Saturday, 25 May 2024

#नारदजयंती

#नारदजयंती 
भगवान की भक्ति प्राप्त करने का यह सबसे श्रेष्ठ दिवस माना जाता है । 
इस दिन नारायण नाम का जप करें -
"जप मंत्र" 
१_ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
२_ॐ नमो नारायणय।
३_ॐ ह्रीं ह्रीं श्रीं श्रीं लक्ष्मी वासुदेवाय नम:!

       हिन्दूपंचांग के अनुसार, प्रतिवर्ष ज्येष्ठमाह में कृष्णपक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाई जाती है।
नारद मुनि के एक हाथ में वीणा है और दूसरे हाथ में भी वाद्य यंत्र है. ऋषि नारद मुनि प्रकाण्ड विद्वान थे। वह हर समय नारायण-नारायण का जप किया करते हैं। नारायण विष्णु भगवान का ही एक नाम है। 
 नारद मुनि को देवताओं का संदेशवाहक कहा जाता है. वह तीनों लोकों में संवाद का माध्यम बनते थे। ऋषि नारद मुनि भगवान विष्णु के अनन्य भक्त और परमपिता ब्रह्मा जी की मानस संतान माने जाते हैं। ऋषि नारद भगवान नारायण के भक्त हैं, जो भगवान विष्णु जी के रूपों में से एक हैं।
धार्मिक मान्यता है कि इस दिन नारद जी की पूजा आराधना करने से भक्‍तों को बल, बुद्धि और सात्विक शक्ति की प्राप्ति होती है।
पौराणिक कथा के अनुसार, नारद मुनि ब्रह्माजी के मानस पुत्र हैं।

ब्रह्माजी का मानस पुत्र बनने के लिए उन्होंने पिछले जन्म में कड़ी तपस्या की थी। कहा जाता है कि पूर्व जन्म में नारद मुनि गंधर्व कुल में पैदा हुए थे और और उन्हें अपने रूप पर बहुत ही घमंड था।पूर्व जन्म में उनका नाम उपबर्हण था। एक बार कुछ अप्सराएं और गंधर्व गीत और नृत्य से भगवान ब्रह्मा की उपासना कर रही थीं।तब उपबर्हण स्त्रियों के साथ श्रृंगार भाव से वहां आए। ये देख ब्रह्माजी अत्यंत क्रोधित हो उठे और उपबर्हण को श्राप दे दिया कि वह 'शूद्र योनि' में जन्म लेगा।

ब्रह्माजी के श्राप से उपबर्हण का जन्म एक शूद्र दासी के पुत्र हरिदास के रूप में हुआ। वे सन्तों की सेवा में लगे रहे तभी एक संत गुरु ने उन्हें मंत्र दिया। 

विशेष मंत्र:-ॐ नमो भगवते तुभ्यं वासुदेवाय धीमहि प्रधुम्मनायनिरूद्धाय नमः संकर्षणाय च।।
 
बालक ने अपना पूरा जीवन ईश्वर की भक्ति में लगाने का संकल्प लिया और ईश्वर को जानने और उनके दर्शन करने की इच्छा पैदा हुई।बालक के लगातार तप के बाद एक दिन अचानक बाल कृष्ण की झलक दिखी और आकाशवाणी हुई, 

हे बालक! इस जन्म में आपको भगवान के दर्शन दुबारा नहीं होंगे बल्कि अगले जन्म में आप उनके पार्षद के रूप उन्हें एक बार फिर प्राप्त कर सकेंगे।और 

भगवान केे पार्षद बने।और उनको वीणा उपहार में प्राप्त हुई। तव से सभी लोकों में भ्रमण  करते हुए नारायण नारायण की ध्वनि करते भगवान का संदेश दे ते रहते हैं।

नारद जी की वीणा के स्वर,भक्ति रस के रहस्य से युक्त हैं। आजके दिन श्री भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण के मंदिर में एक बांसुरी जरूर भेट करें। गीता में भगवान ने कहा है "देवर्षिणाम् च नारद" २४ अवतारों में नारद जी भी आते हैं। वे अपनी वीणा बजाते हरि नाम का संकीर्तन करते हुए भक्ति रस के संगीत से तीनों लोकों के जीवों को तारने का कार्य करते हैं । 
#नारद जयंती की पूजा-विधि
        स्नान करने के बाद चाहे तो व्रत का संकल्प करें, नहीं तो साफ-सुथरा वस्त्र पहन कर पूजा-अर्चना करें। नारद मुनि को चंदन, तुलसी के पत्ते, कुमकुम, अगरबत्ती, फूल अर्पित करें। शाम को पूजा करने के बाद, भक्त भगवान विष्णु की आरती करें। दान पुण्य का कार्य करें। गरीब ब्राह्मणों को भोजन कराएं और उन्हें कपड़े और अन्न दान करें।
कहा जाता कि वाल्मीकि जी को रामायण लिखने की प्रेरणा और वेद्व्यास जी को देवीभागवत की रचना करने की प्ररेणा भी नारद जी ने ही दी थी । ध्रुव और प्रह्लाद, राजा अम्बरीष को भक्ति मार्ग का उपदेश, भक्ति के रहस्य और सूत्र भी बताये थे । 
 
     ।।ॐ नमो नारदाय !!

Monday, 20 May 2024

महाराज प्रह्लाद कृत ब्रह्मांड पुराण में वर्णित नरसिंह कवच

महाराज प्रह्लाद कृत ब्रह्मांड पुराण में वर्णित नरसिंह कवच

नरसिंह कवच सभी मंत्रों (मंत्र-राज) का राजा है। इस कवच के उच्चारण से ही अति शुभ और अति शीघ्र फल मिलता है !

#श्रीनरसिंहकवच !!

विनयोग-
ॐ अस्य श्रीलक्ष्मीनृसिंह कवच महामंत्रस्य ब्रह्माऋिषः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीनृसिंहोदेवता, ॐक्षौ बीजम्, ॐ रौं शक्तिः, ॐ ऐं क्लीं कीलकम्
मम सर्वरोग, शत्रु, चौर, पन्नग, व्याघ्र, वृश्चिक, भूत-प्रेत, पिशाच, डाकिनी शाकिनी, यन्त्र मंत्रादि, सर्व विघ्न निवाराणार्थे श्री नृसिहं कवचमहामंत्र जपे विनयोगः।।
एक आचमन जल छोड़ दें।

अथ ऋष्यादिन्यास –
ॐ ब्रह्माऋषये नमः शिरसि।
ॐ अनुष्टुप् छन्दसे नमो मुखे।
ॐ श्रीलक्ष्मी नृसिंह देवताये नमो हृदये।
ॐ क्षौं बीजाय नमोनाभ्याम्।
ॐ शक्तये नमः कटिदेशे।
ॐ ऐं क्लीं कीलकाय नमः पादयोः।
ॐ श्रीनृसिंह कवचमहामंत्र जपे विनयोगाय नमः सर्वाङ्गे॥

अथ करन्यास –
ॐ क्षौं अगुष्ठाभ्यां नमः।
ॐ प्रौं तर्जनीभ्यां नमः।
ॐ ह्रौं मध्यमाभयां नमः।
ॐ रौं अनामिकाभ्यां नमः।
ॐ ब्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
ॐ जौं करतलकर पृष्ठाभ्यां नमः।

अथ हृदयादिन्यास –
ॐ क्षौ हृदयाय नमः।
ॐ प्रौं शिरसे स्वाहा।
ॐ ह्रौं शिखायै वषट्।
ॐ रौं कवचाय हुम्।
ॐ ब्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्।
ॐ जौं अस्त्राय फट्।

नृसिंह ध्यान –
ॐ सत्यं ज्ञान सुखस्वरूप ममलं क्षीराब्धि मध्ये स्थित्।
योगारूढमति प्रसन्नवदनं भूषा सहस्रोज्वलम्।

तीक्ष्णं चक्र पीनाक शायकवरान् विभ्राणमर्कच्छवि।
छत्रि भूतफणिन्द्रमिन्दुधवलं लक्ष्मी नृसिंह भजे॥

कवच पाठ –
ॐ नमोनृसिंहाय सर्वदुष्ट विनाशनाय सर्वंजन मोहनाय सर्वराज्यवश्यं कुरु कुरु स्वाहा।

ॐ नमो नृसिंहाय नृसिंहराजाय नरकेशाय नमो नमस्ते। ॐ नमः कालाय काल द्रष्ट्राय कराल वदनाय च।

ॐ उग्राय उग्र वीराय उग्र विकटाय उग्र वज्राय वज्र देहिने रुद्राय रुद्र घोराय भद्राय भद्रकारिणे ॐ ज्रीं ह्रीं नृसिंहाय नमः स्वाहा !!

