Sunday, 7 July 2024

#शिव #ताण्डव #स्तोत्र (#अर्थ #सहित)

शिव ताण्डव स्तोत्र (अर्थ सहित)

जटा टवी गलज्जलप्रवाह पावितस्थले गलेऽव लम्ब्यलम्बितां भुजंगतुंग मालिकाम्‌।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनाद वड्डमर्वयं चकारचण्डताण्डवं तनोतु नः शिव: शिवम्‌ ॥१॥

उनके बालों से बहने वाले जल से उनका कंठ पवित्र है,
और उनके गले में सांप है जो हार की तरह लटका है,
और डमरू से डमट् डमट् डमट् की ध्वनि निकल रही है,
भगवान शिव शुभ तांडव नृत्य कर रहे हैं, वे हम सबको संपन्नता प्रदान करें।

जटाकटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वल ल्ललाटपट्टपावके किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम: ॥२॥

मेरी शिव में गहरी रुचि है,
जिनका सिर अलौकिक गंगा नदी की बहती लहरों की धाराओं से सुशोभित है,
जो उनकी बालों की उलझी जटाओं की गहराई में उमड़ रही हैं?
जिनके मस्तक की सतह पर चमकदार अग्नि प्रज्वलित है,
और जो अपने सिर पर अर्ध-चंद्र का आभूषण पहने हैं।

धराधरेंद्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोद मानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणी निरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्विगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥

मेरा मन भगवान शिव में अपनी खुशी खोजे,
अद्भुत ब्रह्माण्ड के सारे प्राणी जिनके मन में मौजूद हैं,
जिनकी अर्धांगिनी पर्वतराज की पुत्री पार्वती हैं,
जो अपनी करुणा दृष्टि से असाधारण आपदा को नियंत्रित करते हैं, जो सर्वत्र व्याप्त है,
और जो दिव्य लोकों को अपनी पोशाक की तरह धारण करते हैं।

जटाभुजंगपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा कदंबकुंकुमद्रव प्रलिप्तदिग्व धूमुखे।
मदांधसिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे मनोविनोदद्भुतं बिंभर्तुभूत भर्तरि ॥४॥

मुझे भगवान शिव में अनोखा सुख मिले, जो सारे जीवन के रक्षक हैं,
उनके रेंगते हुए सांप का फन लाल-भूरा है और मणि चमक रही है,
ये दिशाओं की देवियों के सुंदर चेहरों पर विभिन्न रंग बिखेर रहा है,
जो विशाल मदमस्त हाथी की खाल से बने जगमगाते दुशाले से ढंका है।


सहस्रलोचन प्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी विधूसरां घ्रिपीठभूः।
भुजंगराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रियैचिरायजायतां चकोरबंधुशेखरः ॥५॥

भगवान शिव हमें संपन्नता दें,
जिनका मुकुट चंद्रमा है,
जिनके बाल लाल नाग के हार से बंधे हैं,
जिनका पायदान फूलों की धूल के बहने से गहरे रंग का हो गया है,
जो इंद्र, विष्णु और अन्य देवताओं के सिर से गिरती है।

ललाटचत्वरज्वल द्धनंजयस्फुलिंगभा निपीतपंच सायकंनम न्निलिंपनायकम्‌।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसंपदे शिरोजटालमस्तुनः ॥६॥

शिव के बालों की उलझी जटाओं से हम सिद्धि की दौलत प्राप्त करें,
जिन्होंने कामदेव को अपने मस्तक पर जलने वाली अग्नि की चिनगारी से नष्ट किया था,
जो सारे देवलोकों के स्वामियों द्वारा आदरणीय हैं,
जो अर्ध-चंद्र से सुशोभित हैं।

करालभालपट्टिका धगद्धगद्धगज्ज्वल द्धनंजया धरीकृतप्रचंड पंचसायके।
धराधरेंद्रनंदिनी कुचाग्रचित्रपत्र कप्रकल्पनैकशिल्पिनी त्रिलोचनेरतिर्मम ॥७॥

