Friday, 19 May 2023

#शनि #जयंती पर विशेष #उपाय

🌼🌷 #शनि #जयंती 🌷🌼
🙏🏻 शास्त्रों के अनुसार शनि देवजी का जन्म ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की #अमावस्या को रात के समय हुआ था।
🪔 इस बार शनि जयंती 19 मई 2023 शुक्रवार को पड़ रही है।
🌞 सुबह जल्दी स्नान आदि से निवृत्त होकर सबसे पहले अपने इष्टदेव, #गुरु और माता-पिता का आशीर्वाद लें।
🪔🪔पूजा क्रम शुरू करते हुए सबसे पहले शनिदेव के इष्ट भगवान शिव का 'ॐ नम: शिवाय' बोलते हुए गंगाजल, कच्चा दूध तथा काले तिल से अभिषेक करें। 
🪔अगर घर में #पारद #शिवलिंग है तो उनका अभिषेक करें अन्यथा शिव मंदिर जाकर #अभिषेक करें। भांग, धतूरा एवं हो सके तो 108 #आंकडे़ (#मदार) के #फूल जरूर चढ़ाएं। 

🪔#द्वादश #ज्योतिर्लिंग के नाम को उच्चारण करें-
🙏🏻 सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्‌।
🙏उज्जयिन्यां महाकालमोंकारं ममलेश्वरम्‌ ॥1॥🙏
🙏परल्यां वैजनाथं च डाकियन्यां भीमशंकरम्‌।
🙏सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने ॥2॥🙏
🙏वारणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमी तटे।
🙏हिमालये तु केदारं ध्रुष्णेशं च शिवालये ॥3॥🙏
🙏एतानि ज्योतिर्लिंगानि सायं प्रातः पठेन्नरः।
🙏सप्तजन्मकृतं पापं स्मरेण विनश्यति ॥4॥🙏

🪔अब #शनिदेव की पूजा शुरू करते हुए सर्वप्रथम शनिदेव का सरसों के तेल से अभिषेक करें।
🌷 “ॐशं शनैश्चराय नम:” का निरंतर जप करते रहें ।
🔥 सरसों के तेल का दीपक प्रज्वलित करें तथा कस्तूरी अथवा चन्दन की धूप अर्पित करें ।

🌷 शनि के #वैदिक #मंत्र का उच्चारण करें-
नीलांजन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्
छायामार्तण्ड संभूतम् तम नमामि शनैश्चरम्॥

🌷 अब #शनि #स्त्रोत्र का #पाठ करें🌷
नमस्ते कोण संस्थाय पिंगलाय नमोऽस्तुते।
नमस्ते बभ्रुरुपाय कृष्णाय नमोऽस्तुते॥
नमस्ते रौद्रदेहाय नमस्ते चांतकायच।
नमस्ते यमसंज्ञाय नमस्ते सौरये विभो॥
नमस्ते मंदसंज्ञाय शनैश्चर नमोऽस्तुते।
प्रसादं कुरू देवेश दीनस्य प्रणतस्य च॥

🔥 शाम को #पीपल के वृक्ष के नीचे #तिल के #तेल के #दीपक को प्रज्जवलित करें। 
🙏शनिदेव से प्रार्थना करें कि सभी #समस्याएं दूर हों और बुरे समय से पीछा छूट जाए। 
🙏इसके बाद पीपल की #सात #परिक्रमा करें।
🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔
- नारायण आध्यात्मिक ऊर्जा 🙏

Tuesday, 16 May 2023

Shri Sankata Chalisa | #संकटा #योगिनी #Vikat #Matrika | #संकठा सौभाग्यवर्द्धनी #मां #काशी

यूट्यूब के नारायण आध्यात्मिक ऊर्जा चैनल पर यह वीडियो उपलब्ध है-

Friday, 14 April 2023

केतु कवचम् - स्तोत्रम्


केतु कवचम्
केतु करालवदनं चित्रवर्ण किरीटिनम् । 
प्रणमामि सदा केतुं ध्वजाकारं ग्रहेश्वरम् ॥ 
चित्रवर्ण: शिरः पातु भालं धूम्रसमद्युतिः । 
पातु नेत्रे पिंगलाक्षः श्रुति मे रक्तलोचनः ॥ 
घ्राणं पातु सुवर्णाभश्चिबुकं सिंहिकासुतः ।
पातु कंठं च मे केतु स्कंधौ पातु ग्रहाधिपः ॥
हस्तौ पातु सुरश्रेष्ठः कुक्षिं पातु महाग्रहः । 
सिंहासनः कटिं पातु मध्यं पातु महासुरः ॥ 
उरू पातु महाशीर्षो जानुनी मेऽतिकोपनः । 
पातु पादौ च मे क्रूरः सर्वाङ्ग नरपिंगलः ॥ 
यो इदं कवचं दिव्यं सर्वरोगविनाशनम् । 
सर्वशत्रुविनाशं च धारणाद्विजयी भवेत् ॥


केतु स्तोत्रम्
केतुः कालः कलयिता धूम्रकेतुविवर्णकः । 
लोककेतु महाकेतुः सर्वकेतुर्भयप्रदः ॥ 
रौद्रो रुद्रपियो रुद्रः क्रूरकर्मा सुगन्धधृक् । 
पलाश - धूम-संकाशश्चित्र-यज्ञोपवीतधृकः ॥
तारागणविमर्दी च जैमिनेयो ग्रहाधिपः । 
पंचविंशति नामानि केतोर्यः सततं पठेत् ॥ 
तस्य नश्यन्ति बाधाश्च सर्वाः केतुप्रसादतः । 
धनधान्यपशूनां च भवेद्वृद्धिर्न संशयः ॥


यूट्यूब वीडियो लिंक -
https://youtube.com/@NarayanAU_Kanak

Monday, 10 April 2023

भद्रकाली षोडशोपचार पूजनविधि।।

#भद्रकाली षोडशोपचार पूजनविधि।।  
   ध्यान:-
महामेघ प्रभां देवी कृष्णवस्त्रोसि धारिणीम् ।
ललज्जिह्वां घोरदंष्ट्रां कोटराक्षीं हसन्मुखीम् ॥

नागहारलतोपेतां चन्द्रार्द्धकृत शेखराम् ।
द्यां लिखन्तीं जटामेकां लेलिहानासवं पिबम् ॥

नाग यज्ञोपवीताङ्गी नागशय्या निषेदुषीम्।
पञ्चाशन्मुण्डसंयुक्तं वनमाला महोदरीम्॥

सहस्त्रफण संयुक्तमनन्तं शिरसोपरि ।
चतुर्दिक्षु नागफणा वेष्टितां भद्रकालिकाम् ॥

तक्षक सर्पराजेन वामकङ्कण भूषिताम्।
अनन्त नागराजेन कृतदक्षिण कङ्कणम्॥

नागेन रसनाहार कक्पितां रत्न नूपुराम् ।
वामे शिव स्वरूपं तत्कल्पितं वत्स्‌रूपकम् ॥

द्विभुजां चिन्तयेद्देत्नीं नागयज्ञोपवीतिनीम् ।
नरदेह समाबद्ध कुण्डल श्रुति मण्डिताम्॥

