Tuesday, 22 August 2023

गुरु अष्टकम्

शरीरं सुरूपं तथा वा कलत्रं,

यशश्रचारु चित्रं धनं मेरुकुलम्।

मनश्चेन लंचम गुरोरंघ्रिपद्मे

ततः किं, ततः किं, ततः किं, ततः किं।।

 आपका शरीर अच्छा ही सुंदर हो, आपकी पत्नी भी सुंदर हो, आपका यश दिशाओं में हो, मेरु पर्वत की तरह विशाल धन संपत्ति हो, यदि आपका मन गुरु के चरणकमलों में नहीं है तो फिर हो इन सब का क्या अर्थ क्या है, क्या अर्थ है, क्या अर्थ है, क्या अर्थ है?

 

कलत्रं धनं पुत्र पौत्रादि सर्वं,

गृहं बंधवा सर्वमेतद्धि जातम।

मनश्चेन लंचम गुरोरंघृ पद्मे

ततः किं, ततः किं, ततः किं, ततः किं।।

 आपके पास पत्नी हो, धनसम्पत्ति हो, पुत्र, पुत्र आदि सब, घर, भाई-बहन, सभी साधु-संत भी हों पर आपके मन में यदि गुरु के चरणकमलों में न लगे तो इन सबका क्या अर्थ है, क्या अर्थ है, क्या अर्थ है, क्या अर्थ है?

 

षडंगादि वेदो मुखे शास्त्र, विद्या

कवित्वादि गद्यम, सुपद्यम करोति।

मनश्चेन लंचम गुरोरंघृ पद्मे

ततः किं, ततः किं, ततः किं, ततः किं।।

 आप सभी वेदों और उनके छः अंग पर सुंदर कविता करते हैं, गद्य पद्य की सुंदर रचना करते हैं, पर आपके मन में यदि गुरु के चरणकमलों में न लगता हो तो इन सबका क्या अर्थ है, क्या अर्थ है, क्या अर्थ है, क्या अर्थ है?

विदेशेषु मन्यः स्वदेशेषु धन्यः,

सदाचार वृत्तेषु मत्तो न चान्यः।

मनश्चेन लंचम गुरोरंघृ पद्मे

ततः किं, ततः किं, ततः किं, ततः किं।।

 ऐसा कोई सोच सकता है कि 'मेरे कलाकार में बहुत सम्मान होता है, मुझे अपने देश में धन्य माना जाता है, सदाचार के मार्ग पर मेरा कोई और नहीं बढ़ता,' पर उसके मन में यदि गुरु के चरणकमलों में कोई विचार न हो तो इन सबका क्या अर्थ है, क्या अर्थ है, क्या अर्थ है, क्या अर्थ है?


 क्षमामण्डले भूप भूपाल वृन्दः

सदा सेवितं यस्य पदारविंदम।

मनश्चेन लंचम गुरोरंघृ पद्मे

ततः किं, ततः किं, ततः किं, ततः किं।।

 किसी का हर समय गुणगान होता रहता है जिसमें सभी जगत के राजा, महाराजा, सम्राट साक्षात् उपस्थित होते थे और उनका सन्मान करते थे, यदि उनके मन में गुरु के चरण कम हों और न प्रतीत हो तो इनमें सबका क्या अर्थ है, क्या अर्थ है, क्या है अर्थ है, क्या अर्थ है?


 यशो मे गतं दिक्षु दानत्पता

जगद्धस्तु सर्वं करे यत्प्रसादात्।

मनश्चेन लंचम गुरोरंघृ पद्मे

ततः किं, ततः किं, ततः किं, ततः किं।।

 "मेरे परोपकार, दान के कार्य एवं मेरे कौशल का यश चारों दिशाओं में फैला हुआ है, जगत की सारी मूर्ति मेरे गुणों के पुरस्कार के रूप में मेरे हाथों में हैं" ऐसा होने पर भी यदि मन गुरु के चरणकमलों में न लगता हो तो इन सबका अर्थ क्या है, क्या अर्थ है, क्या अर्थ है, क्या अर्थ है?


 न भोगे न योगे न वा वाजीराजौ,

न कांता मुखे नैव वित्तेषु चित्तं।

मनश्चेन लंचम गुरोरंघ्री पद्मे,त

तः किं, ततः किं, ततः किं, ततः किं।।

 वैराग्य, बाहरी आकर्षण, योग ध्यान एवं जैसी सफलताएं, पत्नी के सुंदर मुख एवं पृथ्वी का सारा धन, संपत्ति से भी मन दूर हो गया पर यदि मन गुरु के चरणकमलों में न लगे तो इन सबका क्या अर्थ है, क्या अर्थ है है, अर्थ क्या है, अर्थ क्या है?


अरण्ये न वा स्वस्य गेहे न कार्ये,

न देहे मनो वर्तते मे त्वार्घ्ये।

मनश्चेन लंचम गुरोरंघ्री पद्मे,

ततः किं, ततः किं, ततः किं, ततः किं।।

 वन में रहने का या घर में रहने का मन का आकर्षण समाप्त हो गया हो, कोई भी सिद्धि प्राप्त करने की इच्छा समाप्त हो गई हो, अपने शरीर को मजबूत, स्वस्थ बनाए रखने की इच्छा भी न रही हो पर यदि मन गुरु के चरणकमलों में न हो सोचो तो इन सबका क्या मतलब है, क्या मतलब है, क्या मतलब है, क्या मतलब है?

महान संत कवि कबीर ने एक बार कहा था, "यदि साक्षात ईश्वर भी मेरे सामने प्रकट हो जाएं, तो मैं भी अपने गुरु के चरणकमलों को चुनूंगा क्यकि अंततः वे ही ईश्वर मुझे तक लेकर आएंगे।"

यह मंत्र बताता है कि अपार धन-संपदा, ज्ञान, कीर्ति और यहां तक ​​कि सफलता तक गुरु की कृपा के बिना व्यर्थ हैं।


Sunday, 9 July 2023

#ब्रह्म - #शक्ति #स्तोत्र है _ विरह, विरोध और वेदना को मिटाने वाला

अपने #इष्ट-देवता या #भगवती #गौरी का #षोडषोपचार या #पञ्चोपचार आदि विविध उपचारों से पूजन करके ब्रह शक्ति स्तोत्र का पाठ करें। 
यह स्तोत्र देवों के द्वारा ब्रह्मा जी की की गई वंदना है, ऐसा वर्णन स्कंद पुराण में प्राप्त होता है।

ब्रह्मशक्ति स्तोत्र का पाठ किसे करना है:-
जिन व्यक्तियों ने किसी न किसी कारण से अपने प्रिय को खो दिया है और उसने विवाहेतर संबंध बना लिया है, उन्हें नियमित रूप से ब्रह्मशक्ति स्तोत्र का पाठ करना चाहिए
अभीष्ट-प्राप्ति के लिये एकाग्रता के साथ कातरता और समर्पण आवश्यक है।
#पारिवारिक #कलह, #रोग या #अकालमृत्यु आदि की सम्भावना होने पर इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिये।
  प्रणय सम्बन्धों में बाधाएँ या #पति-पत्नी के बीच सामन्जस्य का अभाव होने पर  इसका पाठ अभीष्ट फलदायक होगा।


        ।।श्री शिव उवाच।।  
ब्राह्मि ब्रह्मस्वरूपे त्वं, मां प्रसीद सनातनि। 
परमात्म स्वरूपे च, परमानन्द रूपिणि।। 

ॐ प्रकृत्यै नमो भद्रे, मां प्रसीद भवार्णवे। 
सर्वमंगलरूपे च, प्रसीद सर्वमंगले।। 

विजये शिवदे देवि मां प्रसीद जय-प्रदे। 
वेदवेदांग रूपे च वेदमातःप्रसीद मे।। 

शोकघ्ने ज्ञानरूपे च, प्रसीद भक्त वत्सले। 
सर्वसम्पत्प्रदे माये प्रसीद जगदम्बिके।। 

लक्ष्मीर्नारायण-क्रोडे, स्रष्टुर्वक्षसि भारती। 
मम क्रोडे महामाया, विष्णुमाये प्रसीद मे।। 

काल रूपे कार्य रूपे,प्रसीद दीनवत्सले। 
कृष्णस्य राधिके भद्रे प्रसीद कृष्ण पूजिते।। 