मेरी रुचि भगवान शिव में है, जिनके तीन नेत्र हैं,
जिन्होंने शक्तिशाली कामदेव को अग्नि को अर्पित कर दिया,
उनके भीषण मस्तक की सतह डगद् डगद्... की घ्वनि से जलती है,
वे ही एकमात्र कलाकार है जो पर्वतराज की पुत्री पार्वती के देह की नोक पर,
सजावटी रेखाएं खींचने में निपुण हैं।

नवीनमेघमंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर त्कुहुनिशीथनीतमः प्रबद्धबद्धकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिंधुरः कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥८॥

भगवान शिव हमें संपन्नता दें,
वे ही पूरे संसार का भार उठाते हैं,
जिनकी शोभा चंद्रमा है,
जिनके पास अलौकिक गंगा नदी है,
जिनकी गर्दन गला बादलों की पर्तों से ढंकी अमावस्या की अर्धरात्रि की तरह काली है।

प्रफुल्लनीलपंकज प्रपंचकालिमप्रभा विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌।
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥९॥

मैं भगवान शिव की प्रार्थना करता हूं, जिनका कंठ मंदिरों की चमक से बंधा है,
पूरे खिले नीले कमल के फूलों की गरिमा से लटकता हुआ,
जो ब्रह्माण्ड की कालिमा सा दिखता है।
जो कामदेव को मारने वाले हैं, जिन्होंने त्रिपुर का अंत किया,
जिन्होंने सांसारिक जीवन के बंधनों को नष्ट किया, जिन्होंने बलि का अंत किया,
जिन्होंने अंधक दैत्य का विनाश किया, जो हाथियों को मारने वाले हैं,
और जिन्होंने मृत्यु के देवता यम को पराजित किया।

अखर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌।
स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥१०॥

मैं भगवान शिव की प्रार्थना करता हूं, जिनके चारों ओर मधुमक्खियां उड़ती रहती हैं
शुभ कदंब के फूलों के सुंदर गुच्छे से आने वाली शहद की मधुर सुगंध के कारण,
जो कामदेव को मारने वाले हैं, जिन्होंने त्रिपुर का अंत किया,
जिन्होंने सांसारिक जीवन के बंधनों को नष्ट किया, जिन्होंने बलि का अंत किया,
जिन्होंने अंधक दैत्य का विनाश किया, जो हाथियों को मारने वाले हैं,
और जिन्होंने मृत्यु के देवता यम को पराजित किया।

जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुरद्ध गद्धगद्विनिर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्।
धिमिद्धिमिद्धि मिध्वनन्मृदंग तुंगमंगलध्वनिक्रमप्रवर्तित: प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥११॥

शिव, जिनका तांडव नृत्य नगाड़े की ढिमिड ढिमिड
तेज आवाज श्रंखला के साथ लय में है,
जिनके महान मस्तक पर अग्नि है, वो अग्नि फैल रही है नाग की सांस के कारण,
गरिमामय आकाश में गोल-गोल घूमती हुई।

दृषद्विचित्रतल्पयो र्भुजंगमौक्तिकमस्र जोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥१२॥

मैं भगवान सदाशिव की पूजा कब कर सकूंगा, शाश्वत शुभ देवता,
जो रखते हैं सम्राटों और लोगों के प्रति समभाव दृष्टि,
घास के तिनके और कमल के प्रति, मित्रों और शत्रुओं के प्रति,
सर्वाधिक मूल्यवान रत्न और धूल के ढेर के प्रति,
सांप और हार के प्रति और विश्व में विभिन्न रूपों के प्रति?

कदा निलिंपनिर्झरी निकुंजकोटरे वसन्‌ विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥१३॥

मैं कब प्रसन्न हो सकता हूं, अलौकिक नदी गंगा के निकट गुफा में रहते हुए,
अपने हाथों को हर समय बांधकर अपने सिर पर रखे हुए,
अपने दूषित विचारों को धोकर दूर करके, शिव मंत्र को बोलते हुए,
महान मस्तक और जीवंत नेत्रों वाले भगवान को समर्पित?

इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथागतिं विमोहनं हि देहिनां सुशंकरस्य चिंतनम् ॥१६॥

इस स्तोत्र को, जो भी पढ़ता है, याद करता है और सुनाता है,
वह सदैव के लिए पवित्र हो जाता है और महान गुरु शिव की भक्ति पाता है।
इस भक्ति के लिए कोई दूसरा मार्ग या उपाय नहीं है।
बस शिव का विचार ही भ्रम को दूर कर देता है।
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Wednesday, 26 June 2024

#अच्युताष्टकम् (हिन्दी अनुवाद सहित)

#अच्युताष्टकम् (श्रीमदआदिशंकराचार्य कृत ) 
ॐ अच्युतानन्त गोविन्दाय नमः।

भगवान के रूप का वर्णन करते हुये श्रीशंकराचार्यजी ने लिखा–‘भगवान श्रीकृष्ण ब्रह्मा-विष्णु-महेश से पृथक् विकाररहित और सर्वश्रेष्ठ एक सच्चिन्मयी नीलिमा हैं; इस नीलिमा में जगत् के सभी रंगों का लय हो जाता है’
              भगवान श्रीहरि को शीघ्र प्रसन्न करने वाला स्तोत्र है । जिन पापों की शुद्धि के लिए कोई उपाय नहीं, उनके लिए भगवान के नामों के स्तोत्र का पाठ करना सबसे अच्छा साधन है । नामों का पाठ मंगलकारी, मनवांछित फल देने वाला, दु:ख-दारिद्रय, रोग व ऋण को दूर करने वाला और आयु व संतान को देने वाला माना गया है ।

श्रीमद् आदिशंकराचार्य ने अपनी माता की मुक्ति के लिए आठ मधुर श्लोकों में भगवान श्रीकृष्ण से प्रकट होकर दर्शन देने की प्रार्थना की, तब उन्हें सुनकर भगवान श्रीकृष्ण आचार्य के समक्ष शंख, चक्र, कमल लिये प्रकट हो गये और उनकी माता कोअपना परमधाम दिया।

श्रीमद् आदिशंकराचार्य द्वारा रचित ‘अच्युताष्टकम्’ भगवान श्रीहरि को प्रसन्न करने वाला स्तोत्र है । यद्यपि इसमें वर्णन भगवान विष्णु का है परन्तु शंकराचार्यजी ने प्रधानता श्रीकृष्ण के ही वर्णन को दी है ।

          🍁अच्युताष्टकम्  श्रीमदआदिशंकराचार्य कृत 🍁
           (हिन्दी अर्थ सहित)
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🍁अच्युतं केशवं राम नारायणं
कृष्ण दामोदरं वासुदेवं हरिम् ।
श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं
जानकीनायकं रामचन्द्रं भजे ।।१ ।।

अर्थात्—अच्युत, केशव, राम, नारायण, कृष्ण, दामोदर, वासुदेव, हरि, श्रीधर, माधव, गोपिकावल्लभ तथा जानकीनायक रामचन्द्रजी को मैं भजता हूँ ।
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🍁अच्युतं केशवं सत्यभामाधवं
माधवं श्रीधरं राधिकाराधितम् ।
इन्दिरामन्दिरं चेतसा सुन्दरं
देवकीनन्दनं नन्दजं सन्दधे ।। २ ।।

अर्थात्—अच्युत, केशव,  सत्यभामापति, लक्ष्मीपति, श्रीधर, राधिकाजी द्वारा आराधित, लक्ष्मीनिवास, परम सुन्दर, देवकीनन्दन, नन्दकुमार का चित्त से ध्यान करता हूँ ।
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🍁विष्णवे जिष्णवे शंखिने चक्रिणे
रुक्मिणीरागिणे जानकी जानये ।
वल्लवीवल्लभायार्चितायात्मने
कंसविध्वंसिने वंशिने ते नम: ।।३ ।।

अर्थात्—जो विभु हैं, विजयी हैं, शंख-चक्र धारी हैं, रुक्मिणी के परम प्रेमी हैं, जानकीजी जिनकी धर्मपत्नी हैं तथा जो व्रजांगनाओं के प्राणाधार हैं, उन परम पूज्य, आत्मस्वरूप, कंसविनाशक मुरली मनोहर आपको नमस्कार करता हूँ ।
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🍁कृष्ण गोविन्द हे राम नारायण
श्रीपते वासुदेवाजित श्रीनिधे ।
अच्युतानन्त हे माधवाधोक्षज
द्वारकानायक द्रौपदीरक्षक ।। ४ ।।