प्रसन्नवदनां सौम्यां शिवमोहिनीम् ॥
अट्टहासां महाभीमां साधकाभीष्टदायिनीम् ॥

पुष्प समर्पण 
ॐ देवेशि भक्ति सुलभे परिवार समन्विते। 
यावत्तवां पूजयिष्यामि तावद्देवी स्थिरा भव।। 

नमस्कार
शत्रुनाशकरे देवि ! सर्व सम्पत्करे शुभे
सर्व देवस्तुते ! भद्रकालिके ! त्वां नमाम्यहम।। 

१. आसन👉 प्रथम दिन कि पूजा में माँ को काले रंग के कपडे का / आम कि लकड़ी का सिंहासन जो काले रंग से रंगा गया हो समर्पित करें एवं माँ को उस पर विराजित करने इसके बाद फिर प्रत्येक दिन माँ के चरणों में निम्न मंत्र को बोलते हुए पुष्प / अक्षत समर्पित करें

ॐ आसनं भास्वरं तुङ्गं मांगल्यं सर्वमंगले। 
भजस्व जगतां मातः प्रसीद जगदीश्वरी।।

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा आसनं समर्पयामि )

२. पाद्य👉 इस क्रिया में शीतल एवं सुवासित जल से चरण धोएं और ऐसा सोचें कि आपके आवाहन पर माँ दूर से आयी हैं और पाद्य समर्पण से माँ को रास्ते में जो श्रम हुआ लगा है उसे आप दूर कर रहे हैं

ॐ गंगादि सलिलाधारं तीर्थं मंत्राभिमंत्रिम। 
दूर यात्रा भ्रम हरं पाद्यं तत्प्रति गृह्यतां।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा पाद्यं समर्पयामि )

३. उद्वर्तन👉  इस क्रिया में माँ के चरणों में सुगन्धित / तिल के तेल को समर्पित करते हैं

ॐ तिल तण्डुल संयुक्तं कुश पुष्प समन्वितं। 
सुगंधम फल संयुक्तंमर्ध्य देवी गृहाण में।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा उद्वर्तन तैलं समर्पयामि )

४. आचमन👉  इस क्रिया में माँ को आचमनी से या लोटे से आचमन जल प्रदान करते हैं ( याद रहे कि जल समर्पित करने का क्रम आप मूर्ति और यदि जल कि निकासी कि सुगम व्यवस्था है तो कर सकते हैं किन्तु यदि आपने कागज के चित्र को स्थापित किया हुआ है तो चित्र के सम्मुख एक पात्र रख लें और जल से सम्बंधित सारी क्रियाएँ करके जल उसी पात्र में डालते जाएँ )

ॐ स्नानादिक विधायापि यतः शुद्धिख़ाप्यते। 
इदं आचमनीयं हि कालिके देवी प्रगृह्यताम्।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा आचमनीयम् समर्पयामि )

५. स्नान👉  इस क्रिया में सुगन्धित पदार्थों से निर्मित जल से स्नान करवाएं ( जल में इत्र , कर्पूर , तिल , कुश एवं अन्य वस्तुएं अपनी सामर्थ्य या सुविधानुसार मिश्रित कर लें यदि सामर्थ्य नहीं है तो सदा जल भी पर्याप्त है जो पूर्ण श्रद्धा से समर्पित किया गया हो )

ॐ खमापः पृथिवी चैव ज्योतिषं वायुरेव च। 
लोक संस्मृति मात्रेण वारिणा स्नापयाम्यहम्।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा स्नानं निवेदयामि )

६. मधुपर्क👉 इस क्रिया में ( पंचगव्य मिश्रित करें प्रथम दिन ( गाय का शुद्ध दूध , दही , घी , चीनी , शहद ) अन्य दिनों में यदि व्यवस्था कर सकें तो बेहतर है अन्यथा सिर्फ शहद से काम लिया जा सकता है

ॐ मधुपर्क महादेवि ब्रह्मध्धे कल्पितं तव। 
मया निवेदितम् भक्तया गृहाण गिरिपुत्रिके।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा मधुपर्कं समर्पयामि )

विशेष👉  ध्यान रखें चन्दन या सिन्दूर में से कोई भी चीज मस्तक पर समर्पित न करें बल्कि माँ के चरणों में समर्पित करें

७. चन्दन👉 इस क्रिया में सफ़ेद चन्दन समर्पित करें

ॐ मळयांचल सम्भूतं नाना गंध समन्वितं। 
शीतलं बहुलामोदम चन्दम गृह्यतामिदं।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा चन्दनं समर्पयामि )

८. रक्त चन्दन👉  इस क्रिया में माँ को रक्त / लाल चन्दन समर्पित करें

ॐ रुक्तानुलेपनम् देवि स्वयं देव्या प्रकाशितं। 
तद गृहाण महाभागे शुभं देहि नमोस्तुते।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा रक्त चन्दनं समर्पयामि )

९. सिन्दूर👉  इस क्रिया में माँ को सिन्दूर समर्पित करें

ॐ सिन्दूरं सर्वसाध्वीनाम भूषणाय विनिर्मितम्। 
गृहाण वर दे देवि भूषणानि प्रयच्छ में।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा सिन्दूरं समर्पयामि )

१०. कुंकुम👉 इस क्रिया में माँ को कुंकुम समर्पित करें

ॐ जपापुष्प प्रभम रम्यं नारी भाल विभूषणम्। 
भाष्वरम कुंकुमं रक्तं देवि दत्तं प्रगृह्य में।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा कुंकुमं समर्पयामि )

११. अक्षत👉  अक्षत में चावल प्रयोग करने होते हैं जो काले रंग में रंगे हुए हों

ॐ अक्षतं धान्यजम देवि ब्रह्मणा निर्मितं पुरा। 
प्राणंद सर्वभूतानां गृहाण वर दे शुभे।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा अक्षतं समर्पयामि )

१२. पुष्प👉  माता के चरणो में पुष्प समर्पित करें ( फूलों एवं फूलमालाओं का चुनाव करते समय ध्यान रखें कि यदि आपको काला गुलाब मिल जाये तो बहुत बढ़िया यदि नहीं मिलता तो लाल गुलाब उपयुक्त होगा किन्तु यदि स्थानीय या बाजारीय उपलब्धता के हिसाब से जो उपलब्ध हो वही प्रयोग करें )

ॐ चलतपरिमलामोदमत्ताली गण संकुलम्। 
आनंदनंदनोद्भूतम् कालिकायै कुसुमं नमः।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा पुष्पं समर्पयामि )

१३. विल्वपत्र👉  माता के चरणों में बिल्वपत्र समर्पित करें ( कहीं कहीं पर उल्लेख मिलता कि देवी पूजा में बिल्वपत्र का प्रयोग नहीं किया जाता है तो इस स्थिति में आप अपने लोक/ स्थानीय प्रचलन का प्रयोग करें )

ॐ अमृतोद्भवम् श्रीवृक्षं शंकरस्व सदाप्रियम। 
पवित्रं ते प्रयच्छामि सर्व कार्यार्थ सिद्धये। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा बिल्वपत्रं समर्पयामि )