समस्त कामिनीरूपे, कलांशेन प्रसीद मे। 
सर्वसम्पत्स्वरूपे त्वं, प्रसीद सम्पदां प्रदे।। 

यशस्विभिः पूजिते त्वं, प्रसीद यशसां निधेः। 
चराचरस्वरूपे च, प्रसीद मम मा चिरम्।। 

मम योगप्रदे देवि प्रसीद सिद्ध योगिनि। 
सर्वसिद्धिस्वरूपे च, प्रसीद सिद्धिदायिनि।। 

अधुना रक्ष मामीशे, प्रदग्धं विरहाग्निना। 
स्वात्म दर्शनपुण्येन क्रीणीहि परमेश्वरि।।

 ।।फल-श्रुति।।

 एतत् पठेच्छृणुयाच्चन, वियोग-ज्वरो भवेत्। न भवेत् कामिनी भेदस्तस्य जन्मनि जन्मनि।। 

इस स्तोत्र का पाठ करने अथवा सुनने वाले को वियोग-पीड़ा नहीं होती और जन्म जन्मान्तर तक कामिनी-भेद नहीं होता।

ब्रह्मशक्ति स्तोत्र के लाभ:-
पारिवारिक कलह, बीमारी या अकाल मृत्यु आदि के लिए इसका पाठ करना चाहिए। रोमांस संबंधों में रुकावटें आने पर भी इसका पाठ लाभदायक रहेगा।
आज हमारे समाज में 100 में से 40 जोड़े ऐसे हैं जो अपने पारिवारिक जीवन के कारण किसी न किसी तरह से वैचारिक मतभेद या किसी तीसरे पक्ष से मतभेद रखते हैं। 
अनेक विषमताओं का शिकार हो रहा है, जिससे हर पल घुटन और अनिश्चितता के कारण अपना शारीरिक और मानसिक संतुलन खोता जा रहा है। और नतीजा यह है कि इन सभी कारणों से पारिवारिक सामाजिक और आर्थिक स्तर गिरता जा रहा है, हालांकि कुछ समय बाद लोगों को एहसास होता है कि उन्होंने गलत कदम उठाया है, लेकिन जब तक बात समझ में आती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
यह एक ऐसी गलती है जिसे नष्ट नहीं किया जा सकता। 
इस स्तोत्र को पढ़ने या सुनने से #प्रेम #वियोग का कष्ट नहीं होता और पत्नी का वियोग नहीं होता। 
छोटे-मोटे वैचारिक मतभेदों को अपने रिश्ते पर इतना हावी न होने दें कि वे आपके रिश्ते को ही खा जाएं और एक बात हमेशा ध्यान में रखें कि अवैध संबंधों की उम्र और विश्वसनीयता बहुत कम होती है चाहे वह महिला हो या पुरुष। 
आज अपने #पार्टनर को भूल कर किसी और की ओर आकर्षित हो, तो इसकी क्या गारंटी है कि कल किसी और से दूर नहीं भागेगा। 
इस प्रकार की परेशानी और उलझन में - यदि आप धार्मिक प्रवृत्ति के हैं, यदि आप ईश्वर पर भरोसा करते हैं तो - वैदिक पद्धति के ब्रह्मशक्ति स्तोत्र का पाठ करें, जिससे आपको राहत मिलेगी।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏

ब्रह्मशक्ति स्तोत्र/ब्रह्मशक्ति स्तोत्र
ब्राह्मी ब्रह्म-स्वरूपे त्वं, मां प्रसीद सनातनीपरमात्म-स्वरूपे च, परमानंद-रूपिणी।।

ॐ प्रकृत्यै नमो भद्रे, मां प्रसीद भवनवे। सर्व मंगल रूपे च, प्रसीद सर्व मंगले।।

विजये शिवदे देवी मां प्रसीद जय-प्रदे। वेद-वेदांग-रूपे च, वेद-मातः प्रसीद मे।।

शोकघ्ने ज्ञान-रूपे च, प्रसीद भक्त वत्सले। सर्व-सम्पत्-प्रदे माये, प्रसीद जगदम्बिके।।

लक्ष्मीनारायण-क्रोडे, स्त्रीस्तुर्वक्षसि भारती। मम क्रोधे महा-माया, विष्णु-माये प्रसीद मे।।

काल-रूपे कार्य-रूपे, प्रसीद दीन-वत्सले। कृष्णस्य राधाके भदेर, प्रसीद कृष्ण पूजिते।।

सर्वकामिनीरूपे, कलांशेन प्रसीद मे। सर्व-सम्पत्-स्वरूपे त्वं, प्रसीद सम्पदां प्रदे।।

यशस्विभिः पूजिते त्वं, प्रसीद यशसं निधेः। चराचर-स्वरूपे च, प्रसीद मम मा चिरम्।।

मम योग-प्रदे देवी ! प्रसीद सिद्ध-योगिनी। सर्वसिद्धिस्वरूपे च, प्रसीद सिद्धिदायिनी।।

अधुना रक्ष मामिषे, प्रदग्घं विरहाग्निना। स्वात्म-दर्शन-पुण्येन, क्रणीहि भगवानि।।

।।फल-श्रुति।।
।।एतत् पथेच्छृणुयाच्च्न, वियोग-ज्वरो भवेत्।। न भवेत् कामिनीभेदस्तस्य जन्मनि जन्मनि।।

इस स्तोत्र का पाठ करने या सुनने वाले को वियोग-पीड़ा नहीं होता और जन्म-जन्मान्तर तक कामिनी-भेद नहीं होता।

Monday, 3 July 2023

श्री #गुरु #सहस्र #नाम #स्त्रोत्र

श्रीगुरुसहस्रनामस्तोत्रम्!! 
ॐ गं गणपतये नमः॥श्रीगुरवे नमः ॥
श्रीपरमगुरवे नमः॥श्रीपरात्परगुरवे नमः ॥
श्रीपरमेष्ठिगुरवे नमः॥ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

(श्रीशिवोक्तं श्रीहरिकृष्णविरचितम्) 
॥ अथ श्रीगुरुसहस्रनामस्तोत्रम् ॥
कैलासशिखरासीनं चन्द्रखण्ड विराजितम् ।
पप्रच्छ विनयाद्भक्त्या गौरी नत्वा वृषध्वजम्॥१॥

॥ श्रीदेव्युवाच ॥
भगवन् सर्वधर्मज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
केनोपायेन च कलौ लोकार्तिर्नाशमेष्यति ॥ २॥
तन्मे वद महादेव यदि तेऽस्ति दया मयि।

॥ श्रीमहादेव उवाच ॥
अस्ति गुह्यतमं त्वेकं ज्ञानं देवि सनातनम् ॥ ३॥
अतीव च सुगोप्यं च कथितुं नैव शक्यते।
अतीव मे प्रियासीति कथयामि तथापि ते ॥ ४॥
सर्वं ब्रह्ममयं ह्येतत्संसारं स्थूलसूक्ष्मकम्।
प्रकृत्या तु विना नैव संसारो ह्युपपद्यते ॥ ५॥
तस्मात्तु प्रकृतिर्मूलकारणं नैव दृश्यते ।
रूपाणि बहुसङ्ख्यानि प्रकृतेः सन्ति मानिनि ॥ ६॥
तेषां मध्ये प्रधानं तु गुरुरूपं मनोरमम् ।
विशेषतः कलियुगे नराणां भुक्तिमुक्तिदम् ॥ ७॥
तस्योपासकाश्चैव ब्रह्माविष्णुशिवादयः ।
सूर्यश्चन्द्रश्च वरुणः कुबेरोऽग्निस्तथापराः ॥ ८॥
दुर्वासाश्च वसिष्ठश्च दत्तात्रेयो बृहस्पतिः ।
बहुनात्र किमुक्तेन सर्वेदेवा उपासकाः ॥ ९॥
गुरूणां च प्रसादेन भुक्तिमुक्त्यादिभागिनः ।
संवित्कल्पं प्रवक्ष्यामि सच्चिदानन्दलक्षणम् ॥ १०॥
यत्कल्पाराधनेनैव स्वात्मानन्दो विराजते ।
मेरोरुत्तरदेशे तु शिलाहैमावती पुरी ॥ ११॥
दशयोजनविस्तीर्णा दीर्घषोडशयोजना ।
वररत्नैश्च खचिता अमृतं स्रवते सदा ॥ १२॥
सोत्थिता शब्दनिर्मुक्ता तृणवृक्षविवर्जिता ।
तस्योपरि वरारोहे संस्थिता सिद्धमूलिका ॥ १३॥
वेदिकाजननिर्मुक्ता तन्नदीजलसंस्थिता ।
वेदिकामध्यदेशे तु संस्थितं च शिवालयम् ॥ १४॥
हस्ताष्टकसुविस्तारं समन्ताच्च तथैव च ।
तस्योपरि च देवेशि ह्युपविष्टो ह्यहं प्रिये ॥ १५॥
दिव्याब्दवर्षपञ्चाशत्समाधौ संस्थितो ह्यहम् ।
महागुरुपदे दृष्टं गूढं कौतुहलं मया ॥ १६॥