ॐ नमो नृसिंहाय कपिलाय कपिल जटाय अमोघवाचाय सत्यं सत्यं व्रतं महोग्र प्रचण्ड रुपाय।

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं ॐ ह्रुं ह्रुं ह्रुं ॐ क्ष्रां क्ष्रीं क्ष्रौं फट् स्वाहा।

ॐ नमो नृसिंहाय कपिल जटाय ममः सर्व रोगान् बन्ध बन्ध, सर्व ग्रहान बन्ध बन्ध, सर्व दोषादीनां बन्ध बन्ध, सर्व वृश्चिकादिनां विषं बन्ध बन्ध, सर्व भूत प्रेत, पिशाच, डाकिनी शाकिनी, यंत्र मंत्रादीन् बन्ध बन्ध, कीलय कीलय चूर्णय चूर्णय, मर्दय मर्दय, ऐं ऐं एहि एहि, मम येये विरोधिन्स्तान् सर्वान् सर्वतो हन हन, दह दह, मथ मथ, पच पच, चक्रेण, गदा, वज्रेण भष्मी कुरु कुरु स्वाहा।

ॐ क्लीं श्रीं ह्रीं ह्रीं क्ष्रीं क्ष्रीं क्ष्रौं नृसिंहाय नमः स्वाहा। ॐ आं ह्रीं क्ष्रौं क्रौं ह्रुं फट्।

ॐ नमो भगवते सुदर्शन नृसिंहाय मम विजय रुपे कार्ये ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल असाध्यमेनकार्य शीघ्रं साधय साधय एनं सर्व प्रतिबन्धकेभ्यः सर्वतो रक्ष रक्ष हुं फट् स्वाहा।

ॐ क्षौं नमो भगवते नृसिंहाय एतद्दोषं प्रचण्ड चक्रेण जहि जहि स्वाहा।
ॐ नमो भगवते महानृसिंहाय कराल वदन दंष्ट्राय मम विघ्नान् पच पच स्वाहा।

ॐ नमो नृसिंहाय हिरण्यकश्यप वक्षस्थल विदारणाय त्रिभुवन व्यापकाय भूत-प्रेत पिशाच डाकिनी-शाकिनी कालनोन्मूलनाय मम शरीरं स्तम्भोद्भव समस्त दोषान् हन हन, शर शर, चल चल, कम्पय कम्पय, मथ मथ, हुं फट् ठः ठः।

ॐ नमो भगवते भो भो सुदर्शन नृसिंह ॐ आं ह्रीं क्रौं क्ष्रौं हुं फट्।
ॐ सहस्त्रार मम अंग वर्तमान ममुक रोगं दारय दारय दुरितं हन हन पापं मथ मथ आरोग्यं कुरु कुरु ह्रां ह्रीं ह्रुं ह्रैं ह्रौं ह्रुं ह्रुं फट् मम शत्रु हन हन द्विष द्विष तद पचयं कुरु कुरु मम सर्वार्थं साधय साधय।

ॐ नमो भगवते नृसिंहाय ॐ क्ष्रौं क्रौं आं ह्रीं क्लीं श्रीं रां स्फ्रें ब्लुं यं रं लं वं षं स्त्रां हुं फट् स्वाहा।

ॐ नमः भगवते नृसिंहाय नमस्तेजस्तेजसे अविराभिर्भव वज्रनख वज्रदंष्ट्र कर्माशयान् रंधय रंधय तमो ग्रस ग्रस ॐ स्वाहा।

अभयमभयात्मनि भूयिष्ठाः ॐ क्षौम्।
ॐ नमो भगवते तुभ्य पुरुषाय महात्मने हरिंऽद्भुत सिंहाय ब्रह्मणे परमात्मने।

ॐ उग्रं उग्रं महाविष्णुं सकलाधारं सर्वतोमुखम्।
नृसिंह भीषणं भद्रं मृत्युं मृत्युं नमाम्यहम्।
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नरसिंह कवच मंत्र से लाभ-
      नरसिंह कवच दुनिया में बुराई और अत्याचार के खिलाफ अंतिम सुरक्षा है। इस नरसिंह कवच को स्मरण करने से भक्तों को किसी भी नुकसान से बचा जा सकता है और एक सुरक्षित,स्वस्थ और शांत और सामान्य जीवन प्रदान करता है।

नरसिंह कवच मंत्र भक्तों के कल्याण की रक्षा के लिए एक सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करता है। यह एक सर्व अपारदर्शिता पर आधारित है और स्वर्गीय ग्रहों या मुक्ति के लिए या जीवन के उत्थान के लिए सहायक है । इसका जाप करते हुए ब्रह्मांड के भगवान नरसिंह का ध्यान करना चाहिए, जो एक स्वर्ण सिंहासन पर बैठा है।

वह विजयी हो जाता है ,जो जीत की इच्छा रखता है, और वास्तव में एक विजेता बन जाता है। यह कवच सभी ग्रहों के उलटे प्रभाव को खत्म करता है और समाज में प्रतिष्ठा दिलवाता है !

यह नागों और बिच्छुओं के जहरीले प्रभाव के लिए सर्वोच्च उपाय है, इसके पाठ करने से भूत प्रेत और यमराज भी दूर चले जाते है।

जो नियमित रूप से इस प्रार्थना का जप करता है, चाहे एक या तीन बार (दैनिक), वह विजयी हो जाता है चाहे वह राक्षसों,दुश्मनों या मनुष्यों के बीच हो। हर प्रकार से रक्षा करता है !

वह व्यक्ति, जो इस मंत्र का पाठ करता है, भगवान नरसिंह देव का ध्यान करता है, उसके पेट के रोग सहित उसके सभी रोग समाप्त हो जाते हैं।
 एक सुरक्षा कवच या आध्यात्मिक कवच है।संरक्षण पाने के लिए बहुत शक्तिशाली एवं चमत्कारी है।
यह बुरी आत्माओं से सुरक्षा और भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के साथ-साथ भक्ति और शांति में वृद्धि के लिए मंत्र है।
नरसिंह कवच का जप एक व्यक्ति की व्यक्तिगत कुंडली के अंदर की नकारात्मक ऊर्जा और कर्म संरचनाओं को शुद्ध करता है और सभी प्रकार की शुभता को प्रकट करता है।
जो व्यक्ति इसका नियमित जप करता है, वह काले जादू, तंत्र, भूत, आत्माओं, नकारात्मक विचारों, व्यसनों और अन्य हानिकारक चीजों से छुटकारा पाता है।
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Friday, 8 March 2024