१४. माला👉  इस क्रिया में माँ को फूलों कि माला समर्पित करें

ॐ नाना पुष्प विचित्राढ़यां पुष्प मालां सुशोभताम्। 
प्रयच्छामि सदा भद्रे गृहाण परमेश्वरि।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा पुष्पमालां समर्पयामि )

१५. वस्त्र👉  इस क्रिया में माता को वस्त्र समर्पित किये जाते हैं ( एक बात ध्यान में रखनी चाहिए कि वस्त्रों कि लम्बाई १२ अंगुल से कम न हो - प्रथम दिन कि पूजा में काले वस्त्र समर्पित किये जाने चाहिए तत्पश्चात [ मौली धागा जिसे प्रायः पुरोहित रक्षा सूत्र के रूप में यजमान के हाथ में बांधते हैं वह चढ़ाया जा सकता है लेकिन लम्बाई १२ अंगुल ही होगी )

अ. ॐ तंतु संतान संयुक्तं कला कौशल कल्पितं। 
सर्वांगाभरण श्रेष्ठं वसनं परिधीयताम्।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा प्रथम वस्त्रं समर्पयामि )

ब. ॐ यामाश्रित्य महादेवि जगत्संहारकः सदा। 
तस्यै ते परमेशान्यै कल्पयाम्युत्रीयकम। । 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा द्वितीय वस्त्रं समर्पयामि )

१५. धूप👉  इस क्रिया में सुगन्धित धुप समर्पित करनी है

ॐ गुग्गुलम घृत संयुक्तं नाना भक्ष्यैश्च संयुतम। 
दशांग ग्रसताम धूपम् कालिके देवि नमोस्तुते।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा धूपं समर्पयामि )

१६. दीप👉 इस क्रिया में शुद्ध घी से निर्मित दीपक समर्पित करना है जो कपास कि रुई से बनी बत्तियों से निर्मित हो

ॐ मार्तण्ड मंडळांतस्थ चन्द्र बिंबाग्नि तेजसाम्। 
निधानं देवि कालिके दीपोअयं निर्मितस्तव भक्तितः।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा दीपं दर्शयामि )

१७. इत्र👉  इस क्रिया में माता को इत्र / सुगन्धित सेंट समर्पित करना है

ॐ परमानन्द सौरभ्यम् परिपूर्णं दिगम्बरम्। 
गृहाण सौरभम् दिव्यं कृपया जगदम्बिके।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा सुगन्धित द्रव्यं समर्पयामि )

१८. कर्पूर दीप👉  इस क्रिया में माँ को कर्पूर का दीपक जलाकर समर्पित करना है

ॐ त्वम् चन्द्र सूर्य ज्योतिषं विद्युद्गन्योस्तथैव च। 
त्वमेव जगतां ज्योतिदीपोअयं प्रतिगृह्यताम्।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा कर्पूर दीपम दर्शयामि )

१९. नैवेद्य👉  इस क्रिया में माता को फल - फूल या भोजन समर्पित करते हैं भोजन कम से कम इतनी मात्रा में हो जो एक आदमी के खाने के लिए पर्याप्त हो बाकि सारा कुछ सामर्थ्यानुसार )

ॐ दिव्यांन्नरस संयुक्तं नानाभक्षैश्च संयुतम। 
चौष्यपेय समायुक्तमन्नं देवि गृहाण में।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा नैवेद्यं समर्पयामि )

२०. खीर👉  इस क्रिया में ढूध से निर्मित खीर चढ़ाएं

ॐ गव्यसर्पि पयोयुक्तम नाना मधुर मिश्रितम्। 
निवेदितम् मया भक्त्या परमान्नं प्रगृह्यताम्।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा दुग्ध खीरम समर्पयामि )

२१. मोदक👉  इस क्रिया में माँ को लड्डू समर्पित करने हैं

ॐ मोदकं स्वादु रुचिरं करपुरादिभिरणवितं। 
मिश्र नानाविधैर्द्रुव्यै प्रति ग्रह्यशु भुज्यतां।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा मोदकं समर्पयामि )

२२. फल👉  इस क्रिया में माता को ऋतु फल समर्पित करने होते हैं

ॐ फलमूलानि सर्वाणि ग्राम्यां अरण्यानि यानि च। 
नानाविधि सुंगंधीनि गृहाण देवि ममाचिरम।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा ऋतुफलं समर्पयामि )

२३. जल👉  इस क्रिया में खान - पान के पश्चात् अब माता को जल समर्पित करें

ॐ पानीयं शीतलं स्वच्छं कर्पूरादि सुवासितम्। 
भोजने तृप्ति कृद्य् स्मात कृपया प्रतिगृह्यतां।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा जलम समर्पयामि )

२४. करोद्वर्तन जल👉  इस क्रिया में माता को हाथ धोने के लिए जल प्रदान करें

ॐ कर्पूरादीनिद्रव्याणि सुगन्धीनि महेश्वरि। 
गृहाण जगतां नाथे करोद्वर्तन हेतवे। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा करोद्वर्तन जलम समर्पयामि )

२५. आचमन👉 इस क्रिया में माता को पुनः आचमन करवाएं

ॐ अमोदवस्तु सुरभिकृतमेत्तदनुत्तमम्। 
गृह्णाचमनीयम तवं माया भक्त्या निवेदितम्।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा पुनराचमनीयम् समर्पयामि )

२६. ताम्बूल👉  इस क्रिया में माता को सुगन्धित पान समर्पित करें

ॐ पुन्गीफलम महादिव्यम नागवल्ली दलैर्युतम्। 
कर्पूरैल्लास समायुक्तं ताम्बूल प्रतिगृह्यताम्।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा ताम्बूलं समर्पयामि )

२७. काजल👉  माता को काजल समर्पित करें

ॐ स्निग्धमुष्णम हृद्यतमं दृशां शोभाकरम तव। 
गृहीत्वा कज्जलं सद्यो नेत्रान्यांजय कालिके।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा कज्जलं समर्पयामि )

२८. महावर👉  इस क्रिया में माँ को लाला रंग का महावर समर्पित करते हैं ( लाल रंग एवं पानी का मिश्रण जिसे ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं पैरों में लगाती हैं )

ॐ चलतपदाम्भोजनस्वर द्युतिकारि मनोहरम। 
अलकत्कमिदं देवि मया दत्तं प्रगृह्यताम्। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा महावरम समर्पयामि )

२९. चामर👉  इस क्रिया में माँ को चामर / पंखा ढलना होता है

ॐ चामरं चमरी पुच्छं हेमदण्ड समन्वितम्। 
मायार्पितं राजचिन्ह चामरं प्रतिगृह्यताम्।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा चामरं समर्पयामि )

३० . घंटा वाद्यम्👉  इस क्रिया में माँ के सामने घंटा / घंटी बजानी होती है ( यह ध्वनि आपके घर और आपसे सभी नकारात्मक शक्तियों को दूर करती है एवं आपके मन में प्रसन्नता और हर्ष को जन्म देती है )

ॐ यथा भीषयसे दैत्यान् यथा पूरयसेअसुरम। 
तां घंटा सम्प्रयच्छामि महिषधिनी प्रसीद में।।  

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा घंटा वाद्यं समर्पयामि )

