्रह्मशक्ति स्तोत्र
ब्राह्मी ब्रह्म-स्वरूपे त्वं, मां प्रसीद सनातनीपरमात्म-स्वरूपे च, परमानंद-रूपिणी।।

ॐ प्रकृत्यै नमो भद्रे, मां प्रसीद भवनवे। सर्व मंगल रूपे च, प्रसीद सर्व मंगले।।

विजये शिवदे देवी मां प्रसीद जय-प्रदे। वेद-वेदांग-रूपे च, वेद-मातः प्रसीद मे।।

शोकघ्ने ज्ञान-रूपे च, प्रसीद भक्त वत्सले। सर्व-सम्पत्-प्रदे माये, प्रसीद जगदम्बिके।।

लक्ष्मीनारायण-क्रोडे, स्त्रीस्तुर्वक्षसि भारती। मम क्रोधे महा-माया, विष्णु-माये प्रसीद मे।।

काल-रूपे कार्य-रूपे, प्रसीद दीन-वत्सले। कृष्णस्य राधाके भदेर, प्रसीद कृष्ण पूजिते।।

सर्वकामिनीरूपे, कलांशेन प्रसीद मे। सर्व-सम्पत्-स्वरूपे त्वं, प्रसीद सम्पदां प्रदे।।

यशस्विभिः पूजिते त्वं, प्रसीद यशसं निधेः। चराचर-स्वरूपे च, प्रसीद मम मा चिरम्।।

मम योग-प्रदे देवी ! प्रसीद सिद्ध-योगिनी। सर्वसिद्धिस्वरूपे च, प्रसीद सिद्धिदायिनी।।

अधुना रक्ष मामिषे, प्रदग्घं विरहाग्निना। स्वात्म-दर्शन-पुण्येन, क्रणीहि भगवानि।।

।।फल-श्रुति।।
।।एतत् पथेच्छृणुयाच्च्न, वियोग-ज्वरो भवेत्।। न भवेत् कामिनीभेदस्तस्य जन्मनि जन्मनि।।

इस स्तोत्र का पाठ करने या सुनने वाले को वियोग-पीड़ा नहीं होता और जन्म-जन्मान्तर तक कामिनी-भेद नहीं होता।

Monday, 3 July 2023

श्री #गुरु #सहस्र #नाम #स्त्रोत्र

श्रीगुरुसहस्रनामस्तोत्रम्!! 
ॐ गं गणपतये नमः॥श्रीगुरवे नमः ॥
श्रीपरमगुरवे नमः॥श्रीपरात्परगुरवे नमः ॥
श्रीपरमेष्ठिगुरवे नमः॥ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

(श्रीशिवोक्तं श्रीहरिकृष्णविरचितम्) 
॥ अथ श्रीगुरुसहस्रनामस्तोत्रम् ॥
कैलासशिखरासीनं चन्द्रखण्ड विराजितम् ।
पप्रच्छ विनयाद्भक्त्या गौरी नत्वा वृषध्वजम्॥१॥

॥ श्रीदेव्युवाच ॥
भगवन् सर्वधर्मज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
केनोपायेन च कलौ लोकार्तिर्नाशमेष्यति ॥ २॥
तन्मे वद महादेव यदि तेऽस्ति दया मयि।

