Saturday, 23 May 2026

#आत्मबोध

मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि वह स्वयं को खोजने के लिए पूरी दुनिया में भटकता है, जबकि जिसे वह खोज रहा है, वह उसके अपने अस्तित्व के केंद्र में ही विराजमान है।
हम बाहर मंदिरों, तीर्थों, ग्रंथों और व्यक्तियों में उस सत्य को तलाशते हैं, जिसे केवल भीतर की निस्तब्धता में अनुभव किया जा सकता है।
हमारा पूरा जीवन एक ऐसे “मैं” को बचाने में बीत जाता है, जो वास्तव में कभी था ही नहीं।
यह “मैं” केवल विचारों, स्मृतियों, उपलब्धियों, संबंधों और अहंकार का बनाया हुआ एक मुखौटा है। धीरे-धीरे हम इस मुखौटे को ही अपना चेहरा मान लेते हैं और वहीं से दुःख, भय और अलगाव की शुरुआत होती है।
सत्य यह है कि सदगुरुदेव कभी हमसे दूर नहीं हैं।
दूरी केवल हमारे अहंकार की है।
हमारे और परम चेतना के बीच कोई दूसरा पर्दा नहीं, केवल हमारा स्वयं का बनाया हुआ भ्रम खड़ा है।
जब तक भीतर “मैं” की आवाज गूंजती रहती है, तब तक दिव्यता का संगीत सुनाई नहीं देता।
लेकिन जिस क्षण यह झूठा अहंकार शांत हो जाता है, उसी क्षण भीतर का द्वार खुल जाता है। तब पता चलता है कि जिसे पाने के लिए हम भटक रहे थे, वह तो सदा से हमारे भीतर ही था।
आध्यात्मिक यात्रा किसी नई वस्तु को प्राप्त करने की यात्रा नहीं है।
यह स्वयं से झूठ हटाने की प्रक्रिया है।
यह कुछ बनने की नहीं, बल्कि उस सबको मिटाने की साधना है जो हम वास्तव में नहीं हैं।
बूंद जब तक अपनी अलग पहचान पर गर्व करती है, तब तक वह सीमित रहती है।
पर जिस क्षण वह सागर में समर्पित होती है, उसी क्षण उसकी सीमाएँ समाप्त हो जाती हैं। तब वह बूंद नहीं रहती—स्वयं सागर बन जाती है।
ठीक वैसे ही, जब मनुष्य अपने अहंकार, अपनी झूठी धारणाओं और अपने सीमित “मैं” को समर्पित कर देता है, तब उसके भीतर अनंत चेतना प्रकट होती है।
वहीं शांति है, वहीं मुक्ति है, वहीं सदगुरुदेव का वास्तविक अनुभव है।
स्वयं को खो देना हार नहीं है।
वास्तव में वही सबसे बड़ी जीत है।
क्योंकि जब “मैं” मिटता है, तभी सत्य प्रकट होता है।

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