३१. दक्षिणा👉  इस क्रिया में माँ को दक्षिणा धन समर्पित किया जाता है - ( जो कि सामर्थ्यानुसार है )

ॐ काञ्चनं रजतोपेतं नानारत्न समन्वितं। 
दक्षिणार्थम् च देवेशि गृहाण त्वं नमोस्तुते।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा आसनं समर्पयामि )

३३. पुष्पांजलि👉 ॐ काली काली भद्रकाली कालिके पाप नाशिनी। 
काली कराली निष्क्रान्ते भद्रकाल्यै तवननमोस्तुते।। 

ॐ उत्तिष्ठ देवी चामुण्डे शुभां पूजा प्रगृह्य में। 
कुरुष्व मम कल्याणमस्टाभि शक्तिभिः सह।। 

भुत प्रेत पिशाचेभ्यो रक्षोभ्यश्च महेश्वरि। 
देवेभ्यो मानुषोभ्योश्च भयेभ्यो रक्ष मा सदा।। 

सर्वदेवमयीं देवीं सर्व रोगभयापहाम। 
ब्रह्मेश विष्णु नमिताम् प्रणमामि सदा उमां।। 

आय़ुर्ददातु में भद्रकाल्यै पुत्रानादि सदा शिवा। 
अर्थ कामो महामाया विभवं सर्व मङ्गला।। 

क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरि पुष्पांजलिं समर्पयामि

३४. नीराजन👉  इस क्रिया में पुनः माँ कि प्राथमिक आरती उतारते हैं जिसमे सिर्फ कर्पूर का प्रयोग होता है

ॐ कर्पूरवर्ति संयुक्तं वहयिना दीपितंचयत। 
नीराजनं च देवेशि गृह्यतां जगदम्बिके।। 

३५. क्षमा प्रार्थना👉 
ॐ प्रार्थयामि महामाये यत्किञ्चित स्खलितम् मम। 
क्षम्यतां तज्जगन्मातः कालिके देवी नमोस्तुते।। 

ॐ विधिहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं यदरचितम्। 
पुर्णम्भवतु तत्सर्वं त्वप्रसादान्महेश्वरी।। 

शक्नुवन्ति न ते पूजां कर्तुं ब्रह्मदयः सुराः। 
अहं किं वा करिष्यामि मृत्युर्धर्मा नरोअल्पधिः।। 

न जाने अहं स्वरुप ते न शरीरं न वा गुणान्। 
एकामेव ही जानामि भक्तिं त्वचर्णाबजयोः।। 

३६. आरती👉  इस क्रिया में माता कि आरती उतारते हैं और यह चरण आपकी उस काल कि साधना के समापन का प्रतीक है -( इसके लिए अलग से कोई आरती जलने कि कोई जरुरत नहीं है आप उसी दीपक का उपयोग करेंगे जो आपने पूजा के प्रारम्भ में घी का दीपक जलाया था )
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Friday, 31 March 2023

मां ब्रह्मचारिणी

मांब्रह्मचारिणी

                    ।। कवच।।
त्रिपुरा मे हृदयंपातु ललाटेपातु शंकर भामिनी।
अर्पणा सदापातु नेत्रो, अर्धरी च कपोलो॥
पंचदशी कण्ठे पातु मध्यदेशे पातु महेश्वरी॥
षोडशी सदापातु नाभो गृहो च पादयो।
अंग प्रत्यंग सतत पातु ब्रह्मचारिणी।

                ।।ध्यान मंत्र।।
वन्दे वांछित लाभायचन्द्रार्घकृत शेखराम्।
जपमालाकमण्डलु धराब्रह्म चारिणी शुभाम्॥
गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम।
धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालंकार भूषिताम्॥
परम वदना पल्लवराधरां कांत कपोला पीन।
पयोधराम् कमनीया लावण्यम् ,
स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

                     ।। मंत्र।। 
रुद्राक्ष माला से निम्नलिखित एक मंत्र की ५ या ११ माला जप करें-
१-ॐ ब्रं ब्रह्मचारिणे नमः।
२-ॐ ब्रां ब्रीं ब्रूं ब्रह्मचारिण्यै नम:।
               ॥नमस्कार मंत्र॥
 दधानां करपद्याभ्यामक्षमाला कमण्डलु।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्माचारिण्यनुत्तमा॥

                  ।।स्तोत्र।। 
तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्।
ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥
शंकरप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी।
शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥

मां ब्रह्मचारिणी का पूजन करने के लिए निम्न नियमों का पालन करना फलदायक होता है-
१- पहले सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहन लें।
२- मां को पीला रंग अत्यंत प्रिय है। अत: पीले रंग के वस्त्रादि का प्रयोग कर मां की आराधना करना शुभ होता है।
३- अब ब्रह्मचारिणी की पूजा के लिए उनका यंत्र चित्र या मूर्ति पूजा स्थान पर स्थापित करें।
४- माता के यंत्र चित्र या मूर्ति पर कुमकुम अक्षत,फूल चढ़ाकर धूप दीपक जलाएं रेशमी डोरी और नैवेद्य अर्पण करें।
५- मां को नैवेद्य में चीनी शक्कर और मिश्री पंचामृत का भोग चढ़ाएं। माता को दूध से बने व्‍यंजन भी अतिप्रिय हैं।
६- इनका भोग लगाने से ज्ञान वैराग्य आयु में बढ़ोतरी होती है।
७- साधना के बाद मीठे फल दान करें। आप चाहें तो त्रिपुर सुंदरी साधना भी कर सकते हैं। 
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अन्नपूर्णा मां

माँ अन्नपूर्णा की कथा
अन्नपूर्णा देवी हिन्दू धर्म में मान्य देवी-देवताओं में विशेष रूप से पूजनीय हैं। इन्हें माँ जगदम्बा का ही एक रूप माना गया है, जिनसे सम्पूर्ण विश्व का संचालन होता है। इन्हीं जगदम्बा के अन्नपूर्णा स्वरूप से संसार का भरण-पोषण होता है। अन्नपूर्णा का शाब्दिक अर्थ है- 'धान्य' (अन्न) की अधिष्ठात्री। सनातन धर्म की मान्यता है कि प्राणियों को भोजन माँ अन्नपूर्णा की कृपा से ही प्राप्त होता है। शिव की अर्धांगनी, कलियुग में माता अन्नपूर्णा की पुरी काशी है, किंतु सम्पूर्ण जगत् उनके नियंत्रण में है। बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी के अन्नपूर्णाजी के आधिपत्य में आने की कथा बडी रोचक है। भगवान शंकर जब पार्वती के संग विवाह करने के पश्चात् उनके पिता के क्षेत्र हिमालय के अन्तर्गत कैलास पर रहने लगे, तब देवी ने अपने मायके में निवास करने के बजाय अपने पति की नगरी काशी में रहने की इच्छा व्यक्त की। महादेव उन्हें साथ लेकर अपने सनातन गृह अविमुक्त-क्षेत्र (काशी) आ गए। काशी उस समय केवल एक महाश्मशान नगरी थी। माता पार्वती को सामान्य गृहस्थ स्त्री के समान ही अपने घर का मात्र श्मशान होना नहीं भाया। इस पर यह व्यवस्था बनी कि सत्य, त्रेता, और द्वापर, इन तीन युगों में काशी श्मशान रहे और कलियुग में यह अन्नपूर्णा की पुरी होकर बसे। इसी कारण वर्तमान समय में अन्नपूर्णा का मंदिर काशी का प्रधान देवीपीठ हुआ। स्कन्दपुराण के 'काशीखण्ड' में लिखा है कि भगवान विश्वेश्वर गृहस्थ हैं और भवानी उनकी गृहस्थी चलाती हैं। अत: काशीवासियों के योग-क्षेम का भार इन्हीं पर है। 'ब्रह्मवैव‌र्त्तपुराण' के काशी-रहस्य के अनुसार भवानी ही अन्नपूर्णा हैं। परन्तु जनमानस आज भी अन्नपूर्णा को ही भवानी मानता है। श्रद्धालुओं की ऐसी धारणा है कि माँ अन्नपूर्णा की नगरी काशी में कभी कोई भूखा नहीं सोता है। 