अर्थात्—हे कृष्ण ! हे गोविन्द ! हे राम ! हे नारायण ! हे रमानाथ ! हे वासुदेव ! हे अजेय ! हे शोभाधाम ! हे अच्युत ! हे अनन्त ! हे माधव ! हे अधोक्षज ! हे द्वारकानाथ ! हे द्रौपदीरक्षक ! मुझ पर कृपा कीजिए ।
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🍁राक्षसक्षोभित: सीतया शोभितो
दण्डकारण्यभूपुण्यताकारण: ।
लक्ष्मणेनान्वितो वानरै: सेवितो-
ऽगस्त्यसम्पूजितो राघव: पातु माम् ।। ५ ।।

अर्थात्—जो राक्षसों पर अत्यन्त क्रोधित हैं, सीताजी से सुशोभित हैं, दण्डकारण्य की भूमि को पवित्र करने वाले हैं, लक्ष्मणजी जिनका अनुसरण करते हैं, वानर जिनकी सेवा करते हैं, अगत्स्य मुनि से सेवित हैं, वे रघुवंशी श्रीरामचन्द्रजी मेरी रक्षा करें ।
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🍁धेनुकारिष्टकानिष्टकृद् द्वेषिहा
केशिहा कंसहृद्वंशिकावादक: ।
पूतनाकोपक: सूरजाखेलनो
बालगोपालक: पातु मां सर्वदा ।। ६ ।।

अर्थात्—धेनुक और अरिष्टासुर आदि का अनिष्ट करने वाले, शत्रुओं का विनाश करने वाले, केशी और कंस का वध करने वाले, वंशी को बजाने वाले, पूतना पर कोप करने वाले, यमुना तट पर विहार करने वाले, बालगोपाल मेरी सदा रक्षा करें ।
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🍁विद्युदुद्योतवत्प्रस्फुरद्वाससं
प्रावृडम्भोदवत्प्रोल्लसद्विग्रहम् ।
वन्यया मालया शोभितोर:स्थलं
लोहितांघ्रिद्वयं वारिजाक्षं भजे ।। ७ ।।

अर्थात्—विद्युत के प्रकाश के समान जिनका पीताम्बर सुशोभित हो रहा है, वर्षाकालीन मेघों के समान जिनका अति सुन्दर शरीर है, जिनका वक्ष:स्थल वनमाला से विभूषित है और चरणकमल अरुण वर्ण के हैं, उन कमलनयन श्रीहरि को मैं भजता हूँ ।
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🍁कुंचितै: कुन्तलैर्भ्राजमानाननं
रत्नमौलिं लसत्कुण्डलं गण्डयो: ।
हारकेयूरकं कंकणप्रोज्ज्वलं
किंकणीमंजुलं श्यामलं तं भजे ।। ८ ।।

अर्थात्—जिनका मुख घुंघराली अलकों से सुशोभित है, मस्तक पर मणिमय मुकुट शोभा दे रहा है तथा कपोलों पर कुण्डल सुशोभित हो रहे हैं; उज्ज्वल हार, बाजूबन्द, कंकण और किंकणी से सुशोभित उन मंजुलमूर्ति श्रीश्यामसुन्दर को मैं भजता हूँ ।
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🍁अच्युताष्टकं य: पठेदिष्टदं
प्रेमत: प्रत्यहं पूरुष: सस्पृहम् ।
वृत्तत: सुन्दरं कर्तृविश्वम्भर-
स्तस्य वश्यो हरिर्जायते सत्वरम् ।। ९ ।।

अर्थात्—जो मनुष्य इस अति सुन्दर छन्द वाले और मनवांछित फल देने वाले अच्युताष्टक को प्रेम और श्रद्धा से नित्य पढ़ता है, विश्वम्भर विश्वकर्ता श्रीहरि शीघ्र ही उसके वशीभूत हो जाते हैं ।
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नामों का पाठ मंगलकारी, मनवांछित फल देने वाला, दु:ख-दारिद्रय, रोग व ऋण को दूर करने वाला और आयु व संतान को देने वाला माना गया है ।
जिन पापों की शुद्धि के लिए कोई उपाय नहीं, उनके लिए भगवान के नामों के स्तोत्र का पाठ करना सबसे अच्छा साधन है । 
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Monday, 17 June 2024