विनियोगः-
ॐ अस्य श्रीगुरुसहस्रनाममालामन्त्रस्य
श्रीसदाशिवऋषिः
नानाविधानि छन्दांसि श्रीगुरुर्देवता श्रीगुरुप्रीत्यर्थे
सकलपुरुषार्थसिद्ध्यर्थे
श्रीगुरुसहस्रनाम जपे विनियोगः ।

॥ अथाङ्गन्यासः ॥
श्रीसदाशिवऋषये नमः शिरसि ॥
श्रीनानाविधछन्देभ्यो नमः मुखे ॥
श्रीगुरुदेवतायै नमः हृदये ॥
श्री हं बीजाय नमः गुह्ये ॥
श्री शं शक्तये नमः पादयोः ॥
श्री क्रौं कीलकाय नमः सर्वाङ्गे ॥

॥ अथ गुरुगायत्रीमन्त्रः ॥
ॐ गुरुदेवाय विद्महे परमगुरवे च धीमहि
तन्नो पुरुषः प्रचोदयात् ॥
॥ इति गुरुगायत्रीमन्त्रः ॥

॥ अथ करन्यासः ॥
ॐ सदाशिवगुरवे नमः अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। 
ॐ विष्णुगुरवे नमः तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ ब्रह्मगुरवे नमः मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ गुरु इन्द्राय नमः अनामिकाभ्यां नमः। 
ॐ गुरुसकलदेवरूपिणे नमः कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ गुरुपञ्चतत्त्वात्मने नमः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।

॥ अथ हृदयादिन्यासः ॥
ॐ सदाशिवगुरवे नमः हृदयाय नमः ।
ॐ विष्णुगुरवे नमः शिरसे स्वाहा ।
ॐ ब्रह्मगुरवे नमः शिखायै वषट् ।
ॐ गुरु इन्द्राय नमः नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ॐ गुरुसकलदेवरूपिणे नमः कवचाय हुम् ।
ॐ गुरुपञ्चतत्त्वात्मने नमः अस्त्राय फट्। 

॥ अथ ध्यानम् ॥
हंसाभ्यां परिवृत्तपत्रकमलैर्दिव्यैर्जगत्कारणै-
र्विश्वोत्कीर्णमनेकदेहनिलयं स्वच्छन्दमात्मेच्छया ।
तत्तद्योग्यतया स्वदेशिकतनुं भावैकदीपाङ्कुरम् ।
प्रत्यक्षाक्षरविग्रहं गुरुपदं ध्यायेद्द्विबाहुं गुरुम् ॥ १७॥

विश्वं व्यापितमादिदेवममलं नित्यं परन्निष्कलम्
नित्योत्फुल्लसहस्रपत्रकमलैर्नित्याक्षरैर्मण्डपैः ।
नित्यानन्दमनन्तपूर्णमखिलन्तद्ब्रह्म नित्यं स्मरे-
दात्मानं स्वमनुप्रविश्य कुहरे स्वच्छन्दतः सर्वगम् ॥ १८॥
॥ इति ध्यानम् ॥

॥ अथ मन्त्रः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं श्रीं गुरवे नमः ॥
॥ इति मन्त्रः ॥

त्वं हि मामनुसन्धेहि सहस्रशिरसम्प्रभुम्।
तदा मुखेषु मे न्यस्तं सहस्रं लक्ष्यते स्तदा ॥ १९॥
इदं विश्वहितार्थाय रसनारङ्गगोचरम् ।
प्रकाशयित्वा मेदिन्यां परमागमसम्मताम् ॥ २०॥
इदं शठाय मूर्खाय नास्तिकाय प्रकीर्तने।
असूयोपहतायापि न प्रकाश्यं कदाचन ॥ २१॥
विवेकिने विशुद्धाय वेदमार्गानुसारिणे ।
आस्तिकायात्मनिष्ठाय स्वात्मन्यविकृताय च ॥ २२॥
गुरुनामसहस्रं ते कृतधीरुदिते जये ।
भक्तिगम्यस्त्रयीमूर्तिर्भासक्तो वसुधाधिपः ॥ २३॥
देवदेवो दयासिन्धुर्देवदेवशिखामणिः ।
सुखाभावः सुखाचारः शिवदो मुदिताशयः ॥ २४॥
अविक्रियः क्रियामूर्तिरध्यात्मा च स्वरूपवान् ।
सृष्ट्यामलक्ष्यो भूतात्मा धर्मी यात्रार्थचेष्टितः ॥ २५॥
अन्तर्यामी कालरूपः कालावयविरूपिणः ।
निर्गुणश्च कृतानन्दो योगी निद्रानियोजकः ॥ २६॥
महागुणान्तर्निक्षिप्तः पुण्यार्णवपुरात्मवान् ।
निरवद्यः कृपामूर्तिर्न्यायवाक्यनियामकः ॥ २७॥
अदृष्टचेष्टः कूटस्थो धृतलौकिकविग्रहः ।
महर्षिमानसोल्लासो महामङ्गलदायकः ॥ २८॥
सन्तोषितः सुरव्रातः साधुचित्तप्रसादकः ।
शिवलोकाय निर्देष्टा जनार्दनश्च वत्सलः ॥ २९॥
स्वशक्त्युद्धाटिताशेषकपाटः पितृवाहनः ।
शेषोरगफणञ्छत्रः शोषोक्त्यास्यसहस्रकः ॥ ३०॥
कृतात्मविद्याविन्यासो योगमायाग्रसम्भवः ।
अञ्जनस्निग्धनयनः पर्यायाङ्कुरितस्मितः ॥ ३१॥
लीलाक्षस्तरलालोकस्त्रिपुरासुरभञ्जनः ।
द्विजोदितस्वस्त्ययनो मन्त्रपूतो जलाप्लुतः ॥ ३२॥
प्रशस्तनामकरणो जातुचङ्क्रमणोत्सुकः ।
व्यालविचूलिकारत्नघोषो घोषप्रहर्षणः ॥ ३३॥
सन्मुखः प्रतिबिम्बार्थी ग्रीवाव्याघ्रनखोज्ज्वलः ।
पङ्कानुलेपरुचिरो मांसलोरुकटीतलः ॥ ३४॥
दृष्टजानुकरद्वन्द्वः प्रतिबिम्बानुकारकृत् ।
अव्यक्तवर्णव्यावृत्तिः स्मितलक्ष्यरदोद्गमः ॥ ३५॥
धात्रीकरसमालम्बी प्रस्खलच्चित्रचङ्क्रमः ।  ??
क्षेमणी क्षेमणाप्रीतो वेणुवाद्यविशारदः ॥ ३६॥
नियुद्धलीलासंहृष्टः कण्ठानुकृतकोकिलः ।
उपात्तहंसगमनः सर्वसत्त्वरुतानुकृत् ॥ ३७॥
मनोज्ञः पल्लवोत्तंसः पुष्पस्वेच्छात्मकुण्डलः ।
मञ्जुसञ्जितमञ्जीरपादः काञ्चनकङ्कणः ॥ ३८॥
अन्योन्यस्पर्शनक्रीडापटुः परमकेतनः ।
प्रतिध्वानप्रमुदितः शाखाचतुरचङ्क्रमः ॥ ३९॥
ब्रह्मत्राणकरो धातृस्तुतः सर्वार्थसाधकः ।
ब्रह्मब्रह्ममयोऽव्यक्तः तेजास्तव्यः सुखात्मकः ॥ ४०॥
निरुक्तो व्याकृतो व्यक्तिर्निरालम्बविभावनः ।
प्रभविष्णुरतन्द्रीको देववृक्षादिरूपधृक् ॥ ४१॥
आकाशः सर्वदेवादिरणीयस्थूलरूपवान् ।       ??
व्याप्याव्याप्यकृताकर्ता विचाराचारसम्मतः ॥ ४२॥
छन्दोमयः प्रधानात्मा मूर्तो मूर्त्तद्वयाकृतिः ।
अनेकमूर्तिरक्रोधः परात्परपराक्रमः ॥ ४३॥
सकलावरणातीतः सर्वदेवमहेश्वरः ।
अनन्यविभवः सत्यरूपः स्वर्गेश्वरार्चितः ॥ ४४॥ ?
महाप्रभावज्ञानज्ञः पूर्वगः सकलात्मजः ।
स्मितेक्षाहर्षितो ब्रह्मा भक्तवत्सलवाक्प्रियः ॥ ४५॥
ब्रह्मानन्दोदधौताङ्घ्रिः लीलावैचित्र्यकोविदः ।
विलाससकलस्मेरो गर्वलीलाविलोकनः ॥ ४६॥
अभिव्यक्तदयात्मा च सहजार्धस्तुतो मुनिः ।
सर्वेश्वरः सर्वगुणः प्रसिद्धः सात्वतर्षभः ॥ ४७॥
अकुण्ठधामा चन्द्रार्कहृष्टराकाशनिर्मलः ।
अभयो विश्वतश्चक्षुस्तथोत्तमगुणप्रभुः ॥ ४८॥
अहमात्मा मरुत्प्राणः परमात्माऽऽद्यशीर्षवान् ।
दावाग्निभीतस्य गुरोर्गोप्ता दावानिग्ननाशनः ॥ ४९॥ ??
मुञ्जाटव्यग्निशमनः प्रावृट्कालविनोदवान् । ?
शिलान्यस्तान्नभुग्जातसौहित्यश्चाङ्गुलाशनः ॥ ५०॥ ??
गीतास्फीतसरित्पूरो नादनर्तितबर्हिणः ।
रागपल्लवितस्थाणुर्गीतानमितपादपः ॥ ५१॥
विस्मारिततृणस्याग्रग्रासीमृगविलोभनः । ??
व्याघ्रादिहिंस्ररजन्तुवैरहर्ता सुगायनः ॥ ५२॥ ??
निष्यन्दध्यानब्रह्मादिवीक्षितो विश्ववन्दितः ।
शाखोत्कीर्णशकुन्तौघछत्रास्थितबलाहकः ॥ ५३॥
अस्पन्दः परमानन्दचित्रायितचराचरः ।
मुनिज्ञानप्रदो यज्ञस्तुतो वासिष्ठयोगकृत् ॥ ५४॥ ?
शत्रुप्रोक्तक्रियारूपः शत्रुयज्ञनिवारणः ।
हिरण्यगर्भहृदयो मोहवृत्तिनिवर्तकः ॥ ५५॥ ?
आत्मज्ञाननिधिर्मेधा कीशस्तन्मात्ररूपवान् ।  ?? (kesha
 ?? kIsha = monkey, tanmAtrarUpavAn kIshaH – monkey having assumed a very
small size as Hanuman in Lanka while searching for Seeta – wild imagination?)