माता अन्नपूर्णा से शिवजी ने भिक्षा क्यो मांगी
पौराणिक हिन्दू ग्रंथों के अनुसार प्राचीन समय में किसी कारणवश धरती बंजर हो गई, जिस वजह से धान्य-अन्न उत्पन्न नहीं हो सका, भूमि पर खाने-पीने का सामान खत्म होने लगा जिससे पृथ्वीवासियों की चिंता बढ़ गई। परेशान होकर वे लोग ब्रह्माजी और श्रीहरि विष्णु की शरण में गए और उनके पास पहुंचकर उनसे इस समस्या का हल निकालने की प्रार्थना की।
इसपर ब्रह्मा और श्री‍हरि विष्णु जी ने पृथ्वीवासियों की चिंता को जाकर भगवान शिव को बताया। पूरी बात सुनने के बाद भगवान शिव ने पृथ्वीलोक पर जाकर गहराई से निरीक्षण किया। इसके बाद पृथ्वीवासियों की चिंता दूर करने के लिए भगवान शिव ने एक भिखारी का रूप धारण किया और माता पार्वती ने माता अन्नपूर्णा का रूप धारण किया। माता अन्नपूर्णा से भिक्षा मांगकर भगवान शिव ने धरती पर रहने वाले सभी लोगों में ये अन्न बांट दिया। इससे धरतीवासियों की अन्न की समस्या का अंत हो गया और तभी से मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन अन्नपूर्णा जयंती मनाई जाने लगी।

अन्नपूर्णा माता की उपासना से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। ये अपने भक्त की सभी विपत्तियों से रक्षा करती हैं। इनके प्रसन्न हो जाने पर अनेक जन्मों से चली आ रही दरिद्रता का भी निवारण हो जाता है। ये अपने भक्त को सांसारिक सुख प्रदान करने के साथ मोक्ष भी प्रदान करती हैं। तभी तो ऋषि-मुनि इनकी स्तुति करते हुए कहते हैं।

शोषिणीसर्वपापानांमोचनी सकलापदाम्।दारिद्र्यदमनीनित्यंसुख-मोक्ष-प्रदायिनी॥ 

काशी की पारम्परिक 'नवगौरी यात्रा' में आठवीं भवानी गौरी तथा नवदुर्गा यात्रा में अष्टम महागौरी का दर्शन-पूजन अन्नपूर्णा मंदिर में ही होता है। अष्टसिद्धियों की स्वामिनी अन्नपूर्णाजी की चैत्र तथा आश्विन के नवरात्र में अष्टमी के दिन 108 परिक्रमा करने से अनन्त पुण्य फल प्राप्त होता है। सामान्य दिनों में अन्नपूर्णा माता की आठ परिक्रमा करनी चाहिए। प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन अन्नपूर्णा देवी के निमित्त व्रत रखते हुए उनकी उपासना करने से घर में कभी धन-धान्य की कमी नहीं होती है। भविष्यपुराण में मार्गशीर्ष मास के अन्नपूर्णा व्रत की कथा का विस्तार से वर्णन मिलता है। काशी के कुछ प्राचीन पंचांग मार्गशीर्ष की पूर्णिमा में अन्नपूर्णा जयंती का पर्व प्रकाशित करते हैं। अन्नपूर्णा देवी का रंग जवापुष्प के समान है। इनके तीन नेत्र हैं, मस्तक पर अ‌र्द्धचन्द्र सुशोभित है। भगवती अन्नपूर्णा अनुपम लावण्य से युक्त नवयुवती के सदृश हैं। बन्धूक के फूलों के मध्य दिव्य आभूषणों से विभूषित होकर ये प्रसन्न मुद्रा में स्वर्ण-सिंहासन पर विराजमान हैं। देवी के बायें हाथ में अन्न से पूर्ण माणिक्य, रत्न से जडा पात्र तथा दाहिने हाथ में रत्नों से निर्मित कलछूल है। अन्नपूर्णा माता अन्न दान में सदा तल्लीन रहती हैं। देवीभागवत में राजा बृहद्रथ की कथा से अन्नपूर्णा माता और उनकी पुरी काशी की महिमा उजागर होती है। भगवती अन्नपूर्णा पृथ्वी पर साक्षात कल्पलता हैं, क्योंकि ये अपने भक्तों को मनोवांछित फल प्रदान करती हैं। स्वयं भगवान शंकर इनकी प्रशंसा में कहते हैं- "मैं अपने पांचों मुख से भी अन्नपूर्णा का पूरा गुण-गान कर सकने में समर्थ नहीं हूँ। यद्यपि बाबा विश्वनाथ काशी में शरीर त्यागने वाले को तारक-मंत्र देकर मुक्ति प्रदान करते हैं, तथापि इसकी याचना माँ अन्नपूर्णा से ही की जाती है। गृहस्थ धन-धान्य की तो योगी ज्ञान-वैराग्य की भिक्षा इनसे मांगते हैं।

अन्नपूर्णेसदा पूर्णेशङ्करप्राणवल्लभे। ज्ञान-वैराग्य-सिद्धयर्थम् भिक्षाम्देहिचपार्वति॥ 

मंत्र-महोदधि, तन्त्रसार, पुरश्चर्यार्णव आदि ग्रन्थों में अन्नपूर्णा देवी के अनेक मंत्रों का उल्लेख तथा उनकी साधना-विधि का वर्णन मिलता है। मंत्रशास्त्र के सुप्रसिद्ध ग्रंथ 'शारदातिलक' में अन्नपूर्णा के सत्रह अक्षरों वाले निम्न मंत्र का विधान वर्णित है- 

"ह्रीं नम: भगवतिमाहेश्वरिअन्नपूर्णेस्वाहा" 

मंत्र को सिद्ध करने के लिए इसका सोलह हज़ार बार जप करके, उस संख्या का दशांश (1600 बार) घी से युक्त अन्न के द्वारा होम करना चाहिए। जप से पूर्व यह ध्यान करना होता है।
 रक्ताम्विचित्रवसनाम्नवचन्द्रचूडामन्नप्रदाननिरताम्स्तनभारनम्राम्।नृत्यन्तमिन्दुशकलाभरणंविलोक्यहृष्टांभजेद्भगवतीम्भवदु:खहन्त्रीम्॥ 