बटुक भैरव स्तोत्र - सभी समस्याओं का हल

#बटुकभैरव
       समस्याओं के निराकरण के लिए तन्त्र ग्रन्थों में 'बटुक भैरव साधना' को स्पष्ट किया गया है। यह भी कहा गया है कि जो बटुक भैरव स्तोत्र का मात्र एक बार पाठ हर रोज कर लेता है उसके जीवन में किसी प्रकार का कोई अभाव या कष्ट व्याप्त नहीं होता ।

1. स्वयं के या परिवार के किसी सदस्य को रोग होना ।
2. घर में मतभेद या पारिवारिक कलह होना । 
3. मुकदमें में परेशानी होना या हार की संभावना अनुभव होना। 
4. शत्रुओं से परेशानी या जीवन को खतरा अनुभव करना।
5. दरिद्रता से अत्यधिक ग्रस्त और पीड़ित होना। 
6. घर में आकस्मिक बाधाएं, अड़चनें या कठिनाइयां उत्पन्न होना।
7. राज्यभय की आशंका या राज्यभय होना । 
8. किसी भी प्रकार की समस्या का उपस्थित होना।

साधना रहस्य:-  यह साधना विधि सदगुरुदेव भगवान ने अत्यंत कृपापूर्वक प्रदान की है जिसके द्वारा मात्र 24 घंटों में किसी भी समस्या का निवारण संभव है।

इस साधना को पुरुष या स्त्री कोई भी सम्पन्न कर सकता है। यदि साधक किसी भी प्रकार की विपत्ति या परेशानी अनुभव करता है तो उसे चाहिए कि वह रात्रि को लाल वस्त्र धारण कर अपने सामने मन्त्र सिद्ध प्राणप्रतिष्ठा युक्त रुद्रयामल तन्त्र से अनुप्राणित 'भैरव यन्त्र को सामने लाल वस्त्र बिछाकर स्थापित कर दें और मंगलवार की रात को ही तेल का दीपक लगाकर इस स्तोत्र के मात्र 51 पाठ सम्पन्न कर लें तो प्रातःकाल होते-होते चमत्कारिक अनुभव होने लगते हैं और वह समस्या मात्र 24 घण्टों में ही हल हो जाती है अथवा बाधा निवारण का मार्ग दिखने लगता है।बेहतर होगा कि पूर्ण सफलता प्राप्ति तक आप इस साधना प्रयोग को करते रहें।

यह एक दिन की साधना है और इसमें कोई लम्बा-चौड़ा विधि-विधान नहीं है। केवल मात्र मंगलवार की रात्रि को सामने भैरव यन्त्र रख, तेल का दीपक लगाकर, लाल वस्त्र धारण कर दक्षिण दिशा की ओर मुंह कर लाल आसन पर बैठ जायं और यन्त्र के सामने गुड़ का भोग लगा दें जो कि 51पाठ सम्पन्न करने के बाद प्रात:काल घर के बाहर दक्षिण दिशा की ओर फेंक दें।
साधना विधि:- सबसे पहले हाथ में जल लेकर अपने मन की कामना उच्चारित करते हुए विनियोग करें। अर्थात् हाथ में जल लेकर अपनी समस्या बताकर जमीन पर जल छोड़ दें। इसके बाद करन्यास और षडंगन्यास कर मूल स्तोत्र के 51 पाठ सम्पन्न करें।

विनियोग:-अस्य श्रीबटुक भैरवनामाष्टशत काऽपदुद्धारण स्तोत्र मन्त्रस्य वृहदारण्यक ऋषि श्री बटुक भैरवो देवता। अनुष्टुप्छन्दः ह्रीं बीजम् बटुकायैति शक्तिः। प्रणव कीलकम अभीष्ट सिद्धयर्थं पाठे जपे विनियोगः ।।