#अघोरेश्वर_महादेव_साधना

#अघोरेश्वर #महादेव #साधना
#अघोर #मंत्र :-
ॐ नमः शिवाय महादेवाय नीलकंठाय आदि रुद्राय अघोरमंत्राय अघोर रुद्राय अघोर भद्राय सर्वभय हराय मम सर्व कार्यफल प्रदाय हन हनाय ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ टं टं टं टं टं घ्रीं घ्रीं घ्रीं घ्रीं घ्रीं हर हराय सर्व अघोररुपाय त्र्यम्बकाय विरुपाक्षाय ॐ ह्रौं ह्रः ह्रीं ह्रः ग्रं ग्रं ग्रं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः क्षां क्षीं क्षूं क्षैं क्षौं क्षः ॐ नमः शिवाय अघोरप्रलयप्रचंड रुद्राय अपरिमित वीरविक्रमाय अघोररुद्रमंत्राय सर्वग्रह उच्चाटनाय सर्वजनवशीकरणाय सर्वतोमुख मां रक्ष रक्ष शीघ्रं हूं फट् स्वाहा ।
ॐ क्षां क्षीं क्षूं क्षैं क्षौं क्षः ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः स्वर्गमृत्यु पाताल त्रिभुवन संच्चरित देव ग्रहाणां दानव ग्रहाणां ब्रह्मराक्षस ग्रहाणां सर्ववातग्रहाणां सर्व वेताल ग्रहाणां शाकिनी ग्रहाणां डाकिनी ग्रहाणां सर्व भूत ग्रहाणां कामिनी ग्रहाणां सर्व पिंड ग्रहाणां सर्व दोष ग्रहाणां सर्वपस्मारग्रहाणां हन हन हन भक्षय भक्षय भक्षय विरूपाक्षाय दह दह दह हूं फट् स्वाहा ॥
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अपने हाथ में धतूरे का फल या 11 बेलपत्र लेकर इस मन्त्र को आप एक बार करें। मंत्र पूरा हो जाने के बाद अपनी इच्छा बोलते हुए वह शिवलिंग के ऊपर समर्पित कर दें। बाद में इसे जल में विसर्जित करें।  
भगवान शिव का विशेष मंत्र है इसलिए किसी गलत इच्छा के लिए इसका प्रयोग नहीं करेंगे अन्यथा आप को नुकसान हो सकता है । 
       अपनी रक्षा या अपने ऊपर किसी प्रकार की तंत्र बाधा या किए कराए का शक हो तो आप इस प्रयोग को हर सोमवार एवं चतुर्दशी संपन्न करें, आपको अनुकूलता प्राप्त होगी। 
या शिव रात्रि में 108 बार करें। 
कोई नियम विधि बंधन नहीं। उन्मुक्त क्रोध और काम दोनों से बचें। 







Wednesday, 7 February 2024

#षोडशी #श्रीमहात्रिपुरसुन्दरी #सहस्रनाम #स्तोत्रम्

#षोडशीश्रीमहात्रिपुरसुन्दरी_सहस्रनामस्तोत्रम्!! 
       वामकेश्वर तंत्र में वर्णित यह षोडशी सहस्रनाम स्तोत्र अति दुर्लभ है जो भी मनुष्य जिस कामना पूर्ति के निमित्त इस स्तोत्र का पाठ करता है उसकी वह कामना अवश्य पूरी होती है। 
यह स्तोत्र स्वयं भगवान शिव ने पार्वती पुत्र कार्तिकेय को तब बताया था जब कार्तिकेय ने उनसे पूछा कि ऐसी कौन सी साधना है इसके द्वारा सभी सिद्धियां मोक्ष तीर्थ फल यज्ञ फल आदि की लब्धि बिना कठोर तप आदि किये बिना ही प्राप्ति हो जाती है इस कारण इस सहस्र नाम का विशेष महत्व है। 

विनियोग:- ॐ अस्य श्रीमहात्रिपुर सुन्दरी सहस्रनाम स्तोत्र मन्त्रस्य श्रीभगवान् दक्षिणा मूर्ति ऋषिः जगती छन्दः समस्त प्रकट गुप्त सम्प्रदाय कुल कौलोत्तीर्ण निर्गर्भ रहस्याचिन्त्य प्रभावती देवता ओम्बीजम् मायाशक्तिः कामराजबीज कीलकम् जीवो बीजम् सुषुम्ना नाडी सरस्वती शक्तिर्धर्मार्थकाम मोक्षार्थे जपे विनियोगः ॥
                      ।।ध्यानम्।। 
आधारे तरुणार्कबिम्बरुचिरं हेमप्रभम्वाग्भवम्। 
बीजं मन्मथमिन्द्रगोपसदृशं हृत्पंकजे संस्थितम्॥

विष्णुब्रह्मपदस्थशक्तिकलितं सोमप्रभा भासुरं ये। 
ध्यायन्ति पदत्रयं तव शिवे ते यान्ति सौख्यं पदम्॥
                ।।अथ सहस्रनाम।। 
कल्याणी कमला काली कराली कामरूपिणी ।
कामाख्या कामदा काम्या कामना कामचारिणी ॥

कालरात्रिर्महारात्रिः कपाली कालरूपिणी ।
कौमारी करुणामुक्तिः कलिकल्मषनाशिनी ॥

कात्यायनी कराधारा कौमुदी कमलप्रिया ।
कीर्तिदा बुद्धिदा मेधा नीतिज्ञा नीतिवत्सला ॥

माहेश्वरी महामाया महातेजा महेश्वरी ।
महाजिह्वा महाघोरा महादंष्ट्रा महाभुजा॥

महामोहान्धकारघ्नी महामोक्षप्रदायिनी।
महादारिद्र्यनाशा च महाशत्रुविमर्द्दिनी ॥

महामाया महावीर्या महापातकनाशिनी।
महामखा मन्त्रमयी मणिपूरकवासिनी ॥

मानसी मानदा मान्या मनश्चक्षू रणेचरा ।
गणमाता च गायत्री गणगन्धर्वसेविता ॥

गिरिजा गिरिशा साध्वी गिरिस्था गिरिवल्लभा ।
चण्डेश्वरी चण्डरूपा प्रचण्डा चण्डमालिनी ॥

चर्विका चर्चिकाकारा चण्डिका चारुरूपिणी।
यज्ञेश्वरी यज्ञरूपा जपयज्ञपरायणा॥

यज्ञमाता यज्ञभोक्त्री यज्ञेशी यज्ञसम्भवा।
सिद्धयज्ञक्रियासिद्धिर्यज्ञाङ्गी यज्ञरक्षिका॥

यज्ञक्रिया यज्ञरूपा यज्ञाङ्गी यज्ञरक्षिका ।
यज्ञक्रिया च यज्ञा च यज्ञायज्ञ क्रियालया॥

जालन्धरी जगन्माता जातवेदा जगत्प्रिया ।
जितेन्द्रिया जितक्रोधा जननी जन्मदायिनी ॥

गङ्गा गोदावरी चैव गोमती च शतद्रुका ।
घर्घरा वेदगर्भा च रेचिका समवासिनी ॥

सिन्धुर्मन्दाकिनी क्षिप्रा यमुना च सरस्वती ।
भद्रा रागविपाशा च गण्डकी विन्ध्यवासिनी ॥

नर्मदा सिन्धु कावेरी वेत्रवत्या सुकौशिकी ।
महेन्द्रतनया चैव अहल्या चर्मकावती ॥

अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका ।
पुरी द्वारावती तीर्था महाकिल्बिषनाशिनीइ ॥

पद्मिनी पद्ममध्यस्था पद्मकिञ्जल्कवासिनी ।
पद्मवक्त्रा चकोराक्षी पद्मस्था पद्मसम्भवा ॥

ह्रीङ्कारी कुण्डलीधारी हृत्पद्मस्था सुलोचना ।
श्रीङ्कारीभूषणा लक्ष्मीः क्लीङ्कारी क्लेशनाशिनी ॥

हरिवक्त्रोद्भवा शान्ता हरिवक्त्रकृतालया ।
हरिवक्त्रोद्भवा शान्ता हरिवक्षस्थलस्थिता ॥

वैष्णवी विष्णुरूपा च विष्णुमातृस्वरूपिणी ।
विष्णुमाया विशालाक्षी विशालनयनोज्ज्वला ॥

विश्वेश्वरी च विश्वात्मा विश्वेशी विश्वरूपिणी ।
विश्वेश्वरी शिवाराध्या शिवनाथा शिवप्रिया ॥

शिवमाता शिवाख्या च शिवदा शिवरूपिणी ।
भवेश्वरी भवाराध्या भवेशी भवनायिका ॥

भवमाता भवगम्या भवकण्टकनाशिनी ।
भवप्रिया भवानन्दा भवानी भवमोहिनी ॥

गायत्री चैव सावित्री ब्रह्माणी ब्रह्मरूपिणी ।
ब्रह्मेशी ब्रह्मदा ब्रह्मा ब्रह्माणी ब्रह्मवादिनी ॥