अर्थात 'जिनका शरीर रक्त वर्ण का है, जो अनेक रंग के सूतों से बुना वस्त्र धारण करने वाली हैं, जिनके मस्तक पर बालचंद्र विराजमान हैं, जो तीनों लोकों के वासियों को सदैव अन्न प्रदान करने में व्यस्त रहती हैं, यौवन से सम्पन्न, भगवान शंकर को अपने सामने नाचते देख प्रसन्न रहने वाली, संसार के सब दु:खों को दूर करने वाली, भगवती अन्नपूर्णा का मैं स्मरण करता हूँ।' प्रात:काल नित्य 108 बार अन्नपूर्णा मंत्र का जप करने से घर में कभी अन्न-धन का अभाव नहीं होता। शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन अन्नपूर्णा का पूजन-हवन करने से वे अति प्रसन्न होती हैं। करुणा मूर्ति ये देवी अपने भक्त को भोग के साथ मोक्ष प्रदान करती हैं। सम्पूर्ण विश्व के अधिपति विश्वनाथ की अर्धांगिनी अन्नपूर्णा सबका बिना किसी भेद-भाव के भरण-पोषण करती हैं। जो भी भक्ति-भाव से इन वात्सल्यमयी माता का अपने घर में आवाहन करता है, माँ अन्नपूर्णा उसके यहाँ सूक्ष्म रूप से अवश्य वास करती हैं। 

माता अन्नपूर्णा की व्रत कथा
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काशी निवासी धनंजय की पत्नी का नाम सुलक्षणा था । उसे अन्य सब सुख प्राप्त थे, केवल निर्धनता ही उसके दुःख का कारण थी। यह दुःख उसे हर समय सताता था । एक दिन सुलक्षणा पति से बोली- स्वामी! आप कुछ उद्यम करो तो काम चले । इस प्रकार कब तक काम चलेगा ? सुलक्षण्णा की बात धनंजय के मन में बैठ और वह उसी दिन विश्वनाथ शंकर जी को प्रसन्न करने के लिए बैठ गया और कहने लगा- हे देवाधिदेव विश्वेश्वर ! मुझे पूजा-पाठ कुछ आता नहीं है, केवल तुम्हारे भरोसे बैठा हूँ । इतनी विनती करके वह दो-तीन दिन भूखा-प्यासा बैठा रहा । यह देखकर भगवान शंकर ने उसके कान में ‘अन्नपूर्णा ! अन्नपूर्णा!! अन्नपूर्णा!!!’ इस प्रकार तीन बार कहा। यह कौन, क्या कह गया ? इसी सोच में धनंजय पड़ गया कि मन्दिर से आते ब्राह्मणों को देखकर पूछने लगा- पंडितजी ! अन्नपूर्णा कौन है ? ब्राह्मणों ने कहा- तू अन्न छोड़ बैठा है, सो तुझे अन्न की ही बात सूझती है । जा घर जाकर अन्न ग्रहण कर । धनंजय घर गया, स्त्री से सारी बात कही, वह बोली-नाथ! चिंता मत करो, स्वयं शंकरजी ने यह मंत्र दिया है। वे स्वयं ही खुलासा करेंगे। आप फिर जाकर उनकी आराधना करो । धनंजय फिर जैसा का तैसा पूजा में बैठ गया। रात्रि में शंकर जी ने आज्ञा दी । कहा- तू पूर्व दिशा में चला जा । वह अन्नपूर्णा का नाम जपता जाता और रास्ते में फल खाता, झरनों का पानी पीता जाता । इस प्रकार कितने ही दिनों तक चलता गया । वहां उसे चांदी सी चमकती बन की शोभा देखने में आई । सुन्दर सरोवर देखने में या, उसके किनारे कितनी ही अप्सराएं झुण्ड बनाए बैठीं थीं । एक कथा कहती थीं । और सब ‘मां अन्नपूर्णा’ इस प्रकार बार-बार कहती थीं।
यह अगहन मास की उजेली रात्रि थी और आज से ही व्रत का ए आरम्भ था । जिस शब्द की खोज करने वह निकला था, वह उसे वहां सुनने को मिला । धनंजय ने उनके पास जाकर पूछा- हे देवियो ! आप यह क्या करती हो? उन सबने कहा हम सब मां अन्नपूर्णा का व्रत करती हैं । व्रत करने से गई पूजा क्या होता है? यह किसी ने किया भी है? इसे कब किया जाए? कैसा व्रत है में और कैसी विधि है? मुझसे भी कहो। वे कहने लगीं- इस व्रत को सब कोईकर सकते हैं । इक्कीस दिन तक के लिए 21 गांठ का सूत लेना चाहिए । 21 दिन यदि न बनें तो एक दिन उपवास करें, यह भी न बनें तो केवलकथा सुनकर प्रसाद लें। निराहार रहकर कथा कहें, कथा सुनने वाला कोई न मिले तो पीपल के पत्तों को रख सुपारी या घृत कुमारी (गुवारपाठ) वृक्ष को सामने कर दीपक को साक्षी कर सूर्य, गाय, तुलसी या महादेव को बिना कथा सुनाए मुख में दाना न डालें। यदि भूल से कुछ पड़ जाए तो एक दिवस फिर उपवास करें। व्रत के दिन क्रोध न करें और झूठ न बोलें। धनंजय बोला- इस व्रत के करने से क्या होगा ? वे कहने लगीं- इसके करने से अन्धों को नेत्र मिले, लूलों को हाथ मिले, निर्धन के घर धन आए, बांझी को संतान मिले, मूर्ख को विद्या आए, जो जिस कामना से व्रत करे, मां उसकी इच्छा पूरी करती है। वह कहने लगा- बहिनों! मेरे भी धन नहीं है, विद्या नहीं है, कुछ भी तो नहीं है, मैं तो दुखिया ब्राह्मण हूँ, मुझे इस व्रत का सूत दोगी? हां भाई तेरा कल्याण हो , तुझे देंगी, ले इस व्रत का मंगलसूत ले। धनंजय ने व्रत किया । व्रत पूरा हुआ, तभी सरोवर में से 21 खण्ड की सुवर्ण सीढ़ी हीरा मोती जड़ी हुई प्रकट हुई। धनंजय जय ‘अन्नपूर्णा’ ‘अन्नपूर्णा’ कहता जाता था। इस प्रकार कितनी ही सीढि़यां उतर गया तो क्या देखता है कि करोड़ों सूर्य से प्रकाशमान अन्नपूर्णा का मन्दिर है, उसके सामने सुवर्ण सिंघासन पर माता अन्नपूर्णा विराजमान हैं। सामने भिक्षा हेतु शंकर भगवान खड़े हैं। देवांगनाएं चंवर डुलाती हैं। कितनी ही हथियार बांधे पहरा देती हैं। धनंजय दौड़कर जगदम्बा के चरणों में गिर गया। देवी उसके मन का क्लेश जान गईं । धनंजय कहने लगा- माता! आप तो अन्तर्यामिनी हो। आपको अपनी दशा क्या बताऊँ ? माता बोली - मेरा व्रत किया है, जा संसार तेरा सत्कार करेगा । माता ने धनंजय की जिह्नवा पर बीज मंत्र लिख दिया । अब तो उसके रोम-रोम में विद्या प्रकट हो गई । इतने में क्या देखता है कि वह काशी विश्वनाथ के मन्दिर में खड़ा है। मां का वरदान ले धनंजय घर आया । सुलक्षणा से सब बात कही । माता जी की कृपा से उसके घर में सम्पत्ति उमड़ने लगी। छोटा सा घर बहुत बड़ा गिना जाने लगा। जैसे शहद के छत्ते में मक्खियां जमा होती हैं, उसी प्रकार अनेक सगे सम्बंधी आकर उसकी बड़ाई करने लगे। कहने लगे-इतना धन और इतना बड़ा घर, सुन्दर संतान नहीं तो इस कमाई का कौन भोग करेगा? सुलक्षणा से संतान नहीं है, इसलिए तुम दूसरा विवाह करो । अनिच्छा होते हुए भी धनंजय को दूसरा विवाह करना पड़ा और सती सुलक्षणा को सौत का दुःख उठाना पड़ा । इस प्रकार दिन बीतते गय फिर अगहन मास आया। नये बंधन से बंधे पति से सुलक्षणा ने कहलाया कि हम व्रत के प्रभाव से सुखी हुए हैं । इस कारण यह व्रत छोड़ना नहीं चाहिए । यह माता जी का प्रताप है। जो हम इतने सम्पन्न और सुखी हैं । सुलक्षणा की बात सुन धनंजय उसके यहां आया और व्रत में बैठ गया। नयी बहू को इस व्रत की खबर नहीं थी। वह धनंजय के आने की राह देख रही थी । दिन बीतते गये और व्रत पूर्ण होने में तीन दिवस बाकी थे कि नयी बहू को खबर पड़ी। उसके मन में ईष्र्या की ज्वाला दहक रही थी । सुलक्षणा के घर आ पहुँची ओैर उसने वहां भगदड़ मचा दी । वह धनंजय को अपने साथ ले गई । नये घर में धनंजय को थोड़ी देर के लिए निद्रा ने आ दबाया । इसी समय नई बहू ने उसका व्रत का सूत तोड़कर आग में फेंक दिया । अब तो माता जी का कोप जाग गया । घर में अकस्मात आग लग गई, सब कुछ जलकर खाक हो गया । सुलक्षणा जान गई और पति को फिर अपने घर ले आई । नई बहू रूठ कर पिता के घर जा बैठी । पति को परमेश्वर मानने वाली सुलक्षणा बोली- नाथ ! घबड़ाना नहीं । माता जी की कृपा अलौकिक है । पुत्र कुपुत्र हो जाता है पर माता कुमाता नहीं होती। अब आप श्रद्धा और भक्ति से आराधना शुरू करो। वे जरूर हमारा कल्याण करेंगी । धनंजय फिर माता के पीछे पड़ गया। फिर वहीं सरोवर सीढ़ी प्रकट हुई, उसमें ‘ मां अन्नपूर्णा’ कहकर वह उतर गया। वहां जा माता जी के चरणों में रुदन करने लगा । माता प्रसन्न हो बोलीं-यह मेरी स्वर्ण की मूर्ति ले, उसकी पूजा करना, तू फिर सुखी हो जायेगा, जा तुझे मेरा आशीर्वाद है । तेरी स्त्री सुलक्षणा ने श्रद्धा से मेरा व्रत किया है, उसे मैंने पुत्र दिया है । धनंजय ने आँखें खोलीं तो खुद को काशी विश्वनाथ के मन्दिर में खड़ा पाया । वहां से फिर उसी प्रकार घर को आया । इधर सुलक्षणा के दिन चढ़े और महीने पूरे होते ही पुत्र का जन्म हुआ । गांव में आश्चर्य की लहर दौड़ गई । मानता आने लगा। इस प्रकार उसी गांव के निःसंतान सेठ के पुत्र होने पर उसने माता अन्नपूर्णा का मन्दिर बनवा दिया, उसमें माता जी धूमधाम से पधारीं, यज्ञ किया और धनंजय को मन्दिर के आचार्य का पद दे दिया । जीविका के लिए मन्दिर की दक्षिणा और रहने के लिए बड़ा सुन्दर सा भवन दिया। धनंजय स्त्री-पुत्र सहित वहां रहने लगा । माता जी की चढ़ावे में भरपूर आमदनी होने लगी। उधर नई बहू के पिता के घर डाका पड़ा, सब लुट गया, वे भीख मांगकर पेट भरने लगे । सुलक्षणा ने यह सुना तो उन्हे बुला भेजा, अलग घर में रख लिया और उनके अन्न-वस्त्र का प्रबंध कर दिया । धनंजय, सुलक्षणा और उसका पुत्र माता जी की कृपा से आनन्द से रहने लगे। माता जी ने जैसे इनके भण्डार भरे वैसे सबके भण्डार भरें।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 सधन्यवाद साभार 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