करन्यास -
ह्रां वां अंगुष्ठाभ्यां नमः । 
ह्रीं वीं तर्जनीभ्यां स्वाहा। 
ह्रूं वूं मध्यमाभ्यां वषट् । 
ह्रैं वैं अनामिकाभ्यां हम्। 
ह्रौं वौं कनिष्ठिकाभ्यां वौषट् 
ह्रः वः करतलकरपृष्ठाभ्यां फट् । 
इति करन्यासः ।

षडंगन्यास -
ह्रां वां हृदयाय नमः। 
ह्रीं वीं शिरसे स्वाहा। 
ह्रूं वूं शिखायै वषट्। 
हैं वैं कवचाय हुम्। 
ह्रौं वौं नेत्रत्रयाय वौषट्। 
ह्र: वः अस्त्रायफट् 
इति षडंगन्यासः ।

नैवेद्य समर्पण -
ऐहये हि देवी पुत्र बटुकनाथ कपिलजटाभारभास्वर त्रिनेत्र ज्वालामुख सर्वविघ्नान्नाशायम 2 सर्वोपचार सहिता बलि ग्रहण्य ग्रहण्य स्वाहा। 

~ध्यान~
शातं पद्मासनस्थं शशिमुकुटधरे चेत्रतांगे त्रिनेत्रं । 
शूलं खड्गं च वज्रं परशुमुसलं दक्षिणांगे वहन्तम् । 
नागं पाशं च घंटां नलिनकरयुतं सांकुशं वामभागे 
नागालंकारयुक्त स्फटिकमणि निभ नौमितत्वं शिवाख्यम् ।।

मूल पाठ -
ओ३म् भैरवोभूतनाथश्च भूतात्मा भूतभावना । 
क्षेत्रज्ञ: क्षेत्रपालश्च क्षेत्रद क्षत्रियो विराट् ।।1।। 

श्मशानवासी मांसाशी खपराशी स्मरान्तकम् ।
रक्तपः पानपः सिद्धः सिद्धिदः सिद्धिसेवितः।।2।। 

कंकाल : कालशमन: कला काष्ठातनुः कविः । 
त्रिनेत्री बहुनेत्रश्च तथा पिंगललोचनम् ।।3।। 

शूलपाणिः खड्गपाणि कंकाली धूम्रलोचनः । 
अणभीरूभैरवी नाथो भूतपो योगिनी पतिः ।।4।। 

धनदा धनहारी च धनवान् प्रतिमानवान्। 
नागहारो नागपाशो व्योमकेश: कपालभृत्।।5।। 

काल : कपालमाली च कमनीयः कलानिधिः । 
त्रिलोचनो ज्वलन्नेत्रस्त्रिशिखा च त्रिलोकप:।।6।। 

त्रिनेत्रतनयो डिम्भ: शान्त: शान्तजन प्रियः । 
बटुको बहुवेषश्च खट्वांगवर धारकः ।।7।। 

भूताध्यक्ष : पशुपति भिक्षुकः परिचारक। 
धूतो दिगम्बरः शूरो हरिणः पाण्डुलोचन: ।।8।। 

प्रशान्त: शान्तिद: सिद्ध: शंकरः प्रियबान्धवः । 
अष्टमूर्तिर्निधीशश्च ज्ञानचक्षुस्तपोमयः ।।9।।
 
अष्टाधारः षडांधार: सर्प युक्त्तः शिखी सख: । भूधरो भूधराधीशो भूपतिर्भूधरात्मजः ।।10।। 

कंकालधारी मुण्डो च नागयज्ञोपवीतिक:। जृम्भणो मोहनः स्तम्भो मारणः क्षोभणस्तथा ।।11।। 

शुद्धो नीलाजनं दैत्यो दैत्यहा मुण्ड भूषितः । 
बलिभुग्बलिभंग: वैद्यवीर नाथी पराक्रमः ।।12।। 

सर्वापत्तारणो दुर्गा दुष्ट भूतनिवेदितः । 
कामी कलानिधिः कान्तः कामिनीवश कृद्वशी।।13।। 

सर्व सिद्धिप्रदो वैद्यः प्रभुर्विष्णुरितीव हि। 
अष्टोत्तरशतं नाम्नां भैरवस्य महात्मनः ।।14।। 