इन्द्राग्निवदनः कालनाभः सर्वागमस्तुतः ॥ ५६॥
तुरीयः सत्त्वधीः साक्षी द्वन्द्वारामात्मदूरगः ।
अज्ञातपारो विश्वेशः अव्याकृतविहारवान् ॥ ५७॥
आत्मप्रदीपो विज्ञानमात्रात्मा श्रीनिकेतनः ।
पृथ्वी स्वतःप्रकाशात्मा हृद्यो यज्ञफलप्रदः ॥ ५८॥
गुणग्राही गुणद्रष्टा गूढस्वात्मानुभूतिमान् ।
कविर्जगद्रूपद्रष्टा परमाक्षरविग्रहः ॥ ५९॥
प्रपन्नपालनो मालामनुर्ब्रह्मविवर्धनः ।
वाक्यवाचकशक्त्यार्थः सर्वव्यापी सुसिद्धिदः ॥ ६०॥
स्वयम्प्रभुरनिर्विद्यः स्वप्रकाशश्चिरन्तनः ।
नादात्मा मन्त्रकोटीशो नानावादानुरोधकः ॥ ६१॥
कन्दर्पकोटिलावण्यः परार्थैकप्रयोजकः ।
अभयीकृतदेवौघः कन्यकाबन्धमोचनः ॥ ६२॥
क्रीडारत्नबलीहर्त्ता वरुणच्छत्रशोभितः ।
शक्राभिवन्दितः शक्रजननीकुण्डलप्रदः ॥ ६३॥
यशस्वी नाभिराद्यन्तरहितः सत्कथाप्रियः ।
अदितिप्रस्तुतस्तोत्रो ब्रह्माद्युत्कृष्टचेष्टितः ॥ ६४॥
पुराणः संयमी जन्म ह्यधिपः शशकोऽर्थदः ।
ब्रह्मगर्भपरानन्दः पारिजातापहारकृत् ॥ ६५॥
पौण्ड्रिकप्राणहरणः काशीराजनिषूदनः ।
कृत्यागर्वप्रशमनो विचकृत्यागर्वदर्पहा ॥ ६६॥ ???
कंसविध्वंसनः शान्तजनकोटिभयार्दनः ।
मुनिगोप्ता पितृवरप्रदः सर्वानुदीक्षितः ॥ ६७॥ ?
कैलासयात्रासुमुखो बदर्य्याश्रमभूषणः ।
घण्टाकर्णक्रियादोग्धातोषितो भक्तवत्सलः ॥ ६८॥ ?
मुनिवृन्दातिथिर्ध्येयो घण्टाकर्णवरप्रदः ।
तपश्चर्या पश्चिमाद्यो श्वासो पिङ्गजटाधरः ॥ ६९॥
प्रत्यक्षीकृतभूतेशः शिवस्तोता शिवस्तुतः ।
गुरुः स्वयं वरालोककौतुकी सर्वसम्मतः ॥ ७०॥
कलिदोषनिराकर्त्ता दशनामा दृढव्रतः ।
अमेयात्मा जगत्स्वामी वाग्मी चैद्यशिरोहरः ॥ ७१॥
गुरुश्च पुण्डरीकाक्षो विष्णुश्च मधुसूदनः ।
गुरुमाधवलोकेशो गुरुवामनरूपधृक् ॥ ७२॥
विहितोत्तमसत्कारो वासवाप्तरिपु इष्टदः । ? वासवात्परितुष्टितः
उत्तङ्कहर्षदात्मा यो दिव्यरूपप्रदर्शकः ॥ ७३॥
जनकावगतस्तोत्रो भारतः सर्वभावनः ।
असोढ्ययादवोद्रेको विहितात्परिपूजितः ॥ ७४॥ ??
(soDhya – unable to bear; yAdavodrekaH – excessive predominance of Yadavas)
समुद्रक्षपिताश्चर्यमुसलो वृष्णिपुङ्गवः ।
मुनिशार्दूलपद्माङ्कः सनादित्रिदशार्दितः ॥ ७५॥ ??
गुरुप्रत्यवहारोक्तः स्वधामगमनोत्सुकः ।
प्रभासालोकनोद्युक्तो नानाविधनिमित्तकृत् ॥ ७६॥
सर्वयादवसंसेव्यः सर्वोत्कृष्टपरिच्छदः ।
वेलाकाननसञ्चारी वेलानीलहतश्रमः ॥ ७७॥
कालात्मा यादवानन्तस्तुतिसन्तुष्टमानसः ।
द्विजालोकनसन्तुष्टः पुण्यतीर्थमहोत्सवः ॥ ७८॥ ??
सत्काराह्लादिताशेषभूसुरो भूसुरप्रियः ।
पुण्यतीर्थप्लुतः पुण्यः पुण्यदस्तीर्थपावनः ॥ ७९॥
विप्रसात्स्वकृतः कोटिशतकोटिसुवर्णदः ।
स्वमायामोहिताशेषरुद्रवीरो विशेषजित् ॥ ८०॥
ब्रह्मण्यदेवः श्रुतिमान् गोब्राह्मणहिताय च ।
वरशीलः शिवारम्भः स्वसंविज्ञातमूर्त्तिमान् ॥ ८१॥
स्वभावभद्रः सन्मित्रः सुशरण्यः सुलक्षणः ।
सामगानप्रियो धर्मो धेनुवर्मतमोऽव्ययः ॥ ८२॥ ??
चतुर्युगक्रियाकर्त्ता विश्वरूपप्रदर्शकः ।
अकालसन्ध्याघटनः चक्राङ्कितश्च भास्करः ॥ ८३॥
दुष्टप्रमथनः पार्थप्रतिज्ञाप्रतिपालकः ।
महाधनो महावीरो वनमालाविभूषणः ॥ ८४॥
सुरः सूर्यो मृकण्डश्च भास्करो विश्वपूजितः ।
रविस्तमोहा वह्निश्च वाडवो वडवानलः ॥ ८५॥
दैत्यदर्पविनाशी च गरुडो गरुडाग्रजः ।
प्रपञ्ची पञ्चरूपश्च लतागुल्मश्च गोपतिः ॥ ८६॥
गङ्गा च यमुनारूपी गोदा वेत्रावती तथा ।
कावेरी नर्मदा तापी गण्डकी सरयू रजः ॥ ८७॥
राजसस्तामसः सात्त्वी सर्वाङ्गी सर्वलोचनः ।
मुदामयोऽमृतमयो योगिनीवल्लभः शिवः ॥ ८८॥
बुद्धो बुद्धिमतां श्रेष्ठो विष्णुर्जिष्णुः शचीपतिः ।
सृष्टिचक्रधरो लोको विलोको मोहनाशनः ॥ ८९॥
रवो रावो रवो रावो बलो बालबलाहकः ।
शिवरुद्रो नलो नीलो लाङ्गली लाङ्गलाश्रयः ॥ ९०॥
पारकः पारकी सार्वी वटपिप्पलकाकृतीः । ??