॥ श्रीमहादेव उवाच ॥
अस्ति गुह्यतमं त्वेकं ज्ञानं देवि सनातनम् ॥ ३॥
अतीव च सुगोप्यं च कथितुं नैव शक्यते।
अतीव मे प्रियासीति कथयामि तथापि ते ॥ ४॥
सर्वं ब्रह्ममयं ह्येतत्संसारं स्थूलसूक्ष्मकम्।
प्रकृत्या तु विना नैव संसारो ह्युपपद्यते ॥ ५॥
तस्मात्तु प्रकृतिर्मूलकारणं नैव दृश्यते ।
रूपाणि बहुसङ्ख्यानि प्रकृतेः सन्ति मानिनि ॥ ६॥
तेषां मध्ये प्रधानं तु गुरुरूपं मनोरमम् ।
विशेषतः कलियुगे नराणां भुक्तिमुक्तिदम् ॥ ७॥
तस्योपासकाश्चैव ब्रह्माविष्णुशिवादयः ।
सूर्यश्चन्द्रश्च वरुणः कुबेरोऽग्निस्तथापराः ॥ ८॥
दुर्वासाश्च वसिष्ठश्च दत्तात्रेयो बृहस्पतिः ।
बहुनात्र किमुक्तेन सर्वेदेवा उपासकाः ॥ ९॥
गुरूणां च प्रसादेन भुक्तिमुक्त्यादिभागिनः ।
संवित्कल्पं प्रवक्ष्यामि सच्चिदानन्दलक्षणम् ॥ १०॥
यत्कल्पाराधनेनैव स्वात्मानन्दो विराजते ।
मेरोरुत्तरदेशे तु शिलाहैमावती पुरी ॥ ११॥
दशयोजनविस्तीर्णा दीर्घषोडशयोजना ।
वररत्नैश्च खचिता अमृतं स्रवते सदा ॥ १२॥
सोत्थिता शब्दनिर्मुक्ता तृणवृक्षविवर्जिता ।
तस्योपरि वरारोहे संस्थिता सिद्धमूलिका ॥ १३॥
वेदिकाजननिर्मुक्ता तन्नदीजलसंस्थिता ।
वेदिकामध्यदेशे तु संस्थितं च शिवालयम् ॥ १४॥
हस्ताष्टकसुविस्तारं समन्ताच्च तथैव च ।
तस्योपरि च देवेशि ह्युपविष्टो ह्यहं प्रिये ॥ १५॥
दिव्याब्दवर्षपञ्चाशत्समाधौ संस्थितो ह्यहम् ।
महागुरुपदे दृष्टं गूढं कौतुहलं मया ॥ १६॥

विनियोगः-
ॐ अस्य श्रीगुरुसहस्रनाममालामन्त्रस्य
श्रीसदाशिवऋषिः
नानाविधानि छन्दांसि श्रीगुरुर्देवता श्रीगुरुप्रीत्यर्थे
सकलपुरुषार्थसिद्ध्यर्थे
श्रीगुरुसहस्रनाम जपे विनियोगः ।

॥ अथाङ्गन्यासः ॥
श्रीसदाशिवऋषये नमः शिरसि ॥
श्रीनानाविधछन्देभ्यो नमः मुखे ॥
श्रीगुरुदेवतायै नमः हृदये ॥
श्री हं बीजाय नमः गुह्ये ॥
श्री शं शक्तये नमः पादयोः ॥
श्री क्रौं कीलकाय नमः सर्वाङ्गे ॥

॥ अथ गुरुगायत्रीमन्त्रः ॥
ॐ गुरुदेवाय विद्महे परमगुरवे च धीमहि
तन्नो पुरुषः प्रचोदयात् ॥
॥ इति गुरुगायत्रीमन्त्रः ॥

॥ अथ करन्यासः ॥
ॐ सदाशिवगुरवे नमः अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। 
ॐ विष्णुगुरवे नमः तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ ब्रह्मगुरवे नमः मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ गुरु इन्द्राय नमः अनामिकाभ्यां नमः। 
ॐ गुरुसकलदेवरूपिणे नमः कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ गुरुपञ्चतत्त्वात्मने नमः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।

॥ अथ हृदयादिन्यासः ॥
ॐ सदाशिवगुरवे नमः हृदयाय नमः ।
ॐ विष्णुगुरवे नमः शिरसे स्वाहा ।
ॐ ब्रह्मगुरवे नमः शिखायै वषट् ।
ॐ गुरु इन्द्राय नमः नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ॐ गुरुसकलदेवरूपिणे नमः कवचाय हुम् ।
ॐ गुरुपञ्चतत्त्वात्मने नमः अस्त्राय फट्। 