दुर्गस्था दुर्गरूपा च दुर्गा दुर्गार्तिनाशिनी ।
सुगमा दुर्गमा दान्ता दया दोग्ध्री दुरापहा ॥

दुरितघ्नी दुराध्यक्षा दुरा दुष्कृतनाशिनी ।
पञ्चास्या पञ्चमी पूर्णा पूर्णपीठनिवासिनी ॥

सत्त्वस्था सत्त्वरूपा च सत्त्वस्था सत्त्वसम्भवा ।
रजस्स्था च रजोरूपा रजोगुणसमुद्भवा ॥

तमस्स्था च तमोरूपा तामसी तामसप्रिया ।
तमोगुणसमुद्भूता सात्त्विकी राजसी कला ॥

काष्ठा मुहूर्ता निमिषा अनिमेषा ततः परम् ।
अर्द्धमासा च मासा च सँवत्सरस्वरूपिणी ॥

योगस्था योगरूपा च कल्पस्था कल्परूपिणी ।
नानारत्नविचित्राङ्गी नानाभरणमण्डिता ॥

विश्वात्मिका विश्वमाता विश्वपाशविनाशिनी ।
विश्वासकारिणी विश्वा विश्वशक्तिविचारणा ॥

यवाकुसुमसङ्काशा दाडिमीकुसुमोपमा ।
चतुरङ्गी चतुर्बाहुश्चतुराचारवासिनी ॥

सर्वेशी सर्वदा सर्वा सर्वदा सर्वदायिनी ।
माहेश्वरी च सर्वाद्या शर्वाणी सर्वमङ्गला ॥

नलिनी नन्दिनी नन्दा आनन्दा नन्दवर्द्धिनी ।
व्यापिनी सर्वभूतेषु शवभारविनाशिनी ॥

सर्वश‍ृङ्गारवेषाढ्या पाशाङ्कुशकरोद्यता ।
सूर्यकोटिसहस्राभा चन्द्रकोटिनिभानना ॥

गणेशकोटिलावण्या विष्णुकोट्यरिमर्दिनी ।
दावाग्निकोटिनलिनी रुद्रकोट्युग्ररूपिणी ॥

समुद्रकोटिगम्भीरा वायुकोटिमहाबला ।
आकाशकोटिविस्तारा यमकोटिभयङ्करी ॥

मेरुकोटिसमुच्छ्राया गणकोटिसमृद्धिदा ।
निष्कस्तोका निराधारा निर्गुणा गुणवर्जिता ॥

अशोका शोकरहिता तापत्रयविवर्जिता ।
वसिष्ठा विश्वजननी विश्वाख्या विश्ववर्द्धिनी ।
चित्रा विचित्रचित्राङ्गी हेतुगर्भा कुलेश्वरी ।
इच्छाशक्तिर्ज्ञानशक्तिः क्रियाशक्तिः शुचिस्मिता ॥

शुचिः स्मृतिमयी सत्या श्रुतिरूपा श्रुतिप्रिया ।
महासत्त्वमयी सत्त्वा पञ्चतत्त्वोपरिस्थिता ॥

पार्वती हिमवत्पुत्री पारस्था पाररूपिणी ।
जयन्ती भद्रकाली च अहल्या कुलनायिका ॥

भूतधात्री च भूतेशी भूतस्था भूतभावना ।
महाकुण्डलिनी शक्तिर्महाविभववर्द्धिनी ॥

हंसाक्षी हंसरूपा च हंसस्था हंसरूपिणी ।
सोमसूर्याग्निमध्यस्था मणिमण्डलवासिनी ॥

द्वादशारसरोजस्था सूर्यमण्डलवासिनी ।
अकलङ्का शशाङ्काभा षोडशारनिवासिनी ॥

डाकिनी राकिनी चैव लाकिनी काकिनी तथा ।
शाकिनी हाकिनी चैव षट्चक्रेषु निवासिनी ॥

सृष्टिस्थितिविनाशाय सृष्टिस्थित्यन्तकारिणी ।
श्रीकण्ठप्रियहृत्कण्ठा नन्दाख्या बिन्दुमालिनी ॥

चतुष्षष्टिकलाधारा देहदण्डसमाश्रिता ।
माया काली धृतिर्मेधा क्षुधा तुष्टिर्महाद्युतिः ॥

हिङ्गुला मङ्गला सीता सुषुम्नामध्यगामिनी ।
परघोरा करालाक्षी विजया जयदायिनी ॥

हृत्पद्मनिलया भीममहाभैरवनादिनी ।
आकाशलिङ्गसम्भूता भुवनोद्यानवासिनी ॥

महत्सूक्ष्मा च कङ्काली भीमरूपा महाबला ।
मेनकागर्भसम्भूता तप्तकाञ्चनसन्निभा ॥

अन्तरस्था कूटबीजा त्रिकूटाचलवासिनी ।
वर्णाख्या वर्णरहिता पञ्चाशद्वर्णभेदिनी ॥

विद्याधरी लोकधात्री अप्सरा अप्सरः प्रिया ।
दीक्षा दाक्षायणी दक्षा दक्षयज्ञविनाशिनी ॥

यशः पूर्णा यशोदा च यशोदागर्भसम्भवा ।
देवकी देवमाता च राधिका कृष्णवल्लभा ॥

अरुन्धती शचीन्द्राणी गान्धारी गन्धमालिनी ।
ध्यानातीता ध्यानगम्या ध्यानज्ञा ध्यानधारिणी ॥

लम्बोदरी च लम्बोष्ठी जाम्बवन्ती जलोदरी ।
महोदरी मुक्तकेशी मुक्तकामार्थसिद्धिदा ॥

तपस्विनी तपोनिष्ठा सुपर्णा धर्मवासिनी ।
वाणचापधरा धीरा पाञ्चाली पञ्चमप्रिया ॥

गुह्याङ्गी च सुभीमा च गुह्यतत्त्वा निरञ्जना ।
अशरीरा शरीरस्था संसारार्णवतारिणी ॥

अमृता निष्कला भद्रा सकला कृष्णपिङ्गला ।
चक्रप्रिया  च चक्राह्वा पञ्चचक्रादिदारिणी ॥

पद्मरागप्रतीकाशा निर्मलाकाशसन्निभा ।
अधःस्था ऊर्द्ध्वरूपा च ऊर्द्ध्वपद्मनिवासिनी ॥

कार्यकारण कर्तृत्वे शश्वद्रूपेषु संस्थिता ।
रसज्ञा रसमध्यस्था गन्धस्था गन्धरूपिणी ॥

प्रब्रह्मस्वरूपा च परब्रह्मनिवासिनी ।
शब्दब्रह्मस्वरूपा च शब्दस्था शब्दवर्जिता ॥

सिद्धिर्बुद्धिः पराबुद्धिः सन्दीप्तिर्मध्यसंस्थिता ।
स्वगुह्या शाम्भवीशक्तिस्तत्त्वस्था तत्त्वरूपिणी ॥

शाश्वती भूतमाता च महाभूताधिपप्रिया ।
शुचिप्रेता धर्मसिद्धिर्धर्मवृद्धिः पराजिता ॥

कामसन्दीपिणी कामा सदा कौतूहलप्रिया ।
जटाजूटधरा मुक्ता सूक्ष्मा शक्तिविभूषणा ॥

द्वीपिचर्मपरीधाना चीरवल्कलधारिणी ।
त्रिशूलडमरुधरा नरमालाविभूषणा ॥

अत्युग्ररूपिणी चोग्रा कल्पान्तदहनोपमा ।
त्रैलोक्यसाधिनी साध्या सिद्धिसाधकवत्सला ॥