म्लेच्छहा कालहर्ता च यशो ज्ञानं च एव च ॥ ९१॥
अच्युतः केशवो विष्णुर्हरिः सत्यो जनार्दनः ।
हंसो नारायणो लीलो नीलो भक्तपरायणः ॥ ९२॥
मायावी वल्लभगुरुर्विरामो विषनाशनः ।
सहस्रभानुर्महाभानुर्वीरभानुर्महोदधिः ॥ ९३॥
समुद्रोऽब्धिरकूपारः पारावारसरित्पतिः ।
गोकुलानन्दकारी च प्रतिज्ञाप्रतिपालकः ॥ ९४॥
सदारामः कृपारामो महारामो धनुर्धरः ।
पर्वतः पर्वताकारो गयो गेयो द्विजप्रियः ॥ ९५॥
कमलाश्वतरो रामो, भव्यो यज्ञप्रवर्त्तकः ।
द्यौर्दिवौ दिवओ दिव्यौ भावी भावभयापहा ॥ ९६॥
पार्वतीभावसहितो भर्त्ता लक्ष्मीविलासवान् ।
विलासी सहसी सर्वो गुर्वी गर्वितलोचनः ॥ ९७॥
मायाचारी सुधर्मज्ञो जीवनो जीवनान्तकः ।
यमो यमारिर्यमनो यामी यामविधायकः ॥ ९८॥
ललिता चन्द्रिकामाली माली मालाम्बुजाश्रयः ।
अम्बुजाक्षो महायक्षो दक्षश्चिन्तामणिः प्रभुः ॥ ९९॥
मेरोश्चैव च केदारबदर्य्याश्रममागतः ।
बदरीवनसन्तप्तो व्यासः सत्यवती सुतः ॥ १००॥
भ्रमरारिनिहन्ता च सुधासिन्धुविधूदयः ।
चन्द्रो रविः शिवः शूली चक्री चैव गदाधरः ॥ १०१॥
सहस्रनाम च गुरोः पठितव्यं समाहितैः ।
स्मरणात्पापराशीनां खण्डनं मृत्युनाशनम् ॥ १०२॥
गुरुभक्तप्रियकरं महादारिद्र्यनाशनम् ।
ब्रह्महत्या सुरापानं परस्त्रीगमनं तथा ॥ १०३॥
परद्रव्यापहरणं परदोषसमन्वितम् ।
मानसं वाचिकं कायं यत्पापं पापसम्भवम् ॥ १०४॥
सहस्रनामपठनात्सर्वं नश्यति तत्क्षणात् ।
महादारिद्र्ययुक्तो यो गुरुर्वा गुरुभक्तिमान् ॥ १०५॥
कार्तिक्यां यः पठेद्रात्रौ शतमष्टोत्तरं पठेत् ।
सुवर्णाम्बरधारी च सुगन्धपुष्पचन्दनैः ॥ १०६॥
पुस्तकं पूजयित्वा च नैवेद्यादिभिरेव च ।
महामायाङ्कितो धीरो पद्ममालाविभूषणः ॥ १०७॥
प्रातरष्टोत्तरं देवि पठन्नाम सहस्रकम् ।
चैत्रशुक्ले च कृष्णे च कुहुसङ्क्रान्तिवासरे ॥ १०८॥
पठितव्यं प्रयत्नेन त्रैलोक्यं मोहयेत्क्षणात् ।
मुक्तानाम्मालया युक्तो गुरुभक्त्या समन्वितः ॥ १०९॥
रविवारे च शुक्रे च द्वादश्यां श्राद्धवासरे ।
ब्राह्मणान्भोजयित्वा च पूजयित्वा विधानतः ॥ ११०॥
पठन्नामसहस्रं च ततः सिद्धिः प्रजायते ।
महानिशायां सततं गुरौ वा यः पठेत्सदा ॥ १११॥
देशान्तरगता लक्ष्मीः समायाति न संशयः ।
त्रैलोक्ये च महालक्ष्मीं सुन्दर्यः काममोहिताः ॥ ११२॥
मुग्धाः स्वयं समायान्ति गौरवाच्च भजन्ति ताः ।
रोगार्त्तो मुच्यते रोगात्बद्धो मुच्येत बन्धनात् ॥ ११३॥
गुर्विणी विन्दते पुत्रं कन्या विन्दति सत्पतिम् ।
राजानो वशतां यान्ति किम्पुनः क्षुद्रमानुषाः ॥ ११४॥
सहस्रनामश्रवणात्पठनात्पूजनात्प्रिये ।
धारणात्सर्वमाप्नोति गुरवो नात्र संशयः ॥ ११५॥
यः पठेद्गुरुभक्तः सन् स याति परमं पदम् ।
कृष्णेनोक्तं समासाद्य मया प्रोक्तं पुरा शिवम् ॥ ११६॥
नारदाय मया प्रोक्तं नारदेन प्रकाशितम् ।
मया त्वयि वरारोहे! प्रोक्तमेतत्सुदुर्लभम् ॥ ११७॥
शठाय पापिने चैव लम्पटाय विशेषतः ।
न दातव्यं न दातव्यं न दातव्यं कदाचन ॥ ११८॥
देयं दान्ताय शिष्याय गुरुभक्तिरताय च ।
गोदानं ब्रह्मयज्ञश्च वाजपेयशतानि च ॥ ११९॥
अश्वमेधसहस्रस्य पठतश्च फलं लभेत् ।
मोहनं स्तम्भनं चैव मारणोच्चाटनादिकम् ॥ १२०॥
यद्यद्वाञ्छति चित्ते तु प्राप्नोति गुरुभक्तितः ।
एकादश्यां नरः स्नात्वा सुगन्धद्रव्यसंयुतः ॥ १२१॥
आहारं ब्राह्मणे दत्त्वा दक्षिणां स्वर्णभूषणम् ।
आरम्भकर्त्तासौ सर्वं सर्वमाप्नोति मानवः ॥ १२२॥
शतावर्त्तं सहस्रञ्च यः पठेद्गुरवे जनाः ।
गुरुसहस्रनामस्य प्रसादात्सर्वमाप्नुयात् ॥ १२३॥
यद्गेहे पुस्तकं देवि पूजितं चैव तिष्ठति ॥
न मारी न च दुर्भिक्षं नोपसर्गं भयं क्वचित् ॥ १२४॥
सर्पादिभूतयक्षाद्या नश्यन्ते नात्र संशयः ।
श्रीगुरुर्वा महादेवि! वसेत्तस्य गृहे तथा ॥ १२५॥
यत्र गेहे सहस्रं च नाम्नां तिष्ठति पूजितम् ।
श्रीगुरोः कृपया शिष्यो ब्रह्मसायुज्यमाप्नुयात् ॥ १२६॥