॥ अथ ध्यानम् ॥
हंसाभ्यां परिवृत्तपत्रकमलैर्दिव्यैर्जगत्कारणै-
र्विश्वोत्कीर्णमनेकदेहनिलयं स्वच्छन्दमात्मेच्छया ।
तत्तद्योग्यतया स्वदेशिकतनुं भावैकदीपाङ्कुरम् ।
प्रत्यक्षाक्षरविग्रहं गुरुपदं ध्यायेद्द्विबाहुं गुरुम् ॥ १७॥

विश्वं व्यापितमादिदेवममलं नित्यं परन्निष्कलम्
नित्योत्फुल्लसहस्रपत्रकमलैर्नित्याक्षरैर्मण्डपैः ।
नित्यानन्दमनन्तपूर्णमखिलन्तद्ब्रह्म नित्यं स्मरे-
दात्मानं स्वमनुप्रविश्य कुहरे स्वच्छन्दतः सर्वगम् ॥ १८॥
॥ इति ध्यानम् ॥

॥ अथ मन्त्रः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं श्रीं गुरवे नमः ॥
॥ इति मन्त्रः ॥

त्वं हि मामनुसन्धेहि सहस्रशिरसम्प्रभुम्।
तदा मुखेषु मे न्यस्तं सहस्रं लक्ष्यते स्तदा ॥ १९॥
इदं विश्वहितार्थाय रसनारङ्गगोचरम् ।
प्रकाशयित्वा मेदिन्यां परमागमसम्मताम् ॥ २०॥
इदं शठाय मूर्खाय नास्तिकाय प्रकीर्तने।
असूयोपहतायापि न प्रकाश्यं कदाचन ॥ २१॥
विवेकिने विशुद्धाय वेदमार्गानुसारिणे ।
आस्तिकायात्मनिष्ठाय स्वात्मन्यविकृताय च ॥ २२॥
गुरुनामसहस्रं ते कृतधीरुदिते जये ।
भक्तिगम्यस्त्रयीमूर्तिर्भासक्तो वसुधाधिपः ॥ २३॥
देवदेवो दयासिन्धुर्देवदेवशिखामणिः ।
सुखाभावः सुखाचारः शिवदो मुदिताशयः ॥ २४॥
अविक्रियः क्रियामूर्तिरध्यात्मा च स्वरूपवान् ।
सृष्ट्यामलक्ष्यो भूतात्मा धर्मी यात्रार्थचेष्टितः ॥ २५॥
अन्तर्यामी कालरूपः कालावयविरूपिणः ।
निर्गुणश्च कृतानन्दो योगी निद्रानियोजकः ॥ २६॥
महागुणान्तर्निक्षिप्तः पुण्यार्णवपुरात्मवान् ।
निरवद्यः कृपामूर्तिर्न्यायवाक्यनियामकः ॥ २७॥
अदृष्टचेष्टः कूटस्थो धृतलौकिकविग्रहः ।
महर्षिमानसोल्लासो महामङ्गलदायकः ॥ २८॥
सन्तोषितः सुरव्रातः साधुचित्तप्रसादकः ।
शिवलोकाय निर्देष्टा जनार्दनश्च वत्सलः ॥ २९॥
स्वशक्त्युद्धाटिताशेषकपाटः पितृवाहनः ।
शेषोरगफणञ्छत्रः शोषोक्त्यास्यसहस्रकः ॥ ३०॥
कृतात्मविद्याविन्यासो योगमायाग्रसम्भवः ।
अञ्जनस्निग्धनयनः पर्यायाङ्कुरितस्मितः ॥ ३१॥
लीलाक्षस्तरलालोकस्त्रिपुरासुरभञ्जनः ।
द्विजोदितस्वस्त्ययनो मन्त्रपूतो जलाप्लुतः ॥ ३२॥
प्रशस्तनामकरणो जातुचङ्क्रमणोत्सुकः ।
व्यालविचूलिकारत्नघोषो घोषप्रहर्षणः ॥ ३३॥
सन्मुखः प्रतिबिम्बार्थी ग्रीवाव्याघ्रनखोज्ज्वलः ।
पङ्कानुलेपरुचिरो मांसलोरुकटीतलः ॥ ३४॥
दृष्टजानुकरद्वन्द्वः प्रतिबिम्बानुकारकृत् ।
अव्यक्तवर्णव्यावृत्तिः स्मितलक्ष्यरदोद्गमः ॥ ३५॥