सर्वविद्यामयी सारा चासुराणाविनाशिनी ।
दमनी दामनी दान्ता दया दोग्ध्री दुरापहा ॥

अग्निजिह्वोपमा घोरा घोरघोरतरानना ।
नारायणी नारसिंही नृसिंहहृदयेस्थिता ॥

योगेश्वरी योगरूपा योगमाता च योगिनी ।
खेचरी खचरी खेला निर्वाणपदसंश्रया ॥

नागिनी नागकन्या च सुवेशा नागनायिका ।
विषज्वालावती दीप्ता कलाशतविभूषणा ॥

तीव्रवक्त्रा महावक्त्रा नागकोटित्वधारिणी ।
महासत्त्वा च धर्मज्ञा धर्मातिसुखदायिनी ॥

कृष्णमूर्द्धा महामूर्द्धा घोरमूर्द्धा वरानना ।
सर्वेन्द्रियमनोन्मत्ता सर्वेन्द्रियमनोमयी ॥

सर्वसङ्ग्रामजयदा सर्वप्रहरणोद्यता ।
सर्वपीडोपशमनी सर्वारिष्टनिवारिणी ॥

सर्वैश्वर्यसमुत्पन्ना सर्वग्रहविनाशिनी ।
मातङ्गी मत्तमातङ्गी मातङ्गीप्रियमण्डला ॥

अमृतोदधिमध्यस्था कटिसूत्रैरलङ्कृता ।
अमृतोदधिमध्यस्था प्रवालवसनाम्बुजा ॥

मणिमण्डलमध्यस्था ईषत्प्रहसितानना ।
कुमुदा ललिता लोला लाक्षा लोहितलोचना ॥

दिग्वासा देवदूती च देवदेवाधिदेवता ।
सिंहोपरिसमारूढा हिमाचलनिवासिनी ॥

अट्टाट्टहासिनी घोरा घोरदैत्यविनाशिनी ।
अत्युग्ररक्तवस्त्राभा नागकेयूरमण्डिता ॥

मुक्ताहारलतोपेता तुङ्गपीनपयोधरा ।
रक्तोत्पलदलाकारा मदाघूर्णितलोचना ॥

समस्तदेवतामूर्तिः सुरारिक्षयकारिणी ।
खड्गिनी शूलहस्ता च चक्रिणी चक्रमालिनी ॥

शङ्खिनी चापिनी वाणी वज्रिणी वज्रदण्डिनी ।
आनन्दोदधिमध्यस्था कटिसूत्रैरलङ्कृता ॥

नानाभरणदीप्ताङ्गा नानामणिविभूषिता ।
जगदानन्दसम्भूता चिन्तामणिगुणान्विता ॥

त्रैलोक्यनमिता तुर्या चिन्मयानन्दरूपिणी ।
त्रैलोक्यनन्दिनी देवी दुःखसुस्स्वप्ननाशिनी ॥

घोराग्निदाहशमनी राज्यदेवार्थसाधिनी ।
महापराधराशिघ्नी महाचौरभयापहा ॥

रागादिदोषरहिता जरामरणवर्जिता ।
चन्द्रमण्डलमध्यस्था पीयूषार्णवसम्भवा ॥

सर्वदेवैः स्तुता देवी सर्वसिद्धैर्न्नमस्कृता ।
अचिन्त्यशक्तिरूपा च मणिमन्त्रमहौषधी ॥

अस्तिस्वस्तिमयी बाला मलयाचलवासिनी ।
धात्री विधात्री संहारी रतिज्ञा रतिदायिनी ॥

रुद्राणी रुद्ररूपा च रुद्ररौद्रार्त्तिनाशिनी ।
सर्वज्ञा चैव धर्मज्ञा रसज्ञा दीनवत्सला ॥

अनाहता त्रिनयना निर्भारा निर्वृतिः परा ।
पराघोरा करालाक्षी सुमती श्रेष्ठदायिनी ॥

मन्त्रालिका मन्त्रगम्या मन्त्रमाला सुमन्त्रिणी ।
श्रद्धानन्दा महाभद्रा निर्द्वन्द्वा निर्गुणात्मिका ॥

धरिणी धारिणी पृथ्वी धरा धात्री वसुन्धरा ।
मेरुमन्दरमध्यस्थास्थितिः शङ्करवल्लभा ॥

श्रीमती श्रीमयी श्रेष्ठा श्रीकरी भावभाविनी ।
श्रीदा श्रीमा श्रीनिवासा श्रीमती श्रीमताङ्गतिः ॥

उमा सारङ्गिणी कृष्णा कुटिला कुटिलालका ।
त्रिलोचना त्रिलोकात्मा पुण्यपुण्या प्रकीर्तिता ॥

अमृता सत्यसङ्कल्पा सासत्या ग्रन्थिभेदिनी ।
परेशी परमा साध्या पराविद्या परात्परा ॥

सुन्दराङ्गी सुवर्णाभा सुरासुरनमस्कृता ।
प्रजा प्रजावती धन्या धनधान्यसमृद्धिदा ॥

ईशानी भुवनेशानी भवानी भुवनेश्वरी ।
अनन्तानतमहिता जगत्सारा जगद्भवा ॥

अचिन्त्यात्मा चिन्त्यशक्तिश्चिन्त्याचिन्त्यस्वरूपिणी ।
ज्ञानगम्या ज्ञानमूर्तिर्ज्ञानिनी ज्ञानशालिनी ॥

असिता घोररूपा च सुधाधारा सुधावहा ।
भास्करी भास्वती भीतिर्भास्वदक्षानुशायिनी ॥

अनसूया क्षमा लज्जा दुर्लभा भरणात्मिका ।
विश्वघ्नी विश्ववीरा च विश्वघ्नी विश्वसंस्थिता ॥

शीलस्था शीलरूपा च शीला शीलप्रदायिनी ।
बोधनी बोधकुशला रोधनी बोधनी तथा ॥

विद्योतिनी विचित्रात्मा विद्युत्पटलसन्निभा ।
विश्वयोनिर्महायोनिः कर्मयोनिः प्रियात्मिका ॥

रोहिणी रोगशमनी महारोगज्वरापहा ।
रसदा पुष्टिदा पुष्टिर्मानदा मानवप्रिया ॥

कृष्णाङ्गवाहिनी कृष्णा कृष्णाकृष्णसहोदरी ।
शाम्भवी शम्भुरूपा च शम्भुस्था शम्भुसम्भवा ॥

विश्वोदरी योगमाता योगमुद्राध्नयोगिनी ।
वागीश्वरी योगनिद्रा योगिनीकोटिसेविता ॥

कौलिका मन्दकन्या च श‍ृङ्गारपीठवासिनी ।
क्षेमङ्करी सर्वरूपा दिव्यरूपा दिगम्बरी ॥

धूम्रवक्त्रा धूम्रनेत्रा धूम्रकेशी च धूसरा ।
पिनाकी रुद्रवेताली महावेतालरूपिणी ॥

तपिनी तापिनी दीक्षा विष्णुविद्यात्मनाश्रीता ।
मन्थरा जठरा तीव्रा अग्निजिह्वा भयापहा ॥

पशुघ्नी पशुरूपा च पशुहा पशुबाहिनी ।
पीता माता च धीरा च पशुपाशविनाशिनी ॥

चन्द्रप्रभा चन्द्ररेखा चन्द्रकान्तिविभूषिणी ।
कुङ्कुमाङ्कितसर्वाङ्गी सुधासद्गुरुलोचना ॥

शुक्लाम्बरधरा देवी वीणापुस्तकधारिणी ।
ऐरावतपद्मधारा श्वेतपद्मासनस्थिता ॥

रक्ताम्बरधरा देवी रक्तपद्मविलोचना ।
दुस्तरा तारिणी तारा तरुणी ताररूपिणी ॥

सुधाधारा च धर्मज्ञा धर्मसङ्गोपदेशिनी ।
भगेश्वरी भगाराध्या भगिनी भगनायिका ॥

भगबिम्बा भगक्लिन्ना भगयोनिर्भगप्रदा ।
भगेश्वरी भगाराध्या भगिनी भगनायका ॥

भगेशी भगरूपा च भगगुह्या भगावहा ।
भगोदरी भगानन्दा भगस्था भगशालिनी ॥

सर्वसङ्क्षोभिणी शक्तिस्सर्वविद्राविणी तथा ।
मालिनी माधवी माध्वी मधुरूपा महोत्कटा ॥

