🌿 तत्त्वमसि — तुम वही हो
एक बार एक युवक सत्य की खोज में एक गुरु के पास पहुँचा।
उसने कहा, "गुरुदेव, मैंने अनेक ग्रंथ पढ़े हैं। आत्मा, परमात्मा, ब्रह्म, चेतना—इन सबके बारे में बहुत सुना है। लेकिन मैं अब भी नहीं जान पाया कि सत्य क्या है।"
गुरुदेव मुस्कुराए और बोले,
"यदि मैं तुम्हें अभी कहूँ कि कुछ ही देर में तेज़ बारिश होने वाली है, तो तुम क्या करोगे?"
युवक ने उत्तर दिया,
"मैं किसी छत के नीचे चला जाऊँगा या अपने बचाव का कोई उपाय करूँगा।"
गुरुदेव ने पूछा,
"और यदि तुम केवल 'बारिश... बारिश... बारिश...' शब्द दोहराते रहो, तो क्या भीगने से बच जाओगे?"
युवक हँस पड़ा।
"नहीं गुरुदेव, शब्द दोहराने से क्या होगा? बचना है तो उसके संकेत को समझना होगा।"
गुरुदेव ने गंभीर होकर कहा,
"बस, यही बात मैं तुम्हें समझाना चाहता हूँ।"
"ऋषियों ने 'आत्मा' कहा, संतों ने 'परमात्मा' कहा, शास्त्रों ने 'ब्रह्म' कहा। ये शब्द सत्य नहीं हैं। ये तो केवल उस सत्य की ओर इशारा करने वाले संकेत हैं।"
"लेकिन लोग संकेत को छोड़कर शब्दों को पकड़ बैठे। कोई आत्मा शब्द को रट रहा है, कोई ब्रह्म पर बहस कर रहा है, कोई परमात्मा की कल्पनाएँ बना रहा है।"
"जैसे बारिश के शब्द को पकड़कर खड़ा रहने वाला व्यक्ति भीग जाता है, वैसे ही शब्दों को पकड़ने वाला साधक सत्य से वंचित रह जाता है।"
युवक ध्यान से सुन रहा था।
गुरुदेव ने फिर पूछा,
"जब मैं कहता हूँ कि तुम शरीर नहीं, आत्मा हो—तो तुम्हें क्या लगता है, मैं कोई नया ज्ञान दे रहा हूँ?"
युवक चुप रहा।
गुरुदेव बोले,
"नहीं। मैं केवल तुम्हारा ध्यान उस ओर मोड़ रहा हूँ जो हमेशा से तुम्हारे भीतर उपस्थित है।"
"अपनी आँखें बंद करो।"
युवक ने आँखें बंद कर लीं।
"अब देखो, विचार आ रहे हैं?"
"हाँ।"
"उन्हें कौन देख रहा है?"
"मैं।"
"भावनाएँ उठ रही हैं?"
"हाँ।"
"उन्हें कौन जान रहा है?"
"मैं।"
"सुख आता है, दुःख आता है, स्मृतियाँ आती हैं, सपने आते हैं—लेकिन इन सबको देखने वाला कौन है?"
युवक भीतर उतरता चला गया।
कुछ देर बाद गुरुदेव ने धीमे स्वर में कहा—
"जिसे तुम खोज रहे हो, वह कोई वस्तु नहीं है। वह देखने वाला स्वयं है।"
"जो इन शब्दों को सुन रहा है, जो इस क्षण जाग रहा है, जो हर अनुभव का साक्षी है—वही सत्य है।"
युवक की आँखों से आँसू बहने लगे।
गुरुदेव बोले,
"सद्गुरु बाहर से केवल संकेत देता है। मंज़िल तुम्हारे भीतर है।"
"जिसे तुम संसार में खोजते फिर रहे हो, वह तुम्हारी अपनी ही चेतना का प्रकाश है।"
"अब शब्दों को छोड़ दो।"
"आत्मा, परमात्मा, ब्रह्म—सबको कुछ क्षण के लिए विसर्जित कर दो।"
"केवल उस मौन साक्षी में ठहर जाओ जो हमेशा से उपस्थित है।"
लंबे मौन के बाद गुरुदेव ने कहा—
'तत्त्वमसि।'
'तुम वही हो।'
और उस क्षण युवक को लगा कि वह किसी नई चीज़ को नहीं जान रहा, बल्कि उसी को पहचान रहा है जो सदैव से उसके भीतर था।
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