धात्रीकरसमालम्बी प्रस्खलच्चित्रचङ्क्रमः ।  ??
क्षेमणी क्षेमणाप्रीतो वेणुवाद्यविशारदः ॥ ३६॥
नियुद्धलीलासंहृष्टः कण्ठानुकृतकोकिलः ।
उपात्तहंसगमनः सर्वसत्त्वरुतानुकृत् ॥ ३७॥
मनोज्ञः पल्लवोत्तंसः पुष्पस्वेच्छात्मकुण्डलः ।
मञ्जुसञ्जितमञ्जीरपादः काञ्चनकङ्कणः ॥ ३८॥
अन्योन्यस्पर्शनक्रीडापटुः परमकेतनः ।
प्रतिध्वानप्रमुदितः शाखाचतुरचङ्क्रमः ॥ ३९॥
ब्रह्मत्राणकरो धातृस्तुतः सर्वार्थसाधकः ।
ब्रह्मब्रह्ममयोऽव्यक्तः तेजास्तव्यः सुखात्मकः ॥ ४०॥
निरुक्तो व्याकृतो व्यक्तिर्निरालम्बविभावनः ।
प्रभविष्णुरतन्द्रीको देववृक्षादिरूपधृक् ॥ ४१॥
आकाशः सर्वदेवादिरणीयस्थूलरूपवान् ।       ??
व्याप्याव्याप्यकृताकर्ता विचाराचारसम्मतः ॥ ४२॥
छन्दोमयः प्रधानात्मा मूर्तो मूर्त्तद्वयाकृतिः ।
अनेकमूर्तिरक्रोधः परात्परपराक्रमः ॥ ४३॥
सकलावरणातीतः सर्वदेवमहेश्वरः ।
अनन्यविभवः सत्यरूपः स्वर्गेश्वरार्चितः ॥ ४४॥ ?
महाप्रभावज्ञानज्ञः पूर्वगः सकलात्मजः ।
स्मितेक्षाहर्षितो ब्रह्मा भक्तवत्सलवाक्प्रियः ॥ ४५॥
ब्रह्मानन्दोदधौताङ्घ्रिः लीलावैचित्र्यकोविदः ।
विलाससकलस्मेरो गर्वलीलाविलोकनः ॥ ४६॥
अभिव्यक्तदयात्मा च सहजार्धस्तुतो मुनिः ।
सर्वेश्वरः सर्वगुणः प्रसिद्धः सात्वतर्षभः ॥ ४७॥
अकुण्ठधामा चन्द्रार्कहृष्टराकाशनिर्मलः ।
अभयो विश्वतश्चक्षुस्तथोत्तमगुणप्रभुः ॥ ४८॥
अहमात्मा मरुत्प्राणः परमात्माऽऽद्यशीर्षवान् ।
दावाग्निभीतस्य गुरोर्गोप्ता दावानिग्ननाशनः ॥ ४९॥ ??
मुञ्जाटव्यग्निशमनः प्रावृट्कालविनोदवान् । ?
शिलान्यस्तान्नभुग्जातसौहित्यश्चाङ्गुलाशनः ॥ ५०॥ ??
गीतास्फीतसरित्पूरो नादनर्तितबर्हिणः ।
रागपल्लवितस्थाणुर्गीतानमितपादपः ॥ ५१॥
विस्मारिततृणस्याग्रग्रासीमृगविलोभनः । ??
व्याघ्रादिहिंस्ररजन्तुवैरहर्ता सुगायनः ॥ ५२॥ ??
निष्यन्दध्यानब्रह्मादिवीक्षितो विश्ववन्दितः ।
शाखोत्कीर्णशकुन्तौघछत्रास्थितबलाहकः ॥ ५३॥
अस्पन्दः परमानन्दचित्रायितचराचरः ।
मुनिज्ञानप्रदो यज्ञस्तुतो वासिष्ठयोगकृत् ॥ ५४॥ ?
शत्रुप्रोक्तक्रियारूपः शत्रुयज्ञनिवारणः ।
हिरण्यगर्भहृदयो मोहवृत्तिनिवर्तकः ॥ ५५॥ ?
आत्मज्ञाननिधिर्मेधा कीशस्तन्मात्ररूपवान् ।  ?? (kesha
 ?? kIsha = monkey, tanmAtrarUpavAn kIshaH – monkey having assumed a very
small size as Hanuman in Lanka while searching for Seeta – wild imagination?)