भरुण्डचन्द्रिका ज्योत्स्ना विश्वचक्षुस्तमोपहा ।
सुप्रसन्ना महादूती यमदूती भयङ्करी ॥

उन्मादिनी महारूपा दिव्यरूपा सुरार्चिता ।
चैतन्यरूपिणी नित्या क्लिन्ना काममदोद्धता ॥

मदिरानन्दकैवल्या मदिराक्षी मदालसा ।
सिद्धेश्वरी सिद्धविद्या सिद्धाद्या सिद्धसम्भवा ॥

सिद्धर्द्धिः सिद्धमाता च सिद्धिस्सर्वार्थसिद्धिदा ।
मनोमयी गुणातीता परञ्ज्योतिःस्वरूपिणी ॥

परेशी परगा पारा परासिद्धिः परागतिः ।
विमला मोहिनी आद्या मधुपानपरायणा ॥

वेदवेदाङ्गजननी सर्वशास्त्रविशारदा ।
सर्वदेवमयी विद्या सर्वशास्त्रमयी तथा ॥

सर्वज्ञानमयी देवी सर्वधर्ममयीश्वरी ।
सर्वयज्ञमयी यज्ञा सर्वमन्त्राधिकारिणी ॥

सर्वसम्पत्प्रतिष्ठात्री सर्वविद्राविणी परा ।
सर्वसङ्क्षोभिणी देवी सर्वमङ्गलकारिणी ॥

त्रैलोक्याकर्षिणी देवी सर्वाह्लादनकारिणी ।
सर्वसम्मोहिनी देवी सर्वस्तम्भनकारिणी ॥

त्रैलोक्यजृम्भिणी देवी तथा सर्ववशङ्करी ।
त्रैलोक्यरञ्जिनी देवी सर्वसम्पत्तिदायिनी ।
सर्वमन्त्रमयी देवी सर्वद्वन्द्वक्षयङ्करी ॥

सर्वसिद्धिप्रदा देवी सर्वसम्पत्प्रदायिनी ।
सर्वप्रियकरी देवी सर्वमङ्गलकारिणी ॥

सर्वकामप्रदा देवी सर्वदुःखविमोचिनी ।
सर्वमृत्युप्रशमनी सर्वविघ्नविनाशिनी ॥

सर्वाङ्गसुन्दरी माता सर्वसौभाग्यदायिनी ।
सर्वज्ञा सर्वशक्तिश्च सर्वैश्वर्यफलप्रदा ॥

सर्वज्ञानमयी देवी सर्वव्याधिविनाशिनी ।
सर्वाधारस्वरूपा च सर्वपापहरा तथा ॥

सर्वानन्दमयी देवी सर्वेक्षायाःस्वरूपिणी ।
सर्वलक्ष्मीमयी विद्या सर्वेप्सितफलप्रदा ॥

सर्वारिष्टप्रशमनी परमानन्ददायिनी ।
त्रिकोणनिलया त्रिस्था त्रिमात्रा त्रितनुस्थिता ॥

त्रिवेणी त्रिपथा त्रिस्था त्रिमूर्तिस्त्रिपुरेश्वरी ।
त्रिधाम्नी त्रिदशाध्यक्षा त्रिवित्त्रिपुरवासिनी ॥

त्रयीविद्या च त्रिशिरा त्रैलोक्या च त्रिपुष्करा ।
त्रिकोटरस्था त्रिविधा त्रिपुरा त्रिपुरात्मिका ॥

त्रिपुराश्री त्रिजननी त्रिपुरा त्रिपुरसुन्दरी ।
इदन्त्रिपुरसुन्दर्याः स्तोत्रन्नाम सहस्रकम् ॥

गुह्याद्गुह्यतरम्पुत्र तव प्रीत्यै प्रकीर्तितम् ।
गोपनीयम्प्रयत्नेन पठनीयम्प्रयत्नतः ॥

नातः परतरम्पुण्यन्नातः परतरन्तपः ।
नातः परतरं स्तोत्रन्नातः परतरा गतिः ॥

स्तोत्रं सहस्रनामाख्यं मम वक्त्राद्विनिर्गतम् ।
यः पठेत्प्रयतो भक्त्या श‍ृणुयाद्वा समाहितः ॥

मोक्षार्थी लभते मोक्षं स्वर्गार्थी स्वर्गमाप्नुयात् ।
कामांश्च प्राप्नुयात्कामी धनार्थी च लभेद्धनम् ॥

विद्यार्थी लभते विद्यायशोर्थी लभते यशः ।
कन्यार्थी लभते कन्यां सुतार्थी लभते सुतम् ॥

गुर्विणी जनयेत्पुत्रङ्कन्या विन्दति सत्पतिम् ।
मूर्खोऽपि लभते शास्त्रं हीनोऽपि लभते गतिम् ॥

सङ्क्रान्त्यावार्कामावस्यामष्टम्याञ्च विशेषतः ।
पौर्णमास्याञ्चतुर्द्दश्यान्नवम्याम्भौमवासरे ॥

पठेद्वा पाठयेद्वापि श‍ृणुयाद्वा समाहितः ।
स मुक्तस्सर्वपापेभ्यः कामेश्वरसमो भवेत् ॥

लक्ष्मीवान्धर्मवांश्चैव वल्लभस्सर्वयोषिताम् ।
तस्य वश्यम्भवेदाशु त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥

रुद्रन्दृष्ट्वा यथा देवा विष्णुन्दृष्ट्वा च दानवाः ।
यथाहिर्गरुडन्दृष्ट्वा सिंहन्दृष्ट्वा यथा गजाः ।
कीटवत्प्रपलायन्ते तस्य वक्त्रावलोकनात् ।
अग्निचौरभयन्तस्य कदाचिन्नैव सम्भवेत् ॥

पातका विविधाः शान्तिर्मेरुपर्वतसन्निभाः ।
यस्मात्तच्छृणुयाद्विघ्नांस्तृणवह्निहुतय्यथा ॥

एकदा पठनादेव सर्वपापक्षयो भवेत् ।
दशधा पठनादेव वाचा सिद्धिः प्रजायते॥

शतधा पठनाद्वापि खेचरो जायते नरः ।
सहस्रदशसङ्ख्यातयः पठेद्भक्तिमानसः॥

मातास्य जगतान्धात्री प्रत्यक्षा भवति ध्रुवम् ।
लक्षपूर्णे यथा पुत्र स्तोत्रराजम्पठेत्सुधीः॥

भवपाशविनिर्मुक्तो मम तुल्यो न संशयः।
सर्वतीर्थेषु यत्पुण्यं सकृज्जप्त्वा लभेन्नरः॥

सर्ववेदेषु यत्प्रोक्तन्तत्फलम्परिकीर्तितम्।
भूत्वा च बलवान्पुत्र धनवान्सर्वसम्पदः॥

देहान्ते परमं स्थानयत्सुरैरपि दुर्लभम् ।
स यास्यति न सन्देहः स्तवराजस्य कीर्तनात् ॥

॥ इति श्रीवामकेश्वरतन्त्रे हरकुमारसँवादे महात्रिपुरसुन्दर्याःषोडश्याः सहस्रनाम स्तोत्रं समाप्तम् ॥
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
संक्रांति काल अष्टमी नवमी चतुर्दशी अमावस पूर्णिमा व मंगलवार को विशेष रूप से इसका पाठ करने से मनुष्य को सर्व भोगों की प्राप्ति होती है पापों से मुक्ति मिलती है तथा ऐसा मनुष्य कामेश्वर देव के समान हो जाता है।
 इस स्तोत्र का एक बार पाठ करने से पापों का नाश 
10 बार पाठ करने से वाक् सिद्धि 
10000 बार पाठ करने से जगत धारिणी परम देवी से साक्षात्कार होता है। 
1 लाख बार पाठ करने से मनुष्य सांसारिक प्रपंच से मुक्त हो जाता है तथा अंत में शिव स्वरुप हो जाता है।
इसमें लेश मात्र भी संशय नहीं है। 
🙏🙏🙏🙏🙏🙏