॥ इति श्रीहरिकृष्णविनिर्मिते बृहज्ज्योतिषार्णवेऽष्टमे धर्मस्कन्धे सम्मोहन तन्त्रोक्त श्रीगुरु सहस्रनाम स्तोत्रम् ॥
#श्रीकृष्ण #श्रीहरि #कृष्ण #नारायण

Friday, 19 May 2023

#शनि #जयंती पर विशेष #उपाय

🌼🌷 #शनि #जयंती 🌷🌼
🙏🏻 शास्त्रों के अनुसार शनि देवजी का जन्म ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की #अमावस्या को रात के समय हुआ था।
🪔 इस बार शनि जयंती 19 मई 2023 शुक्रवार को पड़ रही है।
🌞 सुबह जल्दी स्नान आदि से निवृत्त होकर सबसे पहले अपने इष्टदेव, #गुरु और माता-पिता का आशीर्वाद लें।
🪔🪔पूजा क्रम शुरू करते हुए सबसे पहले शनिदेव के इष्ट भगवान शिव का 'ॐ नम: शिवाय' बोलते हुए गंगाजल, कच्चा दूध तथा काले तिल से अभिषेक करें। 
🪔अगर घर में #पारद #शिवलिंग है तो उनका अभिषेक करें अन्यथा शिव मंदिर जाकर #अभिषेक करें। भांग, धतूरा एवं हो सके तो 108 #आंकडे़ (#मदार) के #फूल जरूर चढ़ाएं। 

🪔#द्वादश #ज्योतिर्लिंग के नाम को उच्चारण करें-
🙏🏻 सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्‌।
🙏उज्जयिन्यां महाकालमोंकारं ममलेश्वरम्‌ ॥1॥🙏
🙏परल्यां वैजनाथं च डाकियन्यां भीमशंकरम्‌।
🙏सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने ॥2॥🙏
🙏वारणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमी तटे।
🙏हिमालये तु केदारं ध्रुष्णेशं च शिवालये ॥3॥🙏
🙏एतानि ज्योतिर्लिंगानि सायं प्रातः पठेन्नरः।
🙏सप्तजन्मकृतं पापं स्मरेण विनश्यति ॥4॥🙏

🪔अब #शनिदेव की पूजा शुरू करते हुए सर्वप्रथम शनिदेव का सरसों के तेल से अभिषेक करें।
🌷 “ॐशं शनैश्चराय नम:” का निरंतर जप करते रहें ।
🔥 सरसों के तेल का दीपक प्रज्वलित करें तथा कस्तूरी अथवा चन्दन की धूप अर्पित करें ।

🌷 शनि के #वैदिक #मंत्र का उच्चारण करें-
नीलांजन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्
छायामार्तण्ड संभूतम् तम नमामि शनैश्चरम्॥

🌷 अब #शनि #स्त्रोत्र का #पाठ करें🌷
नमस्ते कोण संस्थाय पिंगलाय नमोऽस्तुते।
नमस्ते बभ्रुरुपाय कृष्णाय नमोऽस्तुते॥
नमस्ते रौद्रदेहाय नमस्ते चांतकायच।
नमस्ते यमसंज्ञाय नमस्ते सौरये विभो॥
नमस्ते मंदसंज्ञाय शनैश्चर नमोऽस्तुते।
प्रसादं कुरू देवेश दीनस्य प्रणतस्य च॥

🔥 शाम को #पीपल के वृक्ष के नीचे #तिल के #तेल के #दीपक को प्रज्जवलित करें। 
🙏शनिदेव से प्रार्थना करें कि सभी #समस्याएं दूर हों और बुरे समय से पीछा छूट जाए। 
🙏इसके बाद पीपल की #सात #परिक्रमा करें।
🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔
- नारायण आध्यात्मिक ऊर्जा 🙏

Tuesday, 16 May 2023

Shri Sankata Chalisa | #संकटा #योगिनी #Vikat #Matrika | #संकठा सौभाग्यवर्द्धनी #मां #काशी

यूट्यूब के नारायण आध्यात्मिक ऊर्जा चैनल पर यह वीडियो उपलब्ध है-

Friday, 14 April 2023

केतु कवचम् - स्तोत्रम्


केतु कवचम्
केतु करालवदनं चित्रवर्ण किरीटिनम् । 
प्रणमामि सदा केतुं ध्वजाकारं ग्रहेश्वरम् ॥ 
चित्रवर्ण: शिरः पातु भालं धूम्रसमद्युतिः । 
पातु नेत्रे पिंगलाक्षः श्रुति मे रक्तलोचनः ॥ 
घ्राणं पातु सुवर्णाभश्चिबुकं सिंहिकासुतः ।
पातु कंठं च मे केतु स्कंधौ पातु ग्रहाधिपः ॥
हस्तौ पातु सुरश्रेष्ठः कुक्षिं पातु महाग्रहः । 
सिंहासनः कटिं पातु मध्यं पातु महासुरः ॥ 
उरू पातु महाशीर्षो जानुनी मेऽतिकोपनः । 
पातु पादौ च मे क्रूरः सर्वाङ्ग नरपिंगलः ॥ 
यो इदं कवचं दिव्यं सर्वरोगविनाशनम् । 
सर्वशत्रुविनाशं च धारणाद्विजयी भवेत् ॥


केतु स्तोत्रम्
केतुः कालः कलयिता धूम्रकेतुविवर्णकः । 
लोककेतु महाकेतुः सर्वकेतुर्भयप्रदः ॥ 
रौद्रो रुद्रपियो रुद्रः क्रूरकर्मा सुगन्धधृक् । 
पलाश - धूम-संकाशश्चित्र-यज्ञोपवीतधृकः ॥
तारागणविमर्दी च जैमिनेयो ग्रहाधिपः । 
पंचविंशति नामानि केतोर्यः सततं पठेत् ॥ 
तस्य नश्यन्ति बाधाश्च सर्वाः केतुप्रसादतः । 
धनधान्यपशूनां च भवेद्वृद्धिर्न संशयः ॥


यूट्यूब वीडियो लिंक -
https://youtube.com/@NarayanAU_Kanak

Monday, 10 April 2023

भद्रकाली षोडशोपचार पूजनविधि।।

#भद्रकाली षोडशोपचार पूजनविधि।।  
   ध्यान:-
महामेघ प्रभां देवी कृष्णवस्त्रोसि धारिणीम् ।
ललज्जिह्वां घोरदंष्ट्रां कोटराक्षीं हसन्मुखीम् ॥

नागहारलतोपेतां चन्द्रार्द्धकृत शेखराम् ।
द्यां लिखन्तीं जटामेकां लेलिहानासवं पिबम् ॥

नाग यज्ञोपवीताङ्गी नागशय्या निषेदुषीम्।
पञ्चाशन्मुण्डसंयुक्तं वनमाला महोदरीम्॥

सहस्त्रफण संयुक्तमनन्तं शिरसोपरि ।
चतुर्दिक्षु नागफणा वेष्टितां भद्रकालिकाम् ॥

तक्षक सर्पराजेन वामकङ्कण भूषिताम्।
अनन्त नागराजेन कृतदक्षिण कङ्कणम्॥

नागेन रसनाहार कक्पितां रत्न नूपुराम् ।
वामे शिव स्वरूपं तत्कल्पितं वत्स्‌रूपकम् ॥

द्विभुजां चिन्तयेद्देत्नीं नागयज्ञोपवीतिनीम् ।
नरदेह समाबद्ध कुण्डल श्रुति मण्डिताम्॥

प्रसन्नवदनां सौम्यां शिवमोहिनीम् ॥
अट्टहासां महाभीमां साधकाभीष्टदायिनीम् ॥

पुष्प समर्पण 
ॐ देवेशि भक्ति सुलभे परिवार समन्विते। 
यावत्तवां पूजयिष्यामि तावद्देवी स्थिरा भव।। 

नमस्कार
शत्रुनाशकरे देवि ! सर्व सम्पत्करे शुभे
सर्व देवस्तुते ! भद्रकालिके ! त्वां नमाम्यहम।। 