इन्द्राग्निवदनः कालनाभः सर्वागमस्तुतः ॥ ५६॥
तुरीयः सत्त्वधीः साक्षी द्वन्द्वारामात्मदूरगः ।
अज्ञातपारो विश्वेशः अव्याकृतविहारवान् ॥ ५७॥
आत्मप्रदीपो विज्ञानमात्रात्मा श्रीनिकेतनः ।
पृथ्वी स्वतःप्रकाशात्मा हृद्यो यज्ञफलप्रदः ॥ ५८॥
गुणग्राही गुणद्रष्टा गूढस्वात्मानुभूतिमान् ।
कविर्जगद्रूपद्रष्टा परमाक्षरविग्रहः ॥ ५९॥
प्रपन्नपालनो मालामनुर्ब्रह्मविवर्धनः ।
वाक्यवाचकशक्त्यार्थः सर्वव्यापी सुसिद्धिदः ॥ ६०॥
स्वयम्प्रभुरनिर्विद्यः स्वप्रकाशश्चिरन्तनः ।
नादात्मा मन्त्रकोटीशो नानावादानुरोधकः ॥ ६१॥
कन्दर्पकोटिलावण्यः परार्थैकप्रयोजकः ।
अभयीकृतदेवौघः कन्यकाबन्धमोचनः ॥ ६२॥
क्रीडारत्नबलीहर्त्ता वरुणच्छत्रशोभितः ।
शक्राभिवन्दितः शक्रजननीकुण्डलप्रदः ॥ ६३॥
यशस्वी नाभिराद्यन्तरहितः सत्कथाप्रियः ।
अदितिप्रस्तुतस्तोत्रो ब्रह्माद्युत्कृष्टचेष्टितः ॥ ६४॥
पुराणः संयमी जन्म ह्यधिपः शशकोऽर्थदः ।
ब्रह्मगर्भपरानन्दः पारिजातापहारकृत् ॥ ६५॥
पौण्ड्रिकप्राणहरणः काशीराजनिषूदनः ।
कृत्यागर्वप्रशमनो विचकृत्यागर्वदर्पहा ॥ ६६॥ ???
कंसविध्वंसनः शान्तजनकोटिभयार्दनः ।
मुनिगोप्ता पितृवरप्रदः सर्वानुदीक्षितः ॥ ६७॥ ?
कैलासयात्रासुमुखो बदर्य्याश्रमभूषणः ।
घण्टाकर्णक्रियादोग्धातोषितो भक्तवत्सलः ॥ ६८॥ ?
मुनिवृन्दातिथिर्ध्येयो घण्टाकर्णवरप्रदः ।
तपश्चर्या पश्चिमाद्यो श्वासो पिङ्गजटाधरः ॥ ६९॥
प्रत्यक्षीकृतभूतेशः शिवस्तोता शिवस्तुतः ।
गुरुः स्वयं वरालोककौतुकी सर्वसम्मतः ॥ ७०॥
कलिदोषनिराकर्त्ता दशनामा दृढव्रतः ।
अमेयात्मा जगत्स्वामी वाग्मी चैद्यशिरोहरः ॥ ७१॥
गुरुश्च पुण्डरीकाक्षो विष्णुश्च मधुसूदनः ।
गुरुमाधवलोकेशो गुरुवामनरूपधृक् ॥ ७२॥
विहितोत्तमसत्कारो वासवाप्तरिपु इष्टदः । ? वासवात्परितुष्टितः
उत्तङ्कहर्षदात्मा यो दिव्यरूपप्रदर्शकः ॥ ७३॥
जनकावगतस्तोत्रो भारतः सर्वभावनः ।
असोढ्ययादवोद्रेको विहितात्परिपूजितः ॥ ७४॥ ??