Friday, 2 February 2024

#चण्डी #महाविद्या #सहस्राक्षर #मंत्र #स्तोत्र

#सिद्धिचण्डीमहाविद्या_सहस्राक्षरमन्त्र!! 
   वन्दे परागम-विद्यां, सिद्धिचण्डीं सङ्गिताम्। 
    महासप्तशती-मन्त्रस्वरुपां सर्वसिद्धिदाम्।।
       विनियोगः-ॐ अस्य सर्वविज्ञान महाराज्ञी सप्तशती रहस्याति रहस्यमयी पराशक्ति श्रीमदाद्याभगवती सिद्धिचण्डिका सहस्राक्षरी महाविद्या मन्त्रस्य श्रीमार्कण्डेय सुमेधा ऋषि, गायत्र्यादि नानाविधानि छन्दांसि, नवकोटि शक्ति युक्ता श्रीमदाद्याभगवती सिद्धिचण्डी देवता, श्रीमदाद्याभगवती सिद्धिचण्डी प्रसादादखिलेष्टार्थे जपे विनियोगः ।

~ऋष्यादिन्यासः~ 
श्रीमार्कण्डेय-सुमेधा ऋषिभ्यां नमः शिरसि। 
गायत्र्यादि नाना-विधानि छन्देभ्यो नमः मुखे। 
नवकोटिशक्तियुक्ता श्रीमदाद्याभगवती सिद्धिचण्डी देवतायै नमः हृदि। 
 श्रीमदाद्याभगवती-सिद्धिचण्डी-प्रसादादखिलेष्टार्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे। 

~महाविद्यान्यासः~
ॐ श्रीं नमः सहस्रारे । 
ॐ हें नमः भाले। 
ॐ क्लीं नमः नेत्र-युगले। 
ॐ ऐं नमः कर्ण-द्वये। 
ॐ सौं नमः नासा-पुट-द्वये।  
ॐ नमो मुखे।
ॐ ह्रीं ॐ नमः कण्ठे। 
ॐ श्रीं नमो हृदये। 
ॐ ऐं नमो हस्त-युगे। 
ॐ क्लें नमः उदरे। 
ॐ सौं नमः कट्यां। 
ॐ ऐं नमो गुह्ये। 
ॐ क्लीं नमो जङ्घा-युगे। 
ॐ ह्रीं नमो जानु-द्वये। 
ॐ श्रीं नमः पादादि-सर्वांगे।। 

ॐ या माया मधुकैटभ-प्रमथनी, या माहिषोन्मूलनी, 
या धूम्रेक्षण-चण्डमुण्ड-दलनी, या रक्तबीजाशनी। 

शक्तिः शुम्भनिशुम्भदैत्यमथनी, या सिद्धलक्ष्मी परा, 
सा देवी नवकोटि-मूर्तिसहिता, मां पातु विश्वेश्वरी।। 

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ह्मौं श्रीं ह्रीं क्लौं ऐं सौं ॐ ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं सौं ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं जय जय महा-लक्ष्मि जगदाद्ये बीज-सुरासुर त्रिभुवन-निदाने दयांकुरे सर्वतेजोरुपिणि महामहामहिमे महामहारुपिणि महामहामाये महामाया स्वरुपिणि विरञ्चिसंस्तुते ! 

विधिवरदे सच्चिदानन्दे विष्णुदेह-व्रते महामोहिनि मधुकैटभ-जिह्वासिनि नित्यवरदान-तत्परे !
महास्वाध्याय-वासिनि महा-महा-तेज्यधारिणि !
सर्वाधारे सर्वकारण-करणे अचिन्त्यरुपे !
इन्द्रादि-निखिल-निर्जर-सेविते !
सामगानं गायन्ति पूर्णोदय-कारिणि! 

विजये जयन्ति अपराजिते सर्वसुन्दरि रक्तांशुके सूर्यकोटि-शशांकेन्द्र कोटिसुशीतले अग्निकोटि-दहन-शीले यमकोटि-क्रूरे वायुकोटि-वहनसुशीतले !

ॐकारनाद-बिन्दुरुपिणि निगमागम मार्गदायिनि महिषासुर-निर्दलनि धूम्रलोचनवध परायणे चण्डमुण्डादि सिरच्छेदिनि रक्तबीजादि रुधिरशोषणि रक्तपानप्रिये महायोगिनि भूतवैताल भैरवादितुष्टि विधायनि शुम्भनिशुम्भ शिरच्छेदिनि !

निखिलासुर-बलखादिनि त्रिदश राज्यदायिनि सर्वस्त्री रत्नरुपिणि दिव्यदेह-निर्गुणे सगुणे सदसत् रुपधारिणि सुरवरदे भक्तत्राण तत्परे। 

वरवरदे सहस्त्राक्षरे अयुताक्षरे सप्तकोटि चामुण्डा रुपिणि नवकोटि कात्यायनी रुपे अनेक-लक्षालक्ष-स्वरुपे इन्द्राग्नि ब्रह्माणि रुद्राणि ईशानि भ्रामरि भीमे नारसिंहे !

त्रयत्रिंशत्-कोटि-दैवते अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायिके चतुरशीति-मुनिजन संस्तुते ! सप्तकोटिमन्त्रस्वरुपे महाकाले रात्रिप्रकाशे कलाकाष्ठादि रुपिणि चतुर्दशभुवन भावाविकारिणि गरुडगामिनि ! 

कोंकार होंकार ह्रींकार श्रींकार दलेंकार जूँकार सौंकार ऐंकार क्लेंकार ह्रींकार ह्रौंकार हौंकार नानाबीज कूटनिर्मित शरीरे नाना-बीजमन्त्र रागविराजते ! सकलसुन्दरी गणसेवते करुणारस कल्लोलिनि कल्पवृक्षाधिष्ठिते चिन्तामणि-द्वीपेऽवस्थिते मणिमन्दिर निवासे ! 
चापिनि खडिगनि चक्रिणि गदिनि शंखिनि पद्मिनि निखिल-भैरवाधिपति समस्तयोगिनी परिवृते ! 

कालि कङ्कालि तोरतोतले सुतारे ज्वालामुखि छिन्नमस्तके भुवनेश्वरि ! 
त्रिपुरे लोकजननि विष्णुवक्ष स्थलालङ्कारिणि !

अजिते अमिते अमराधिपे अनूपसरिते गर्भवासादि दुःखापहारिणि मुक्ति-क्षेमाधिषयनि शिवे शान्ति-कुमारि देवि !

सूक्तदश-शताक्षरे चण्डि चामुण्डे महाकालि महालक्ष्मि महासरस्वति त्रयीविग्रहे ! प्रसीद-प्रसीद सर्वमनोरथान् पूरय सर्वारिष्ट-विघ्नं छेदय-छेदय, सर्वग्रहपीडा ज्वरोग्र-भयं विध्वंसय विध्वंसय,सर्वत्रिभुवनजातं वशय-वशय, मोक्षमार्गं दर्शय-दर्शय, ज्ञानमार्गं प्रकाशय-प्रकाशय, अज्ञानतमो नाशय-नाशय, धनधान्यादि कुरु-कुरु,
सर्व-कल्याणानि कल्पय-कल्पय, मां रक्ष-रक्ष, सर्वापद्भ्यो निस्तारय-निस्तारय। मम वज्रशरीरं साधय-साधय, ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमोऽस्तु ते स्वाहा।।

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमो दैव्यै महादेव्यै, शिवायै सततं नमः।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै, नियताः प्रणताः स्म ताम्।।

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सर्वमंगलमाङ्गल्ये, शिवे सर्वार्थसाधिके ! 
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि ! नारायणि नमोऽस्तु ते ।।

सर्वस्वरुपे सर्वेशे, सर्वशक्ति समन्विते ! 
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि ! दुर्गे देवि ! नमोऽस्तु ते।।

सिद्धिचण्डी-महामन्त्रं, यः पठेत् प्रयतो नरः। 
सर्व-सिद्धिमवाप्नोति, सर्वत्र विजयी भवेत्।।