मयाते कथितं देवी रहस्य सार्वकामिकम्। 
य इदं पठत स्तोत्रं नामाष्टशतमुत्तमम् ।।15।।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

Tuesday, 11 June 2024

#मंगलवार तथा #हनुमान जी के #शीघ्र #फलदाई #मंत्र

मंगलवार का विशेष उपाय
बनता काम बिगड़ता हो,लाभ न हो रहा हो या कोई भी परेशानी हो तो हर मंगलवारको हनुमानजीके चरणोंमें बदाना(मीठीबूंदी)चढाकर उसी प्रसाद को मंदिर के बाहर गरीबों में बांटदें!और मंगलवार को ही,शाम के समय, हनुमान जी के सामने देशीघी का दीपक जलाकर हनुमान चालीसा का पाठ करें।

हनुमान जी के मंत्र

1. 'ॐ दक्षिणमुखाय पञ्चमुखाय हनुमते करालबदनाय नमः। 
आने वाली विपत्तियों और परेशानियों का सामना करने की शक्ति पाने के लिए इस मंत्र का जाप किया जाता है।

2. 'नारसिंहाय ॐ हां हीं हूं हौं हः सकलभूत प्रेतदमनाय स्वाहा।'
भूत प्रेत जैसी बाधाओं से छुटकारा पाने के लिए हनुमान जी के इस मंत्र का जाप किया जाता है।

3. 'ॐ पूर्वकपि मुखाय पञ्चमुख हनुमते टं टं टं टं टं सकल शत्रु सहंरणाय स्वाहा।'
दुश्मनोंकी चालों से बचने के लिए इस मंत्र का जाप करना चाहिए.

4. 'ॐ हं हनुमते नम:।' 
परमशक्तिशाली हनुमानजी की कृपा पाने के लिए लोग इस मंत्र का जाप करते है. इस मंत्र का उचित ढंग से जाप करने पर हनुमान जी शीघ्र प्रसन्न होते हैं।

5. ' ॐ हं हनुमते रुद्रात्मकायं हुं फट्।' 
अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए इस मंत्र का जाप किया जाता है. शनिवार के दिन शुद्ध होकर सात्विक मन से कम से कम 108 बार इस मंत्र का स्फटिक की माला से जाप करें. हनुमानजी शीघ्र प्रसन्न होकर मनोकामना पूर्ण करेंगे।

6. 'ॐ हं पवननन्दनाय स्वाहा।'
घरमें सुख, शांति, और खुशहाली लाने के लिए इस मंत्र का जाप करना चाहिए. हनुमान जी प्रभु श्री राम का नाम लेकर हर परिस्थिति में प्रसन्न रहते है. हमें अपने जीवन में वैसी ही प्रसन्नता का संचार करने के लिए बजरंगबली पर पूर्ण विश्वास के साथ इस मंत्र का जाप करना चाहिए।

7. 'ॐ नमो भगवते आंजनेयाय महाबलाय स्वाहा।'
 अगर कोई असाध्य रोग हो, या किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे हो, वंशानुगत रोग हो, या अन्य किसी किसी प्रकार का रोग हो, तो यह मंत्र अत्यंत फलदायक होता है. शुद्ध शरीर और मन से इसका जाप करने से उचित परिणाम मिलते है।

8. 'ॐ नमो हरि मर्कट मर्कटाय स्वाहा।'
अगर शत्रु (दुश्मन) बलशाली हो गया हो, अगर उसकी शक्ति आपसे ज्यादा हो गई हो, तो इस मंत्र का जाप करके आप अपने बल को शत्रु से ज्यादा बढ़ा सकते हो. इस मंत्र का जाप करने से पहले आप यह तय कर लें कि आपका रास्ता अन्याय का ना हो. महाबली हनुमानजी को सत्य और न्याय का मार्ग प्रिय है।

प्रेम से बोलो जय श्रीराम 


#तुलसी #स्तोत्रम् #पुंडरीक कृत

तुलसी स्तोत्रम्‌      (हिंदी अर्थ सहित) # Shri # Tulsi # Stotram      (With Hindi meaning) जगद्धात्रि नमस्तुभ्यं विष्णोश्च प्रियवल्लभे । यतो...