(soDhya – unable to bear; yAdavodrekaH – excessive predominance of Yadavas)
समुद्रक्षपिताश्चर्यमुसलो वृष्णिपुङ्गवः ।
मुनिशार्दूलपद्माङ्कः सनादित्रिदशार्दितः ॥ ७५॥ ??
गुरुप्रत्यवहारोक्तः स्वधामगमनोत्सुकः ।
प्रभासालोकनोद्युक्तो नानाविधनिमित्तकृत् ॥ ७६॥
सर्वयादवसंसेव्यः सर्वोत्कृष्टपरिच्छदः ।
वेलाकाननसञ्चारी वेलानीलहतश्रमः ॥ ७७॥
कालात्मा यादवानन्तस्तुतिसन्तुष्टमानसः ।
द्विजालोकनसन्तुष्टः पुण्यतीर्थमहोत्सवः ॥ ७८॥ ??
सत्काराह्लादिताशेषभूसुरो भूसुरप्रियः ।
पुण्यतीर्थप्लुतः पुण्यः पुण्यदस्तीर्थपावनः ॥ ७९॥
विप्रसात्स्वकृतः कोटिशतकोटिसुवर्णदः ।
स्वमायामोहिताशेषरुद्रवीरो विशेषजित् ॥ ८०॥
ब्रह्मण्यदेवः श्रुतिमान् गोब्राह्मणहिताय च ।
वरशीलः शिवारम्भः स्वसंविज्ञातमूर्त्तिमान् ॥ ८१॥
स्वभावभद्रः सन्मित्रः सुशरण्यः सुलक्षणः ।
सामगानप्रियो धर्मो धेनुवर्मतमोऽव्ययः ॥ ८२॥ ??
चतुर्युगक्रियाकर्त्ता विश्वरूपप्रदर्शकः ।
अकालसन्ध्याघटनः चक्राङ्कितश्च भास्करः ॥ ८३॥
दुष्टप्रमथनः पार्थप्रतिज्ञाप्रतिपालकः ।
महाधनो महावीरो वनमालाविभूषणः ॥ ८४॥
सुरः सूर्यो मृकण्डश्च भास्करो विश्वपूजितः ।
रविस्तमोहा वह्निश्च वाडवो वडवानलः ॥ ८५॥
दैत्यदर्पविनाशी च गरुडो गरुडाग्रजः ।
प्रपञ्ची पञ्चरूपश्च लतागुल्मश्च गोपतिः ॥ ८६॥
गङ्गा च यमुनारूपी गोदा वेत्रावती तथा ।
कावेरी नर्मदा तापी गण्डकी सरयू रजः ॥ ८७॥
राजसस्तामसः सात्त्वी सर्वाङ्गी सर्वलोचनः ।
मुदामयोऽमृतमयो योगिनीवल्लभः शिवः ॥ ८८॥
बुद्धो बुद्धिमतां श्रेष्ठो विष्णुर्जिष्णुः शचीपतिः ।
सृष्टिचक्रधरो लोको विलोको मोहनाशनः ॥ ८९॥
रवो रावो रवो रावो बलो बालबलाहकः ।
शिवरुद्रो नलो नीलो लाङ्गली लाङ्गलाश्रयः ॥ ९०॥
पारकः पारकी सार्वी वटपिप्पलकाकृतीः । ??
म्लेच्छहा कालहर्ता च यशो ज्ञानं च एव च ॥ ९१॥
अच्युतः केशवो विष्णुर्हरिः सत्यो जनार्दनः ।
हंसो नारायणो लीलो नीलो भक्तपरायणः ॥ ९२॥
मायावी वल्लभगुरुर्विरामो विषनाशनः ।