संग्रामेषु जयेत् शत्रून्, मातंगं इव केसरी। 
वशयेत् सदा निखिलान्, विशेषेण महीपतीन्।।

त्रिकालं यः पठेन्नित्यं, सर्वेश्वर्य पुरःसरम्। 
तस्य नश्यन्ति विघ्नानि, ग्रह-पीडाश्च वारणम्।।

पराभिचारशमनं, तीव्रदारिद्रयनाशनं।
सर्वकल्याण-निलयं, देव्याः सन्तोष कारकम्।।

सहस्त्रावृत्तितस्तु, देवि ! मनोरथ समृद्धिदम्।
द्वि-सहस्त्रावृत्तितस्तु, सर्वसंकट नाशनम्।।

त्रि-सहस्त्रावृत्तितस्तु, वशयेद् राज-योषितम्। 
अयुतं प्रपठेद् यस्तु, सर्वत्र चैवातन्द्रितः। 

स पश्येच्चण्डिकां साक्षात्, वरदान कृतोद्यमाम्।। 

इदं रहस्यं परमं, गोपनीयं प्रयत्नतः। 
वाच्यं न कस्यचित् देवि ! विधानमस्थ सुन्दरि।।

।।श्रीसिद्धिडामरे शिवदेवीसंवादे सहस्त्राक्षरं सिद्धिचण्डीमहाविद्योत्तमाम् सम्पूर्णम्।।

Saturday, 27 January 2024

#शनि #चालीसा

 चालीसा (Shani Chalisa)

॥ दोहा ॥
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल ।
दीनन के दुख दूर करि, कीजै नाथ निहाल ॥

जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज ।
   करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज ॥

           ॥ चौपाई ॥

जयति जयति शनिदेव दयाला ।
करत सदा भक्तन प्रतिपाला ॥

चारि भुजा, तनु श्याम विराजै ।
माथे रतन मुकुट छबि छाजै ॥

परम विशाल मनोहर भाला ।
टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला ॥

कुण्डल श्रवण चमाचम चमके ।
हिय माल मुक्तन मणि दमके ॥ ४॥

कर में गदा त्रिशूल कुठारा ।
पल बिच करैं अरिहिं संहारा ॥

पिंगल, कृष्णों, छाया नन्दन ।
यम, कोणस्थ, रौद्र, दुखभंजन ॥

सौरी, मन्द, शनी, दश नामा ।
भानु पुत्र पूजहिं सब कामा ॥

जा पर प्रभु प्रसन्न ह्वैं जाहीं ।
रंकहुँ राव करैं क्षण माहीं ॥ ८॥

पर्वतहू तृण होई निहारत ।
तृणहू को पर्वत करि डारत ॥

राज मिलत बन रामहिं दीन्हयो ।
कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो ॥

बनहूँ में मृग कपट दिखाई ।
मातु जानकी गई चुराई ॥

लखनहिं शक्ति विकल करिडारा ।
मचिगा दल में हाहाकारा ॥ १२॥

रावण की गतिमति बौराई ।
रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई ॥

दियो कीट करि कंचन लंका ।
बजि बजरंग बीर की डंका ॥

नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा ।
चित्र मयूर निगलि गै हारा ॥

हार नौलखा लाग्यो चोरी ।
हाथ पैर डरवाय तोरी ॥ १६॥

भारी दशा निकृष्ट दिखायो ।
तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो ॥

विनय राग दीपक महं कीन्हयों ।
तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों ॥

हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी ।
आपहुं भरे डोम घर पानी ॥

तैसे नल पर दशा सिरानी ।
भूंजीमीन कूद गई पानी ॥ २०॥

श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई ।
पारवती को सती कराई ॥

तनिक विलोकत ही करि रीसा ।
नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा ॥

पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी ।
बची द्रौपदी होति उघारी ॥

कौरव के भी गति मति मारयो ।
युद्ध महाभारत करि डारयो ॥ २४॥

रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला ।
लेकर कूदि परयो पाताला ॥

शेष देवलखि विनती लाई ।
रवि को मुख ते दियो छुड़ाई ॥

वाहन प्रभु के सात सजाना ।
जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना ॥

जम्बुक सिंह आदि नख धारी ।
सो फल ज्योतिष कहत पुकारी ॥ २८॥

गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं ।
हय ते सुख सम्पति उपजावैं ॥

गर्दभ हानि करै बहु काजा ।
सिंह सिद्धकर राज समाजा ॥

जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै ।
मृग दे कष्ट प्राण संहारै ॥

जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी ।
चोरी आदि होय डर भारी ॥ ३२॥

तैसहि चारि चरण यह नामा ।
स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा ॥

लौह चरण पर जब प्रभु आवैं ।
धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं ॥

समता ताम्र रजत शुभकारी ।
स्वर्ण सर्व सर्व सुख मंगल भारी ॥

जो यह शनि चरित्र नित गावै ।
कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै ॥ ३६॥

अद्भुत नाथ दिखावैं लीला ।
करैं शत्रु के नशि बलि ढीला ॥

जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई ।
विधिवत शनि ग्रह शांति कराई ॥

पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत ।
दीप दान दै बहु सुख पावत ॥

कहत राम सुन्दर प्रभु दासा ।
शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा ॥ ४०॥

॥ दोहा ॥
पाठ शनिश्चर देव को, की हों भक्त तैयार ।
करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार ॥
🙏🙏🙏🙏🙏

https://youtu.be/fetEfJZFoKQ

Tuesday, 23 January 2024

#श्रीराघवेन्द्राष्टकम्

#श्रीराघवेन्द्राष्टकम्!!
अच्युतं राघवं जानकी वल्लभं
कोशलाधीश्वरं रामचन्द्रं हरिम् ।
नित्यधामाधिपं सद्गुणाम्भोनिधिं
सर्वलोकेश्वरं राघवेन्द्रं भजे ॥ १॥

सर्वसङ्कारकं सर्वसन्धारकं
सर्वसंहारकं सर्वसन्तारकम् ।
सर्वपं सर्वदं सर्वपूज्यं प्रभुं
सर्वलोकेश्वरं राघवेन्द्रं भजे ॥ २॥

देहिनं शेषिणं गामिनं रामिणं
ह्यस्य सर्वप्रपञ्चस्य चान्तःस्थितम् ।
विश्वपारस्थितं विश्वरूपं तथा
सर्वलोकेश्वरं राघवेन्द्रं भजे ॥ ३॥

सिन्धुना संस्तुतं सिन्धुसेतोः करं
रावणघ्नं परं रक्षसामन्तकम् ।
पह्नजादिस्तुतं सीतया चान्वितं
सर्वलोकेश्वरं राघवेन्द्रं भजे ॥ ४॥

योगिसिद्धाग्र-गण्यर्षि-सम्पूजितं
पह्नजोन्पादकं वेददं वेदपम् ।
वेदवेद्यं च सर्वज्ञहेतुं श्रुतेः
सर्वलोकेश्वरं राघवेन्द्रं भजे ॥ ५॥

दिव्यदेहं तथा दिव्यभूषान्वितं
नित्यमुक्तैकसेव्यं परेशं किलम् ।
कारणं कार्यरूपं विशिष्टं विभुं
सर्वलोकेश्वरं राघवेन्द्रं भजे ॥ ६॥

कुझ्तिऐः कुन्तलैःशोभमानं परं
दिव्यभव्जेक्षणं पूर्णचन्द्राननम् ।
नीलमेघद्युतिं दिव्यपीताम्बरं
सर्वलोकेश्वरं राघवेन्द्रं भजे ॥ ७॥

चापबाणान्वितं भुक्तिउक्तिप्रदं
धर्मसंरक्षकं पापविध्वंसकम् ।
दीनबन्धुं परेशं दयाम्भोनिधिं
सर्वलोकेश्वरं राघवेन्द्रं भजे ॥ ८॥

॥ इति श्रीराघवेन्द्राष्टकम् ॥
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