१. आसन👉 प्रथम दिन कि पूजा में माँ को काले रंग के कपडे का / आम कि लकड़ी का सिंहासन जो काले रंग से रंगा गया हो समर्पित करें एवं माँ को उस पर विराजित करने इसके बाद फिर प्रत्येक दिन माँ के चरणों में निम्न मंत्र को बोलते हुए पुष्प / अक्षत समर्पित करें

ॐ आसनं भास्वरं तुङ्गं मांगल्यं सर्वमंगले। 
भजस्व जगतां मातः प्रसीद जगदीश्वरी।।

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा आसनं समर्पयामि )

२. पाद्य👉 इस क्रिया में शीतल एवं सुवासित जल से चरण धोएं और ऐसा सोचें कि आपके आवाहन पर माँ दूर से आयी हैं और पाद्य समर्पण से माँ को रास्ते में जो श्रम हुआ लगा है उसे आप दूर कर रहे हैं

ॐ गंगादि सलिलाधारं तीर्थं मंत्राभिमंत्रिम। 
दूर यात्रा भ्रम हरं पाद्यं तत्प्रति गृह्यतां।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा पाद्यं समर्पयामि )

३. उद्वर्तन👉  इस क्रिया में माँ के चरणों में सुगन्धित / तिल के तेल को समर्पित करते हैं

ॐ तिल तण्डुल संयुक्तं कुश पुष्प समन्वितं। 
सुगंधम फल संयुक्तंमर्ध्य देवी गृहाण में।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा उद्वर्तन तैलं समर्पयामि )

४. आचमन👉  इस क्रिया में माँ को आचमनी से या लोटे से आचमन जल प्रदान करते हैं ( याद रहे कि जल समर्पित करने का क्रम आप मूर्ति और यदि जल कि निकासी कि सुगम व्यवस्था है तो कर सकते हैं किन्तु यदि आपने कागज के चित्र को स्थापित किया हुआ है तो चित्र के सम्मुख एक पात्र रख लें और जल से सम्बंधित सारी क्रियाएँ करके जल उसी पात्र में डालते जाएँ )

ॐ स्नानादिक विधायापि यतः शुद्धिख़ाप्यते। 
इदं आचमनीयं हि कालिके देवी प्रगृह्यताम्।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा आचमनीयम् समर्पयामि )

५. स्नान👉  इस क्रिया में सुगन्धित पदार्थों से निर्मित जल से स्नान करवाएं ( जल में इत्र , कर्पूर , तिल , कुश एवं अन्य वस्तुएं अपनी सामर्थ्य या सुविधानुसार मिश्रित कर लें यदि सामर्थ्य नहीं है तो सदा जल भी पर्याप्त है जो पूर्ण श्रद्धा से समर्पित किया गया हो )

ॐ खमापः पृथिवी चैव ज्योतिषं वायुरेव च। 
लोक संस्मृति मात्रेण वारिणा स्नापयाम्यहम्।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा स्नानं निवेदयामि )

६. मधुपर्क👉 इस क्रिया में ( पंचगव्य मिश्रित करें प्रथम दिन ( गाय का शुद्ध दूध , दही , घी , चीनी , शहद ) अन्य दिनों में यदि व्यवस्था कर सकें तो बेहतर है अन्यथा सिर्फ शहद से काम लिया जा सकता है

ॐ मधुपर्क महादेवि ब्रह्मध्धे कल्पितं तव। 
मया निवेदितम् भक्तया गृहाण गिरिपुत्रिके।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा मधुपर्कं समर्पयामि )

विशेष👉  ध्यान रखें चन्दन या सिन्दूर में से कोई भी चीज मस्तक पर समर्पित न करें बल्कि माँ के चरणों में समर्पित करें

७. चन्दन👉 इस क्रिया में सफ़ेद चन्दन समर्पित करें

ॐ मळयांचल सम्भूतं नाना गंध समन्वितं। 
शीतलं बहुलामोदम चन्दम गृह्यतामिदं।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा चन्दनं समर्पयामि )

८. रक्त चन्दन👉  इस क्रिया में माँ को रक्त / लाल चन्दन समर्पित करें

ॐ रुक्तानुलेपनम् देवि स्वयं देव्या प्रकाशितं। 
तद गृहाण महाभागे शुभं देहि नमोस्तुते।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा रक्त चन्दनं समर्पयामि )

९. सिन्दूर👉  इस क्रिया में माँ को सिन्दूर समर्पित करें

ॐ सिन्दूरं सर्वसाध्वीनाम भूषणाय विनिर्मितम्। 
गृहाण वर दे देवि भूषणानि प्रयच्छ में।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा सिन्दूरं समर्पयामि )

१०. कुंकुम👉 इस क्रिया में माँ को कुंकुम समर्पित करें

ॐ जपापुष्प प्रभम रम्यं नारी भाल विभूषणम्। 
भाष्वरम कुंकुमं रक्तं देवि दत्तं प्रगृह्य में।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा कुंकुमं समर्पयामि )

११. अक्षत👉  अक्षत में चावल प्रयोग करने होते हैं जो काले रंग में रंगे हुए हों

ॐ अक्षतं धान्यजम देवि ब्रह्मणा निर्मितं पुरा। 
प्राणंद सर्वभूतानां गृहाण वर दे शुभे।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा अक्षतं समर्पयामि )

१२. पुष्प👉  माता के चरणो में पुष्प समर्पित करें ( फूलों एवं फूलमालाओं का चुनाव करते समय ध्यान रखें कि यदि आपको काला गुलाब मिल जाये तो बहुत बढ़िया यदि नहीं मिलता तो लाल गुलाब उपयुक्त होगा किन्तु यदि स्थानीय या बाजारीय उपलब्धता के हिसाब से जो उपलब्ध हो वही प्रयोग करें )

ॐ चलतपरिमलामोदमत्ताली गण संकुलम्। 
आनंदनंदनोद्भूतम् कालिकायै कुसुमं नमः।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा पुष्पं समर्पयामि )

१३. विल्वपत्र👉  माता के चरणों में बिल्वपत्र समर्पित करें ( कहीं कहीं पर उल्लेख मिलता कि देवी पूजा में बिल्वपत्र का प्रयोग नहीं किया जाता है तो इस स्थिति में आप अपने लोक/ स्थानीय प्रचलन का प्रयोग करें )

ॐ अमृतोद्भवम् श्रीवृक्षं शंकरस्व सदाप्रियम। 
पवित्रं ते प्रयच्छामि सर्व कार्यार्थ सिद्धये। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा बिल्वपत्रं समर्पयामि )

१४. माला👉  इस क्रिया में माँ को फूलों कि माला समर्पित करें

ॐ नाना पुष्प विचित्राढ़यां पुष्प मालां सुशोभताम्। 
प्रयच्छामि सदा भद्रे गृहाण परमेश्वरि।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा पुष्पमालां समर्पयामि )

१५. वस्त्र👉  इस क्रिया में माता को वस्त्र समर्पित किये जाते हैं ( एक बात ध्यान में रखनी चाहिए कि वस्त्रों कि लम्बाई १२ अंगुल से कम न हो - प्रथम दिन कि पूजा में काले वस्त्र समर्पित किये जाने चाहिए तत्पश्चात [ मौली धागा जिसे प्रायः पुरोहित रक्षा सूत्र के रूप में यजमान के हाथ में बांधते हैं वह चढ़ाया जा सकता है लेकिन लम्बाई १२ अंगुल ही होगी )

अ. ॐ तंतु संतान संयुक्तं कला कौशल कल्पितं। 
सर्वांगाभरण श्रेष्ठं वसनं परिधीयताम्।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा प्रथम वस्त्रं समर्पयामि )

ब. ॐ यामाश्रित्य महादेवि जगत्संहारकः सदा। 
तस्यै ते परमेशान्यै कल्पयाम्युत्रीयकम। । 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा द्वितीय वस्त्रं समर्पयामि )

१५. धूप👉  इस क्रिया में सुगन्धित धुप समर्पित करनी है

ॐ गुग्गुलम घृत संयुक्तं नाना भक्ष्यैश्च संयुतम। 
दशांग ग्रसताम धूपम् कालिके देवि नमोस्तुते।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा धूपं समर्पयामि )

१६. दीप👉 इस क्रिया में शुद्ध घी से निर्मित दीपक समर्पित करना है जो कपास कि रुई से बनी बत्तियों से निर्मित हो