सहस्रभानुर्महाभानुर्वीरभानुर्महोदधिः ॥ ९३॥
समुद्रोऽब्धिरकूपारः पारावारसरित्पतिः ।
गोकुलानन्दकारी च प्रतिज्ञाप्रतिपालकः ॥ ९४॥
सदारामः कृपारामो महारामो धनुर्धरः ।
पर्वतः पर्वताकारो गयो गेयो द्विजप्रियः ॥ ९५॥
कमलाश्वतरो रामो, भव्यो यज्ञप्रवर्त्तकः ।
द्यौर्दिवौ दिवओ दिव्यौ भावी भावभयापहा ॥ ९६॥
पार्वतीभावसहितो भर्त्ता लक्ष्मीविलासवान् ।
विलासी सहसी सर्वो गुर्वी गर्वितलोचनः ॥ ९७॥
मायाचारी सुधर्मज्ञो जीवनो जीवनान्तकः ।
यमो यमारिर्यमनो यामी यामविधायकः ॥ ९८॥
ललिता चन्द्रिकामाली माली मालाम्बुजाश्रयः ।
अम्बुजाक्षो महायक्षो दक्षश्चिन्तामणिः प्रभुः ॥ ९९॥
मेरोश्चैव च केदारबदर्य्याश्रममागतः ।
बदरीवनसन्तप्तो व्यासः सत्यवती सुतः ॥ १००॥
भ्रमरारिनिहन्ता च सुधासिन्धुविधूदयः ।
चन्द्रो रविः शिवः शूली चक्री चैव गदाधरः ॥ १०१॥
सहस्रनाम च गुरोः पठितव्यं समाहितैः ।
स्मरणात्पापराशीनां खण्डनं मृत्युनाशनम् ॥ १०२॥
गुरुभक्तप्रियकरं महादारिद्र्यनाशनम् ।
ब्रह्महत्या सुरापानं परस्त्रीगमनं तथा ॥ १०३॥
परद्रव्यापहरणं परदोषसमन्वितम् ।
मानसं वाचिकं कायं यत्पापं पापसम्भवम् ॥ १०४॥
सहस्रनामपठनात्सर्वं नश्यति तत्क्षणात् ।
महादारिद्र्ययुक्तो यो गुरुर्वा गुरुभक्तिमान् ॥ १०५॥
कार्तिक्यां यः पठेद्रात्रौ शतमष्टोत्तरं पठेत् ।
सुवर्णाम्बरधारी च सुगन्धपुष्पचन्दनैः ॥ १०६॥
पुस्तकं पूजयित्वा च नैवेद्यादिभिरेव च ।
महामायाङ्कितो धीरो पद्ममालाविभूषणः ॥ १०७॥
प्रातरष्टोत्तरं देवि पठन्नाम सहस्रकम् ।
चैत्रशुक्ले च कृष्णे च कुहुसङ्क्रान्तिवासरे ॥ १०८॥
पठितव्यं प्रयत्नेन त्रैलोक्यं मोहयेत्क्षणात् ।
मुक्तानाम्मालया युक्तो गुरुभक्त्या समन्वितः ॥ १०९॥
रविवारे च शुक्रे च द्वादश्यां श्राद्धवासरे ।
ब्राह्मणान्भोजयित्वा च पूजयित्वा विधानतः ॥ ११०॥
पठन्नामसहस्रं च ततः सिद्धिः प्रजायते ।
महानिशायां सततं गुरौ वा यः पठेत्सदा ॥ १११॥