Wednesday, 22 February 2023

कुंडलिनी

कुंडलिनी_स्तोत्र।। 
साधक को ध्यान करने से पूर्व  इस स्तुति का पाठ करने से  कुंडलिनी जाग्रत और उर्ध्व गमन होने में फायदा मिलता है।

              श्रीकुण्डलिनी स्तुति स्तोत्र;-
ॐ जन्मोद्धारनिरीक्षणीहतरुणी वेदादि बीजादिमां
नित्यं चेतसि भाव्यते भुवि कदा सद्वाक्य
सञ्चारिणी मां पातु प्रियदासभावकपदं सङ्घातये श्रीधरे ! धात्रि ! त्वं स्वयमादि देववनितादीनातिदिनं पशुम् II1II

रक्ताभामृतचन्द्रिका लिपिमयी सर्पाकृति निर्द्रिता जाग्रत्कूर्म समाश्रिता भगवती त्वं मां समालोकय मांसो मांसोद्गन्धकुगन्धदोषजडितं वेदादि
कार्यान्वितम् स्वल्पास्वामलचन्द्र कोटिकिरणै-नित्यं शरीरम् कुरु II2II

सिद्धार्थी निजदोष वित्स्थलगतिर्व्याजीयते
विद्यया कुण्डल्याकुलमार्ग मुक्तनगरी माया कुमार्गःश्रिया यद्येवम् भजति प्रभातसमये मध्यान्हकालेऽथवा
नित्यम् यः कुलकुण्डलीजपपदाम्भोजं स सिद्धो भवेत् II3II

वाय्वाकाशचतुर्दलेSतिविमले वाञ्छोफ़लोन्मूलके नित्यम् सम्प्रति नित्त्यदेहघटिता साङ्केतिता भाविता
विद्या कुण्डलमानिनी स्वजननी माया क्रिया भाव्यते यैस्तैः सिद्धकुलोद्भवैः प्रणतिभिः सत्स्तोत्रकैः शम्शुभिः II4II

वाताशन्कविमोहिनीति बलवच्छाया पटोद्गामिनी
संसारादी महासुख प्रहरिणी ! तत्र स्थिता योगिनी सर्वग्रन्थिविभेदिनी स्वभुजगा सूक्ष्मातिसूक्ष्मा परा
ब्रह्मज्ञानविनोदिनी कुलकुटीराघातनी भाव्यते II5II