ॐ मार्तण्ड मंडळांतस्थ चन्द्र बिंबाग्नि तेजसाम्। 
निधानं देवि कालिके दीपोअयं निर्मितस्तव भक्तितः।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा दीपं दर्शयामि )

१७. इत्र👉  इस क्रिया में माता को इत्र / सुगन्धित सेंट समर्पित करना है

ॐ परमानन्द सौरभ्यम् परिपूर्णं दिगम्बरम्। 
गृहाण सौरभम् दिव्यं कृपया जगदम्बिके।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा सुगन्धित द्रव्यं समर्पयामि )

१८. कर्पूर दीप👉  इस क्रिया में माँ को कर्पूर का दीपक जलाकर समर्पित करना है

ॐ त्वम् चन्द्र सूर्य ज्योतिषं विद्युद्गन्योस्तथैव च। 
त्वमेव जगतां ज्योतिदीपोअयं प्रतिगृह्यताम्।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा कर्पूर दीपम दर्शयामि )

१९. नैवेद्य👉  इस क्रिया में माता को फल - फूल या भोजन समर्पित करते हैं भोजन कम से कम इतनी मात्रा में हो जो एक आदमी के खाने के लिए पर्याप्त हो बाकि सारा कुछ सामर्थ्यानुसार )

ॐ दिव्यांन्नरस संयुक्तं नानाभक्षैश्च संयुतम। 
चौष्यपेय समायुक्तमन्नं देवि गृहाण में।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा नैवेद्यं समर्पयामि )

२०. खीर👉  इस क्रिया में ढूध से निर्मित खीर चढ़ाएं

ॐ गव्यसर्पि पयोयुक्तम नाना मधुर मिश्रितम्। 
निवेदितम् मया भक्त्या परमान्नं प्रगृह्यताम्।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा दुग्ध खीरम समर्पयामि )

२१. मोदक👉  इस क्रिया में माँ को लड्डू समर्पित करने हैं

ॐ मोदकं स्वादु रुचिरं करपुरादिभिरणवितं। 
मिश्र नानाविधैर्द्रुव्यै प्रति ग्रह्यशु भुज्यतां।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा मोदकं समर्पयामि )

२२. फल👉  इस क्रिया में माता को ऋतु फल समर्पित करने होते हैं

ॐ फलमूलानि सर्वाणि ग्राम्यां अरण्यानि यानि च। 
नानाविधि सुंगंधीनि गृहाण देवि ममाचिरम।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा ऋतुफलं समर्पयामि )

२३. जल👉  इस क्रिया में खान - पान के पश्चात् अब माता को जल समर्पित करें

ॐ पानीयं शीतलं स्वच्छं कर्पूरादि सुवासितम्। 
भोजने तृप्ति कृद्य् स्मात कृपया प्रतिगृह्यतां।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा जलम समर्पयामि )

२४. करोद्वर्तन जल👉  इस क्रिया में माता को हाथ धोने के लिए जल प्रदान करें

ॐ कर्पूरादीनिद्रव्याणि सुगन्धीनि महेश्वरि। 
गृहाण जगतां नाथे करोद्वर्तन हेतवे। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा करोद्वर्तन जलम समर्पयामि )

२५. आचमन👉 इस क्रिया में माता को पुनः आचमन करवाएं

ॐ अमोदवस्तु सुरभिकृतमेत्तदनुत्तमम्। 
गृह्णाचमनीयम तवं माया भक्त्या निवेदितम्।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा पुनराचमनीयम् समर्पयामि )

२६. ताम्बूल👉  इस क्रिया में माता को सुगन्धित पान समर्पित करें

ॐ पुन्गीफलम महादिव्यम नागवल्ली दलैर्युतम्। 
कर्पूरैल्लास समायुक्तं ताम्बूल प्रतिगृह्यताम्।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा ताम्बूलं समर्पयामि )

२७. काजल👉  माता को काजल समर्पित करें

ॐ स्निग्धमुष्णम हृद्यतमं दृशां शोभाकरम तव। 
गृहीत्वा कज्जलं सद्यो नेत्रान्यांजय कालिके।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा कज्जलं समर्पयामि )

२८. महावर👉  इस क्रिया में माँ को लाला रंग का महावर समर्पित करते हैं ( लाल रंग एवं पानी का मिश्रण जिसे ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं पैरों में लगाती हैं )

ॐ चलतपदाम्भोजनस्वर द्युतिकारि मनोहरम। 
अलकत्कमिदं देवि मया दत्तं प्रगृह्यताम्। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा महावरम समर्पयामि )

२९. चामर👉  इस क्रिया में माँ को चामर / पंखा ढलना होता है

ॐ चामरं चमरी पुच्छं हेमदण्ड समन्वितम्। 
मायार्पितं राजचिन्ह चामरं प्रतिगृह्यताम्।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा चामरं समर्पयामि )

३० . घंटा वाद्यम्👉  इस क्रिया में माँ के सामने घंटा / घंटी बजानी होती है ( यह ध्वनि आपके घर और आपसे सभी नकारात्मक शक्तियों को दूर करती है एवं आपके मन में प्रसन्नता और हर्ष को जन्म देती है )

ॐ यथा भीषयसे दैत्यान् यथा पूरयसेअसुरम। 
तां घंटा सम्प्रयच्छामि महिषधिनी प्रसीद में।।  

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा घंटा वाद्यं समर्पयामि )

३१. दक्षिणा👉  इस क्रिया में माँ को दक्षिणा धन समर्पित किया जाता है - ( जो कि सामर्थ्यानुसार है )

ॐ काञ्चनं रजतोपेतं नानारत्न समन्वितं। 
दक्षिणार्थम् च देवेशि गृहाण त्वं नमोस्तुते।। 

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा आसनं समर्पयामि )

३३. पुष्पांजलि👉 ॐ काली काली भद्रकाली कालिके पाप नाशिनी। 
काली कराली निष्क्रान्ते भद्रकाल्यै तवननमोस्तुते।। 

ॐ उत्तिष्ठ देवी चामुण्डे शुभां पूजा प्रगृह्य में। 
कुरुष्व मम कल्याणमस्टाभि शक्तिभिः सह।। 

भुत प्रेत पिशाचेभ्यो रक्षोभ्यश्च महेश्वरि। 
देवेभ्यो मानुषोभ्योश्च भयेभ्यो रक्ष मा सदा।। 

सर्वदेवमयीं देवीं सर्व रोगभयापहाम। 
ब्रह्मेश विष्णु नमिताम् प्रणमामि सदा उमां।। 

आय़ुर्ददातु में भद्रकाल्यै पुत्रानादि सदा शिवा। 
अर्थ कामो महामाया विभवं सर्व मङ्गला।। 

क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरि पुष्पांजलिं समर्पयामि

३४. नीराजन👉  इस क्रिया में पुनः माँ कि प्राथमिक आरती उतारते हैं जिसमे सिर्फ कर्पूर का प्रयोग होता है

ॐ कर्पूरवर्ति संयुक्तं वहयिना दीपितंचयत। 
नीराजनं च देवेशि गृह्यतां जगदम्बिके।। 

३५. क्षमा प्रार्थना👉 
ॐ प्रार्थयामि महामाये यत्किञ्चित स्खलितम् मम। 
क्षम्यतां तज्जगन्मातः कालिके देवी नमोस्तुते।। 

ॐ विधिहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं यदरचितम्। 
पुर्णम्भवतु तत्सर्वं त्वप्रसादान्महेश्वरी।। 

शक्नुवन्ति न ते पूजां कर्तुं ब्रह्मदयः सुराः। 
अहं किं वा करिष्यामि मृत्युर्धर्मा नरोअल्पधिः।। 

न जाने अहं स्वरुप ते न शरीरं न वा गुणान्। 
एकामेव ही जानामि भक्तिं त्वचर्णाबजयोः।। 

३६. आरती👉  इस क्रिया में माता कि आरती उतारते हैं और यह चरण आपकी उस काल कि साधना के समापन का प्रतीक है -( इसके लिए अलग से कोई आरती जलने कि कोई जरुरत नहीं है आप उसी दीपक का उपयोग करेंगे जो आपने पूजा के प्रारम्भ में घी का दीपक जलाया था )
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#तुलसी #स्तोत्रम् #पुंडरीक कृत

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