देशान्तरगता लक्ष्मीः समायाति न संशयः ।
त्रैलोक्ये च महालक्ष्मीं सुन्दर्यः काममोहिताः ॥ ११२॥
मुग्धाः स्वयं समायान्ति गौरवाच्च भजन्ति ताः ।
रोगार्त्तो मुच्यते रोगात्बद्धो मुच्येत बन्धनात् ॥ ११३॥
गुर्विणी विन्दते पुत्रं कन्या विन्दति सत्पतिम् ।
राजानो वशतां यान्ति किम्पुनः क्षुद्रमानुषाः ॥ ११४॥
सहस्रनामश्रवणात्पठनात्पूजनात्प्रिये ।
धारणात्सर्वमाप्नोति गुरवो नात्र संशयः ॥ ११५॥
यः पठेद्गुरुभक्तः सन् स याति परमं पदम् ।
कृष्णेनोक्तं समासाद्य मया प्रोक्तं पुरा शिवम् ॥ ११६॥
नारदाय मया प्रोक्तं नारदेन प्रकाशितम् ।
मया त्वयि वरारोहे! प्रोक्तमेतत्सुदुर्लभम् ॥ ११७॥
शठाय पापिने चैव लम्पटाय विशेषतः ।
न दातव्यं न दातव्यं न दातव्यं कदाचन ॥ ११८॥
देयं दान्ताय शिष्याय गुरुभक्तिरताय च ।
गोदानं ब्रह्मयज्ञश्च वाजपेयशतानि च ॥ ११९॥
अश्वमेधसहस्रस्य पठतश्च फलं लभेत् ।
मोहनं स्तम्भनं चैव मारणोच्चाटनादिकम् ॥ १२०॥
यद्यद्वाञ्छति चित्ते तु प्राप्नोति गुरुभक्तितः ।
एकादश्यां नरः स्नात्वा सुगन्धद्रव्यसंयुतः ॥ १२१॥
आहारं ब्राह्मणे दत्त्वा दक्षिणां स्वर्णभूषणम् ।
आरम्भकर्त्तासौ सर्वं सर्वमाप्नोति मानवः ॥ १२२॥
शतावर्त्तं सहस्रञ्च यः पठेद्गुरवे जनाः ।
गुरुसहस्रनामस्य प्रसादात्सर्वमाप्नुयात् ॥ १२३॥
यद्गेहे पुस्तकं देवि पूजितं चैव तिष्ठति ॥
न मारी न च दुर्भिक्षं नोपसर्गं भयं क्वचित् ॥ १२४॥
सर्पादिभूतयक्षाद्या नश्यन्ते नात्र संशयः ।
श्रीगुरुर्वा महादेवि! वसेत्तस्य गृहे तथा ॥ १२५॥
यत्र गेहे सहस्रं च नाम्नां तिष्ठति पूजितम् ।
श्रीगुरोः कृपया शिष्यो ब्रह्मसायुज्यमाप्नुयात् ॥ १२६॥

॥ इति श्रीहरिकृष्णविनिर्मिते बृहज्ज्योतिषार्णवेऽष्टमे धर्मस्कन्धे सम्मोहन तन्त्रोक्त श्रीगुरु सहस्रनाम स्तोत्रम् ॥
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त्रिपिण्डी पूजन #पितृ शांति

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