वन्दे श्रीकुलकुण्डलीं त्रिवलिभिः साङ्गैः
स्वयंभूप्रियां
प्रावेष्ट्याम्बर चित्तमध्यचपला बालाबला निष्कलां
या देवी परिभाति वेदवदना सम्भावनी तापिनी
इष्टानाम् शिरसि स्वयम्भुवनिता सम्भावयामि क्रियाम् II6II

वाणी कोटि मृदङ्गनाद मदना निश्रेणि कोटिध्वनिःप्राणेशी प्रियताममूलकमनोल्लासैकपूर्णानना
आषाढोद्भवमेघराजिजनित ध्वान्तानना स्थायिनी माता सा परिपातु सूक्ष्मपथगे ! मां योगिनां शङ्करी II7II

त्वामाश्रित्त्य नरा व्रजन्ति सहसा
वैकुण्ठ कैलासयोः
आनंदैक विलासिनीम् शशिशता नन्दाननां कारणम्
मातः श्रीकुलकुण्डली प्रियकले काली कलोद्दीपने !
तत्स्थानं प्रणमामि भद्रवनिते ! मामुद्धर त्वं पथे II8II

कुण्डलीशक्तिमार्गस्थं स्तोत्राष्टक महाफ़लम्
यः पठेत् प्रातरुत्थाय स योगी भवति धृवम्
क्षणादेव हि पाठेन कविनाथो भवेदिह
पवित्रौ कुण्डली योगी ब्रह्मलीनो भवेन्महान्

इति ते कथितं नाथ ! कुण्डलीकोमलं स्तवम्
एतत् स्तोत्र प्रसादेन देवेषु गुरुगीष्पतिः
सर्वे देवाः सिद्धियुता अस्याः स्तोत्रप्रसादतः

द्विपरार्धं चिरञ्जीवी ब्रह्मा सर्वसुरेश्वरः
इति श्री आदि शक्ति भैरवी विरचितम्

!!श्री कुण्डलिनीस्तुति स्तोत्रम् संपूर्णम्!! 

(हिंदी अनुवाद )
   मानव के जन्म से ही उसके उद्धार का निरीक्षण करने वाली,वेद शास्त्र के बीज की तरह आदि माँ की तरह हमेशा अन्तःकरण में प्रकाशमान रहने वाली,पृथ्वी पर सदा सुखः देने वाली,सर्वदा ग्यान में संचार करने वाली,कांति, तेज,शोभा धारण करनेवाली,स्वयं आदि देवता है सुंदरी, दीनों में अतिदीन पशु जैसी हमारी अवस्था है।कृपा करके हमारा रक्षण कीजिये।

रक्तवर्ण कांति धारण करने वाली अमृतमय चांदनी की तरह तेजमान रहने वाली,सर्पाकृति  निंद्रा अवस्था में होकर भी जागृत कछवे की तरह हमारी और है देवी आप प्यार से देखे।सर्व दोषों से युक्त इस नश्वर देह को कोटि कोटि निर्मल चन्द्रकिरणों से,वेदशास्त्र कार्यों से परिपूर्ण कीजिये।

सिद्धि प्राप्त करने की अपेक्षा करने वाला साधक कुण्डलिनी के ग्यान से कुमार्ग से दूर रहकर दोषमुक्त जीवन आचरण करता है।ऐसा साधक सुबह,दोपहर या नित्य श्री कुण्डलिनी स्तुति स्तोत्र का श्रवण करता है वो सिद्ध पुरुष की उपाधि प्राप्त करता है।

पृथ्वी,वायु,आकाश,अग्नि एवं जलतत्व में स्थित यह श्री कुण्डलिनी शक्ति अपवित्र इच्छाओं को नष्ट करती है।मानव में होने वाले मोहजाल को भी पूर्णतया नष्ट करती है।कुण्डलिनी शक्ति हमारी माँ है।आत्मसाक्षात्कारी कुल से जन्म लेने वाला साधक यह पवित्र श्लोक के पठन,श्रवण से  उसके आत्मा को प्रकाशमान करता है।

श्री कुण्डलिनी माता चैतन्यरूपी लहरियों का आवरण करके भक्तोंका उत्थान सुखकारक करती है।संसार के दुःखोंका नाश करके ब्रम्हग्रंथि विष्णुग्रंथि रूद्र ग्रंथि,आदि ग्रंथि का भेद करती है।सूक्ष्म से अति सूक्ष्म ब्रम्हग्यान की चर्चा करने वाली कुण्डलिनी माँ स्वयम्भू प्रिय है यह मूलाधार में स्थित यह अबोध स्त्री है।माँ ने अनेक कलाये है।माँ वेदमुखी है।साधना करने वाले भक्तों पर उनकी कृपा दृष्टि रहती है।यह एक तपस्विनी है।सहस्त्रार में शोभावान दिखने वाले इस माँ का हम आदर करते है और उनको प्रणाम करते है।

कोटि कोटि मृदंगनाद का दमन करने वाली कोटि कोटि ध्वनिओं को दूर करने वाली प्राणों की स्वामिनी जिसका मुखकमल पूर्ण चंद्रमा की तरह है।वह अनेक आंनदरूपी वनों को उल्लसित करती है।आषाढ़ से मेघगर्जना से निर्मित अग्यानरूपी अंधकार को दूर करती है।और सदैव स्थिर रहके सूक्ष्म मार्ग सुष्मुना द्वारा योगियोंका उत्थान करके उनका कल्याण करती है।श्री कुंडलिनी माँ हमारा रक्षण करती है।

कुण्डलिनी माँ आपके आश्रय में आनेवाला साधक वैकुण्ठ जो श्री विष्णुजी का स्थान है और कैलाश जो श्री शंकर का स्थान है वह सहज जा सकता है।केवल आनंद में शोभावान दिखने वाली शत चंद्रमा की तेज की तरह सुदर है काली माँ आप ही सम्पूर्ण कलाओं को महासरस्वती के रूप में उल्लसित करती है।हम आपको प्रणाम करते है।है देवी श्री महालक्ष्मी हमारा उद्धार कीजिये। 

कुण्डलिनी के शक्ति मार्ग के 8 श्लोकों का यह स्तोत्र महाफल देने वाला है।जो प्रातः काल में यह स्तोत्रका पठन या श्रवण करता है वह निच्छित ही योगी बनता है और क्षण में कविश्रेष्ठ होता है।इस कुण्डलिनी योग से योगी महान पवित्र और ब्रम्हग्यानी होता है।
    
श्री आदिशक्ति कहती है "यह कोमल कुण्डलिनी स्तुति स्तोत्र की व्याख्या मैंने आपको समझायी है।इस स्तोत्र की कृपा से ब्रस्पति सभी देवों के गुरु बन गये।सर्व देवीदेवताओं को सिद्धि प्राप्त हुई।इतना ही नही सभी देवों के ईश्वर दो प्ररार्ध नाम से चिरंजीव हो गए।इस प्रकार यह कुण्डलिनी स्तुति स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ।
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#तुलसी #स्तोत्रम् #पुंडरीक कृत

तुलसी स्तोत्रम्‌      (हिंदी अर्थ सहित) # Shri # Tulsi # Stotram      (With Hindi meaning) जगद्धात्रि नमस्तुभ्यं विष्णोश्च प्रियवल्लभे । यतो...